एक्सप्लोरर

क्यों बार बार नेपाल बन रहा कुदरत के कहर का शिकार? क्या है इसके पीछे की वजह

नेपाल में कमजोर टेक्टॉनिक बनावट, पिघलते ग्लेशियर, खतरनाक हिमताल और मॉनसून की भारी बारिश मिलकर बार-बार भीषण आपदाएं लाते हैं. जलवायु परिवर्तन ने इस प्राकृतिक जोखिम को और जानलेवा बना दिया है.

नेपाल में एक बार फिर मूसलाधार बारिश, उफनती नदियों और खिसकते पहाड़ों ने तबाही मचा रखी है. बाढ़ और भूस्खलन की वजह से सड़कें, पुल और दर्जनों मकान पलक झपकते ही बह गए, जबकि कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. हिमालय की गोद में बसा यह देश हर साल किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का सामना करता है. आखिर ऐसा क्या है कि नेपाल बार-बार कुदरत के इस भयंकर प्रकोप का शिकार बन जाता है? इसके पीछे सिर्फ तेज बारिश ही नहीं, बल्कि जमीन के अंदर की हलचल, पिघलते ग्लेशियर और इंसानी गतिविधियां भी बड़ी वजह हैं.

जमीन के नीचे छिपी प्लेटों का टकराव

नेपाल के भूगर्भीय ढांचे को समझें तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इंडियन और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच की टक्कर है. लगभग 5 करोड़ साल पहले शुरू हुई यह भौगोलिक प्रक्रिया आज भी जारी है. इंडियन प्लेट हर साल करीब 20 से 21 मिलीमीटर की रफ्तार से यूरेशियन प्लेट की तरफ खिसक रही है. इस वजह से हिमालय के नीचे की जमीन पर लगातार भारी दबाव बनता है. यही भूगर्भीय हलचल नेपाल में बार-बार आने वाले विनाशकारी भूकंपों का सबसे मुख्य कारण बनती है.

भूकंप से कमजोर होते ऊंचे पहाड़

भूकंप के झटके केवल इमारतों को ही नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि पूरे पहाड़ी तंत्र को भीतर से झकझोर देते हैं. साल 2015 में आए भीषण भूकंप के बाद भी नेपाल में लगातार छोटे-बड़े भूगर्भीय कंपन महसूस किए गए हैं. इन रोजाना के कंपनों के कारण पहाड़ों की चट्टानें ढीली पड़ जाती हैं और अपनी पकड़ खो देती हैं. बारिश के दिनों में जब इन कमजोर पड़ चुकी चट्टानों पर पानी का भारी दबाव पड़ता है, तो पूरी की पूरी ढलानें नीचे आ गिरती हैं.

यह भी पढ़ें: इस ग्रह पर पेट्रोल का भंडार, वहां से पृथ्वी क्यों नहीं ला सकते यह ईंधन?

ग्लेशियर पिघलने से ढीली पड़ती चट्टानें

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी क्षेत्रों पर बहुत तेजी से पड़ रहा है. बर्फ पहाड़ों के पत्थरों और चट्टानों को आपस में जोड़ने के लिए प्राकृतिक गोंद या सीमेंट की तरह काम करती है, लेकिन तापमान बढ़ने से यह बर्फ तेजी से पिघल रही है. जब पहाड़ों की अंदरूनी बर्फ गल जाती है, तो पत्थरों की आपसी पकड़ ढीली हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप जरा सी हलचल या बारिश होते ही भयानक लैंडस्लाइड होने लगता है.


क्यों बार बार नेपाल बन रहा कुदरत के कहर का शिकार? क्या है इसके पीछे की वजह

हिंदू कुश क्षेत्र में पिघलती बर्फ की रफ्तार

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2000 के बाद से हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति दोगुनी हो चुकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि इतने विशाल और संवेदनशील इलाके में अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से ग्लेशियरों पर नजर रखने के इंतजाम अब भी बहुत अपर्याप्त हैं. बर्फ के इतनी तेजी से घटने से पूरे क्रायोस्फीयर का संतुलन बिगड़ रहा है और नए खतरे पैदा हो रहे हैं.

तिब्बत की खतरनाक ग्लेशियर झीलें

नेपाल और उससे सटे तिब्बती पठार पर हजारों की संख्या में हिमताल यानी ग्लेशियल लेक्स बनी हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार, कोशी, गंडकी और करनाली नदी घाटियों में 3,624 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. इनमें से कम से कम 47 झीलें बेहद संवेदनशील और खतरनाक मानी गई हैं, जिनमें से 25 तिब्बत में, 21 नेपाल में और 1 भारत में स्थित हैं. जब ये झीलें फटती हैं, तो निचले इलाकों में अचानक तबाही मच जाती है.

ऊपर फटने वाली झीलों का नीचे तबाही मचाना

नेपाल-चीन सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक बनावट बेहद ढलानदार है. तिब्बत के ऊंचे इलाकों में स्थित ग्लेशियल झीलों के फटने से लाखों क्यूसेक पानी, बर्फ, मलबा और भारी पत्थर ढलान के सहारे सीधे नीचे की बस्तियों की ओर तेजी से भागते हैं. चूंकि ढलान बहुत तीखी होती है, इसलिए पानी और मलबे को नीचे आने में बहुत कम समय मिलता है. इस वजह से निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को संभलने या भागने का मौका तक नहीं मिल पाता है.

संकरी घाटियों में गुरुत्वाकर्षण का खतरनाक खेल

नेपाल की नदियां दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत शृंखलाओं से होकर बहती हैं. ये नदियां बेहद तंग और संकरी घाटियों से गुजरती हैं. जब मॉनसून के दौरान या ग्लेशियर टूटने से नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ता है, तो पानी को फैलने के लिए समतल जगह नहीं मिलती है. ऐसी स्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल पानी और मलबे को बहुत तेज रफ्तार के साथ सीधे नीचे की ओर धकेलता है. यह भयानक बहाव रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर देता है.

ग्लेशियर टूटने से मलबा और चट्टान का गिरना

अक्सर नेपाल में आने वाली तबाही को केवल मूसलाधार बारिश का नतीजा मान लिया जाता है, लेकिन इसकी वजहें इससे कहीं ज्यादा गहरी हैं. कई बार भूकंप के बिना भी ऊंचे पहाड़ों से ग्लेशियर टूटकर गिरते हैं, जिससे भारी मात्रा में बर्फ, मिट्टी और बड़ी-बड़ी चट्टानें नीचे खिसकने लगती हैं. हाल के वैज्ञानिक विश्लेषणों और यूएस जियोलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट से भी यह साफ हुआ है कि कई मौकों पर भूस्खलन की असली वजह भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियरों का टूटना और खिसकना रहा है.

दक्षिण एशियाई मॉनसून का सीधा असर

नेपाल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह दक्षिण एशियाई मॉनसून के सीधे रास्ते में आता है. मॉनसून के मौसम में यहां कई दिनों तक लगातार मूसलाधार बारिश होती है. पहाड़ों की कच्ची और ढलानदार मिट्टी पानी को सोखकर भारी हो जाती है. अत्यधिक नमी के कारण पहाड़ों की सतह खिसकने लगती है, नदियों का प्रवाह रुक जाता है और फिर अचानक बाढ़ आ जाती है. वर्ल्ड बैंक ने भी चेतावनी दी है कि नेपाल का भूगोल जलवायु खतरों को कई गुना बढ़ा देता है.

कमजोर और नए पहाड़ों की अस्थिर ढलानें

भौगोलिक दृष्टि से हिमालय की पर्वत शृंखलाएं काफी नई और भूगर्भीय रूप से बेहद सक्रिय हैं. नए पहाड़ होने के कारण इनकी ढलानें स्वाभाविक रूप से कमजोर और अस्थिर हैं. इस प्राकृतिक संवेदनशीलता के ऊपर जब जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अव्यवस्थित तरीके से सड़कों का निर्माण, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और भारी निर्माण कार्य जोड़ दिए जाते हैं, तो पहाड़ों की सहने की क्षमता खत्म हो जाती है और लैंडस्लाइड का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है.

तंग घाटियों में बुनियादी ढांचे का निर्माण

नेपाल में पहाड़ी बनावट के कारण समतल जमीन का मिलना बहुत मुश्किल होता है. यही वजह है कि इंसानी बस्तियां, हाईवे, पुल और पनबिजली परियोजनाएं (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट) अक्सर संकरी घाटियों और नदियों के बिल्कुल किनारे बनाई जाती हैं. जब भी पहाड़ों पर ग्लेशियर टूटते हैं या नदियां उफान पर आती हैं, तो सारा मलबा और पानी इन्हीं घाटियों से होकर गुजरता है. रास्ते में बुनियादी ढांचा होने के कारण आर्थिक और मानवीय नुकसान कई गुना ज्यादा हो जाता है.


क्यों बार बार नेपाल बन रहा कुदरत के कहर का शिकार? क्या है इसके पीछे की वजह

सालों-साल जारी तबाही का सिलसिला

नेपाल के लिए प्राकृतिक आपदाएं अब किसी एक मौसम की बात नहीं रह गई हैं, बल्कि यह एक वार्षिक चक्र बन चुका है. इतिहास उठाकर देखें तो साल 2016, 2017, 2019, 2020 और 2021 में लगातार भीषण भूस्खलन और बाढ़ दर्ज की गई. इसके बाद 2023 के अंत में आए भूकंपों ने पहाड़ों को और जर्जर कर दिया. साल 2024 में भी भारी बारिश और लैंडस्लाइड ने भारी तबाही मचाई, जो यह साबित करती है कि नेपाल में प्राकृतिक आपदाएं अब एक आम और स्थायी समस्या बन चुकी हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़ता आपदाओं का प्रभाव

नेपाल के पहाड़ों से शुरू होने वाला यह तबाही का मंजर केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता है. हिमालय की घाटियों से निकलने वाली नदियां पहाड़ों का सारा मलबा, गाद, पत्थर और पानी लेकर नीचे की ओर बहती हैं. यही नदियां आगे जाकर भारत और बांग्लादेश के मैदानी इलाकों में भी बाढ़ और भीषण तबाही का कारण बनती हैं. इस तरह नेपाल के पर्यावरण में होने वाला जरा सा भी असंतुलन पूरे दक्षिण एशिया के पर्यावरण और जनजीवन को प्रभावित करता है.

यह भी पढ़ें: संकट में दुनिया, फिर क्यों सस्ता हो रहा सोना? जानें वजह

About the author निधि पाल

निधि पाल एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. ये यहां पर जीके सेक्शन की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. पिछले 7 साल से पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत निधि पाल ने इससे पहले अमर उजाला डिजिटल, न्यूज 24, ईटीवी भारत हैदराबाद जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने आईआईएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन लखनऊ से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

Read More
और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola
Advertisement

टॉप हेडलाइंस

भारत ही नहीं, अमेरिका में भी वोटर लिस्ट की गलतियां; कैसे हुईं हजारों एंट्री?
भारत ही नहीं, अमेरिका में भी वोटर लिस्ट की गलतियां; कैसे हुईं हजारों एंट्री?
कितने दिन में घिस जाते हैं ट्रेन के पहिये, कितने का आता है एक जोड़ा?
कितने दिन में घिस जाते हैं ट्रेन के पहिये, कितने का आता है एक जोड़ा?
एयरलाइन खोलने में कितना आता है खर्च, कितना है एक दिन का मुनाफा?
एयरलाइन खोलने में कितना आता है खर्च, कितना है एक दिन का मुनाफा?
ग्लोबल मार्केट में धूम मचा रहे ये भारतीय सुपरफूड्स, कहां-कहां होते हैं एक्सपोर्ट?
ग्लोबल मार्केट में धूम मचा रहे ये भारतीय सुपरफूड्स, कहां-कहां होते हैं एक्सपोर्ट?
Advertisement

वीडियोज

Sansani: दरिंदे पति ने हैवानियत की सारी हदें की पार!
Mallikarjun Kharge Statement: खरगे का विवादित बयान..सियासत में उबाल | Congress | Bihar | Patna
Mallikarjun Kharge Statement: कांग्रेस 'बाप' तक क्यों पहुंच गई? | Bihar News | Patna | Janhit
Anant Singh Inside Story: अनंत सिंह ने क्यों कहा JDU खत्म? | Nitish Kumar | Mokama | Bihar
Sandeep Chaudhary: रामलीला मैदान रैली पर बवाल..लोकतंत्र का है सवाल? | Congress Rally | INDIA Bloc
Advertisement

फोटो गैलरी

Advertisement

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
UP चुनाव से पहले इंडिया ब्लॉक से गठबंधन पर बोले ओवैसी, ‘हम बार-बार कह रहे...’
UP चुनाव से पहले इंडिया ब्लॉक से गठबंधन पर बोले ओवैसी, ‘हम बार-बार कह रहे...’
'सम्मान में कमी न आए...' रामगोपाल यादव के अल्टीमेटम पर राजकुमार भाटी
'सम्मान में कमी न आए...' रामगोपाल यादव के अल्टीमेटम पर राजकुमार भाटी
हरमनप्रीत और दीप्ति के शतक में उड़ा जिम्बाब्वे, भारत ने 121 रन से जीता दूसरा वनडे
हरमनप्रीत और दीप्ति के शतक में उड़ा जिम्बाब्वे, भारत ने 121 रन से जीता दूसरा वनडे
'मुझ पर हमला क्यों किया?' दावे को टाइगर श्रॉफ के स्पोक्सपर्सन ने किया खारिज
'मुझ पर हमला क्यों किया?' दावे को टाइगर श्रॉफ के स्पोक्सपर्सन ने किया खारिज
सौरव दास का बड़ा दावा- 'मैसेज नहीं कर पा रहा, मेरा Whatsapp अकाउंट...'
सौरव दास का बड़ा दावा- 'मैसेज नहीं कर पा रहा, मेरा Whatsapp अकाउंट...'
हाईवे पर इमरजेंसी में नहीं लग रहा 1033, तुरंत करें ये काम
हाईवे पर इमरजेंसी में नहीं लग रहा 1033, तुरंत करें ये काम
बिजली के तार से चिपका नन्हा लंगूर, मौत के मुहाने से खींच लाई मां
बिजली के तार से चिपका नन्हा लंगूर, मौत के मुहाने से खींच लाई मां
घर में नहीं है किचन गार्डन की जगह, जानें कैसे किराए पर उगाएं ताजी सब्जियां?
घर में नहीं है किचन गार्डन की जगह, जानें कैसे किराए पर उगाएं ताजी सब्जियां?
Embed widget