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Muharram 2026 : किसने की थी ताजिये बनाने की शुरुआत, किस शहर से निकला था पहला जुलूस?

Muharram 2026 : इस दौरान दुनिया भर के मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मजलिस, मातम, सबील और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं. मोहर्रम के दौरान सबसे प्रमुख प्रतीक ताजिया होता है.

Muharram 2026 : मोहर्रम का पाक महीना शुरू हो चुका है. इसी के साथ इस्लामी नए साल 1448 हिजरी का आगाज भी हो गया. मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना माना जाता है. इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत मोहर्रम महीने से होती है. यह इस्लाम के चार सबसे पाक महीनों में शामिल माना जाता है. मोहर्रम का महीना कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, जिसमें पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी थी. इसी वजह से मोहर्रम के पहले दस दिनों को गम और मातम के दिन माना जाता है.

इस दौरान दुनिया भर के मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मजलिस, मातम, सबील और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं. मोहर्रम के दौरान सबसे प्रमुख प्रतीक ताजिया होता है. कई लोग ताजिये को सिर्फ एक धार्मिक ढांचा मानते हैं, लेकिन इसके पीछे इतिहास और परंपरा की एक लंबी कहानी जुड़ी हुई है. आज भी भारत के कई शहरों में मोहर्रम के दौरान ताजिये निकाले जाते हैं और लाखों लोग इन जुलूसों में शामिल होते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि  ताजिये बनाने की शुरुआत किसने की थी और किस शहर से पहला जुलूस निकला था. 

क्या होता है ताजिया?

ताजिया इमाम हुसैन के कर्बला स्थित मकबरे का प्रतीकात्मक स्ट्रक्चर या नकली मॉडल माना जाता है. इसे कागज, बांस, लकड़ी, धातु और अन्य सजावटी चीजों से तैयार किया जाता है. ताजिया को खास तौर पर मोहर्रम के लिए बनाया जाता है. आमतौर पर ताजिया मोहर्रम की पहली तारीख से पहले या शुरुआती दिनों में घरों, इमामबाड़ों और अजाखानों में लाया जाता है. इसके बाद दसवीं मोहर्रम यानी यौम-ए-आशूरा के दिन इसे दफन किया जाता है या तय स्थान तक ले जाया जाता है.  

मोहर्रम में ताजिये क्यों निकाले जाते हैं?

मोहर्रम के दौरान होने वाली कई धार्मिक परंपराएं ताजिये के आसपास केंद्रित रहती हैं. इनमें मजलिस, मातम, नौहा, जुलूस, आलम और सबील जैसी परंपराएं शामिल हैं. ताजिया आने के बाद अजाखानों और इमामबाड़ों में शोक सभाएं आयोजित की जाती हैं. लोग या हुसैन की सदाएं लगाते हैं और कर्बला की घटनाओं को याद करते हैं. महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग जगहों पर शोक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. 

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ताजिये बनाने की शुरुआत किसने की थी?

ताजिया की शुरुआत को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मान्यता है. हालांकि एक लोकप्रिय मान्यता यह है कि 14वीं शताब्दी के अंत में मंगोल शासक तैमूर ने इस परंपरा को बढ़ावा दिया था. कहा जाता है कि अपने एक अभियान के दौरान तैमूर को कर्बला में इमाम हुसैन के मकबरे की एक प्रतिकृति मिली थी. इसके बाद उसने अपने सैनिकों को इमाम हुसैन की शहादत को याद करने के लिए उस प्रतिकृति का यूज करने को कहा. माना जाता है कि यहीं से ताजिये जैसे स्ट्रक्चर को लेकर जुलूस निकालने की परंपरा फेमस हुई. हालांकि कई इतिहासकार इस दावे को पूरी तरह प्रमाणित नहीं मानते हैं. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि ताजिया परंपरा के शुरुआती प्रमाण मुगल काल में ज्यादा साफ रूप से दिखाई देते हैं. 

पहला ताजिया जुलूस किस शहर से निकला था?

कुछ इतिहासकारों के अनुसार, तैमूर ने अपने शिविर में पहला ताजिया जुलूस निकाला था. वहीं, कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह घटना दिल्ली के बाहर किसी अन्य स्थान पर हुई थी. लखनऊ के एक इतिहासकार के अनुसार, ताजिया जुलूस की शुरुआत दिल्ली में होने के साफ प्रमाण नहीं मिलते, उनके अनुसार यह परंपरा दक्षिण एशिया के किसी अन्य हिस्से में शुरू हुई और बाद में मुगल काल में फेमस हुई. ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्स बताते हैं कि मुगल शासन के दौरान ताजिया जुलूसों का उल्लेख मिलता है. धीरे-धीरे यह परंपरा उत्तर भारत के कई हिस्सों में फैल गई. 

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