मोसाद का वो शातिर जासूस जो बनने वाला था दुश्मन देश का उप रक्षामंत्री, पकड़े गए तो बीच चौराहे पर हुई थी फांसी
Israeli Spy Eli Cohen: आपने कई सारे भारतीय बेहतरीन जासूसों की कहानी सुनी होगी. आज हम आपको इजराइल के एक ऐसे जासूस की खतरनाक कहानी बताने जा रहे हैं, जिसको दुश्मन देश में बड़ा पद ऑफर हुआ था.

भारत में ऑपरेशन सिंदूर के बाद से खुफिया तंत्र देश के दुश्मनों को खोजने में लगा हुआ है. ज्योति मल्होत्रा की तरह और भी देश के दुश्मन भारत की जासूसी करते हुए देश में पकड़े जा रहे हैं और उन पर नकेल कसी जा रही है. लेकिन आज हम आपको एक ऐसे जासूस के बारे में बताने जा रहे हैं, जो न सिर्फ दुश्मन मुल्क में जाकर उनका भरोसेमंद बना बल्कि कई साल तक वहां से जरूरी जानकारियां भी चुराकर अपने देश तक भेजता रहा. उसने अपने देश को सिक्स डेज वॉर जैसी जंग भी जितवाया. यहां तक कि एक वक्त ऐसा आया वह दुश्मन देश में डिप्टी मिनिस्टर ऑफ डिफेंस तक बन सकता था. लेकिन एक बार ऐसी बाजी पलटी कि सारा खेल खत्म हो गया. चलिए उसके बारे में जानें.
दो बार मोसाद से हुए रिजेक्ट
यह कहानी शुरू हुई थी गोलान हाइट्स से, जो कि एक पहाड़ी इलाका है और इसकी स्ट्रैटजिक अहमियत बहुत है. जॉर्डन नदी यहीं से गुजरती है जो कि इजराइल के लिए पानी का एक बड़ा स्रोत है. यहां से इजराइल को पानी का 30-40 फीसदी हिस्सा मिलता है. 1969 से पहले इस पप सीरिया ने कब्जा कर रखा था और सीरिया के सैनिक यहां से इजराइली बस्तियों पर हमले करते थे. फिर 1967 के सिक्स डे वॉर में इजराइल ने इस पर अपना आधिपत्य जमाया और सीरिया की सेना पीछे हट गई. इस जीत के पीछे जिस शख्स का हाथ था उसका नाम है एली कोहेन, जो कि मोसाद के जासूस थे. एली का मकसद शुरू से ही इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद में जाने का था, लेकि शुरू में दो बार मोसाद उनको रिजेक्ट कर चुकी थी. लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और एक दिन इजराइली आर्मी ज्वाइन कर ली.
ऐसे पहुंच गए सीरिया
एली की खासियत थी कि आवाज पर उनका जबरदस्त कंट्रोल. वे अलग-अलग लहजे में कई भाषाओं में बात कर सकते थे. वे एक बार जो देख लेते थे, उसको कभी भूलते नहीं थे. एक बार मेजर जनरल मेयर एमीट नाम के एक नए मोसाद अधिकारी ने उनकी फाइल देखकर छुपी हुई प्रतिभा को पहचाना और 1960 में उन्होंने फौज छोड़कर मोसाद ज्वाइन कर ली और सीक्रेट एजेंट बन गए. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पहले वो अर्जेंटीना गए और वहां पर अपनी पहचान बनाकर वफादारी साबित की. इसके बाद 1962 में सीरिया पहुंच गए. यहां उन्होंने कमल अमीन थाबेट के रूप में उन्होंने अपनी जिंदगी शुूरू की. यहां उनकी मुलाकात अल-हाफिज से हुई और यहीं से कोहेन की जासूसी की दुनिया में जबरदस्त बदलाव आया.
रक्षा मंत्री का पद तक हुआ ऑफर
अल-हाफिज सीरिया के ताकतवर नेता थे. 1963 में अल-हाफिज सीरिया के राष्ट्रपति बने और कोफेन व हाफिज की दोस्ती बहुत गहरी हो गई. हाफिज जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने कोहेन को रक्षा मंत्री का पद तक ऑफर कर दिया था. इतना ही नहीं हाफिज ने तो कोफेन के लिए यह भी कहा था कि उनके बाद सीरिया के राष्ट्रपति के पद के लिए कोफेन से बेहतर दावेदार नहीं हो सकता. सीरिया की राजधानी में कोहेन एक शानदार घर में रहते थे, जहां पर रेडियो ट्रांसमिशन केबल लगे थे. इसी के जरिए वे गोपनीय जानकारी अपने देश इजराइल भेजते थे. कोहेन हमेशा अपने पास सायनाइड की एक बोतल रखते थे कि अगर पकड़े गए तो पीकर जान दे देंगे.
सिक्स डेज वॉर में एली की चालाकी
एली कोहेन के जासूसी करियर में उनका गोलन हाइट्स का दौरा बहुत महत्वपूर्ण था. उन्होंने बहुत से संवेदनशील इलाकों की तस्वीर ली और वहां पर मिलिट्री की पोजिशन देखी. कहते हैं कि जहां पर सीरिया ने इजराइल की तरफ आर्टिलरी तैनात की थी, वहां पर एली ने अफसरों को मनवाकर यूकेलिप्टस के पेड़ लगवा दिए, जिससे कि सैनिकों को गर्मी से राहत मिल सके. इन्हीं पेड़ों की मदद से इजराइल ने सिक्स डेज वॉर जीता और गोलन हाइट्स पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि इन्हीं वजह से सीरियाई सैनिकों की सटीक लोकेशन पता चल रही थी.
बीच चौराहे पर हुई फांसी
फिर एक दिन 1965 में सीक्रेट इन्फॉर्मेशन भेजने के दौरान सीरिया की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट ने एली कोहेन को पकड़ लिया. उन पर मुकदमा चला और फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, बेल्जियम, अमेरिका और इटली जैसे देशों ने कोहेन की जान बख्शने की अपील की. इजराइल ने उनको बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन सीरिया नहीं माना. उनसे एली कोहेन को 18 मई 1965 को सरेआम चौराहे पर फांसी पर लटका दिया गया.
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