DME Gas India: LPG के लिए नहीं देखना पड़ेगा खाड़ी देशों का मुंह, भारत ने निकाल लिया तोड़; जानें कैसे बनती है DME गैस?
DME Gas India: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के दौरान वैश्विक ईंधन आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ रहा है. इसी बीच आइए जानते हैं क्या है डीएमई गैस और कैसे है यह फायदेमंद.

DME Gas India: जैसे-जैसे ईरान, इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव बढ़ रहा है वैश्विक ईंधन आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ रहा है. भारत में इसका असर एलपीजी की बढ़ती कीमत और इसकी कमी के डर के रूप में सामने आया है. इससे सीधे तौर पर घरेलू बजट प्रभावित हो रहा है. लेकिन इसी बीच पुणे के वैज्ञानिकों ने एक आशाजनक विकल्प खोज निकाला है. यह विकल्प है डीएमई गैस. यह आयातित ईंधन पर भारत की निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकती है.
डीएमई गैस क्या है?
डाइमिथाइल ईथर एक स्वच्छ जलने वाला सिंथेटिक ईंधन है. यह काफी हद तक एलपीजी जैसा ही होता है. इसका इस्तेमाल खाना पकाने और दूसरे घरेलू कामों के लिए किया जा सकता है. इसकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे उन संसाधनों का इस्तेमाल करके बनाया जा सकता है जो भारत में पहले से ही बड़े पैमाने पर मौजूद हैं.
डीएमई गैस कैसे बनाई जाती है?
इस गैस का उत्पादन मेथेनॉल से शुरू होता है. यह इसके लिए मुख्य कच्चे माल के तौर पर काम करता है. यह मेथेनॉल कई तरीकों से इकट्ठा किया जा सकता है. जैसे कोयला, एग्रीकल्चरल वेस्ट, बायोमास और हवा से पकड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड भी. वैज्ञानिकों ने एक स्वदेशी उत्प्रेरक विकसित किया है. यह मेथेनॉल को डीएमई में बदल देता है. यह प्रक्रिया नियंत्रित स्थिति में होती है, आमतौर पर 10 बार के दबाव पर. इसका एक बड़ा फायदा यह है कि तैयार उत्पाद को सीधे मौजूद एलपीजी सिलेंडरों में भरा जा सकता है.
एलपीजी का एक सहज विकल्प
डीएमई की सबसे बड़ी खूबियों में से एक इसकी मौजूदा बुनियादी ढांचे के साथ अनुकूलता है. इसे एलपीजी के साथ 20% तक मिलाया जा सकता है. वास्तव में 8% तक डीएमई के मिश्रण का इस्तेमाल मौजूद गैस स्टोव, पाइपलाइन या रेगुलेटर में बिना किसी बदलाव के किया जा सकता है. इसका मतलब है कि परिवारों को नए उपकरण खरीदने में निवेश की जरूरत नहीं होगी.
भारत के लिए आर्थिक लाभ
भारत वर्तमान में अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 50-60% हिस्सा इंपोर्ट करता है. इसका ज्यादातर हिस्सा खाड़ी देशों से ही आता है. यह निर्भरता विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालती है. खासकर वैश्विक संकटों के दौरान. विशेषज्ञों के मुताबिक एलपीजी की खपत का सिर्फ 8% हिस्सा भी डीएमई से बदलने पर भारत सालाना लगभग ₹9500 करोड़ बचा सकता है.
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Source: IOCL




























