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Most honest judge in India: इस जज को कहा जाता है भारत का सबसे ईमानदार न्यायाधीश, जानिए कौन थे जस्टिस खन्ना?

Most honest judge in India: जब बात न्यायपालिका की हो तो सबसे प्रमुख भूमिका जज और उनकी ईमानदारी की होती है. ऐसे में यह जानना रोचक होगा कि भारत के सबसे ईमानदार न्यायाधीश कौन थे.

Most honest judge in India: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ फैसलों से नहीं बल्कि अपने साहस और ईमानदारी से अमर हो गए. उन्हीं में से एक नाम हैं जस्टिस एच. आर. खन्ना का जिन्हें आज भी सबसे ईमानदार न्यायाधीश के रूप में याद किया जाता है. साथ ही उनका जीवन और उनके फैसले भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को मजबूत करने वाले माने जाते हैं.

शुरुआती जीवन और न्यायपालिका तक का सफर

आपको बता दें कि जस्टिस खन्ना का पूरा नाम हंसराज खन्ना था. उनका जन्म 3 जुलाई 1912 को अमृतसर में हुआ था. उन्होंने कानून की पढ़ाई के बाद वकालत शुरू की और धीरे-धीरे अपनी प्रतिभा के दम पर न्यायपालिका में ऊंचे पदों तक पहुंचे. इसके साथ ही वह 1971 में वे सुप्रीम कोर्ट के जज भी नियुक्त हुए. जब देश एक बड़े गंभीर संवेधानिक संकट से जूझ रहा था तब जस्टिस खन्ना जी का योगदान समाज में देखने को मिला था.

आपातकाल और एडीएम जबलपुर केस की पृष्ठभूमि

यह बात साल 1975 की है जब देश में आपातकाल लगाया गया. इस दौरान तमाम नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया. तभी इस बीच एक ऐतिहासिक मामला सुप्रीम कोर्ट में आया, जिसे “एडीएम जबलपुर केस” (Habeas Corpus Case) के नाम से जाना जाता है. इस केस में सवाल यह था कि क्या आपातकाल के दौरान भी किसी नागरिक को अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अदालत में जाने का अधिकार है या नहीं.

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अकेले खड़े होकर दिया ऐतिहासिक विरोध

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच बनी. चार जजों ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया कि आपातकाल के दौरान नागरिकों को अदालत जाने का अधिकार नहीं है. लेकिन जस्टिस खन्ना ने इस फैसले से असहमति जताई. उन्होंने अकेले खड़े होकर कहा कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार किसी भी हालत में छीना नहीं जा सकता, चाहे आपातकाल ही क्यों न हो.

ऐतिहासिक असहमति बनी मील का पत्थर

उनका यह dissent (असहमति) भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ. उस दौर में सरकार के विरुद्ध जाकर ऐसा फैसला देना किसी बहादुरी से कम नही था. जस्टिस खन्ना को पता था कि उनके इस फैसले का गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और उनकी इस ईमानदारी की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी. परंपरा के अनुसार, उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश बनना चाहिए था, लेकिन उनकी जगह जूनियर जज को यह पद दे दिया गया. इस फैसले से यह तो साफ था कि सरकार उनके फैसले से खुश नहीं थी. इसके बाद जस्टिस खन्ना ने इस्तीफा दे दिया.

इतिहास में बने न्याय के सच्चे नायक

हालांकि, उस समय उन्हें पद से वंचित कर दिया गया, लेकिन इतिहास ने उन्हें न्याय का सच्चा नायक बना दिया आज भी कानून के छात्र और न्यायाधीश उनके फैसले को आदर्श मानते हैं. उनका यह कथन-संविधान का अस्तित्व तभी है जब नागरिकों की स्वतंत्रता सुरक्षित हो -आज भी प्रासंगिक है. बताते चले जस्टिस खन्ना की छवि एक ऐसे न्यायाधीश की है, जिन्होंने सत्ता के दबाव के आगे झुकने के बजाय संविधान और न्याय को सर्वोपरि रखा. यही कारण है कि उन्हें सबसे ईमानदार न्यायाधीश कहा जाता है.

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