Kanyadan Wedding Ritual: किसने किया था पहला कन्यादान, कहां से शुरू हुई बेटी को ससुराल भेजने की परंपरा?
Kanyadan Wedding Ritual : शादी की रस्मों में कन्यादान को सबसे बड़ी, जरूरी और इमोशनल रस्मों में गिना जाता है. इस रस्म में दुल्हन के माता-पिता अपनी बेटी का हाथ दूल्हे के हाथ में सौंपते हैं.

Kanyadan Wedding Ritual : भारतीय शादियों में रस्में शादी की प्रक्रिया का सबसे जरूरी हिस्सा होती हैं. साथ ही इनके पीछे अलग-अलग सामाजिक और पारिवारिक मान्यताएं भी जुड़ी होती हैं. इन्हीं रस्मों में कन्यादान को सबसे बड़ी, जरूरी और इमोशनल रस्मों में गिना जाता है. इस रस्म में दुल्हन के माता-पिता अपनी बेटी का हाथ दूल्हे के हाथ में सौंपते हैं और उसके नए जीवन के लिए आशीर्वाद देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कन्यादान की परंपरा आखिर शुरू कहां से हुई और सबसे पहले किसने अपनी बेटी को विवाह के बाद ससुराल भेजने की यह रस्म निभाई थी. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि पहला कन्यादान किसने किया था और बेटी को ससुराल भेजने की परंपरा कहां से शुरू हुई.
पहला कन्यादान किसने किया था?
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, पहला कन्यादान दक्ष प्रजापति ने किया था. कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की 27 बेटियां थीं, जिनका विवाह चंद्रदेव से हुआ था. इन 27 कन्याओं को 27 नक्षत्रों का प्रतीक भी माना जाता है. मान्यता है कि सृष्टि के संचालन और परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए दक्ष प्रजापति ने अपनी बेटियों को चंद्रदेव को सौंपा था. इसी मान्यता को आगे चलकर शादी में कन्यादान की परंपरा से जोड़कर देखा गया.
क्या होता है कन्यादान?
कन्यादान शब्द को आम तौर पर कन्या यानी बेटी और दान यानी सौंपने से जोड़कर समझा जाता है. शादी की रस्म में दुल्हन के पिता उसका हाथ दूल्हे के हाथ में रखते हैं. इसके बाद दूल्हा उसकी जिम्मेदारियों को निभाने और उसे सम्मान साथ ही प्रेम देने का वादा करता है. इस दौरान वैदिक मंत्रों को पढ़ा जाता है.
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बेटी को ससुराल भेजने की परंपरा कहां से शुरू हुई?
बेटी को शादी के बाद ससुराल भेजने की परंपरा की शुरुआत हिंदू शादी की पुरानी मान्यताओं से जुड़ी मानी जाती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 बेटियों की शादी चंद्रदेव से की थी और उन्हें चंद्रदेव को सौंपा था. इसी कथा को शादी के बाद बेटी को उसके पति के घर भेजने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. समय के साथ यह प्रथा हिंदू शादी का हिस्सा बन गई, जिसमें माता-पिता अपनी बेटी को नए जीवन की शुरुआत के लिए दूल्हे के साथ विदा करते हैं.
अलग-अलग जगहों पर अलग तरीका
कन्यादान की रस्म पूरे भारत में एक ही तरीके से नहीं निभाई जाती हैं. दक्षिण भारत की परंपरा में दुल्हन अपने पिता की हथेली पर हाथ रखती है और दूल्हा अपने ससुर की हथेली के नीचे हाथ रखता है. इसके बाद पवित्र जल डाला जाता है, जो दुल्हन की हथेली से होते हुए पिता और फिर दूल्हे की हथेली तक पहुंचता है. उत्तर भारत के कई हिस्सों में दुल्हन की हथेली कलश के ऊपर रखी जाती है. इसके बाद दूल्हा उसका हाथ पकड़ता है और फूल, गंगाजल साथ ही पान के पत्तों के साथ मंत्रों का पढ़ा जाता है फिर दूल्हा-दुल्हन का गठबंधन किया जाता है और इसके बाद सात फेरों की रस्म होती है.
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