Constitution Amendment: कैसे होता है संविधान में संशोधन, किन-किन लोगों से लेनी पड़ती है इजाजत?
Constitution Amendment: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या संविधान में संशोधन हो सकता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

- संविधान संशोधन का अधिकार अनुच्छेद 368 के तहत संसद को है।
- विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग पारित होना अनिवार्य है।
- कुछ संशोधन संघीय ढांचे के लिए आधे राज्यों की मंजूरी मांगते हैं।
- राष्ट्रपति की सहमति अंतिम चरण है, वे इसे अस्वीकार नहीं कर सकते।
Constitution Amendment: भारतीय संविधान को दुनिया के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक माना जाता है. लेकिन यह कोई कठोर दस्तावेज नहीं है. बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरत पड़ने पर संविधान में संशोधन की अनुमति है. हालांकि इसकी प्रक्रिया को काफी सावधानी से बनाया गया है. इसी बीच आपको बता दें कि पिछले साल संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से संविधान का 130वां संशोधन विधेयक पेश किया गया था. फिलहाल इस पर संयुक्त संसदीय समिति जांच कर रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि संविधान में कैसे किया जाता है संशोधन और इसके लिए किस से इजाजत लेनी पड़ती है.
संविधान में संशोधन करने की शक्ति
संविधान में संशोधन करने का अधिकार संविधान के भाग XX में अनुच्छेद 368 के तहत दिया गया है. सिर्फ भारत की संसद ही संविधान संशोधन विधेयक को पेश कर सकती है और उसे पारित कर सकती है. राज्य विधानसभा स्वतंत्र रूप से संविधान में संशोधन पेश या फिर पारित नहीं कर सकती.
संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा या फिर राज्यसभा में किसी भी सरकारी मंत्री या फिर संसद के किसी निजी सदस्य द्वारा पेश नहीं किया जा सकता. कई दूसरे जरूरी विधायी प्रस्तावों के उलट ऐसे विधेयक को पेश करने से पहले राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी की जरूरत नहीं होती.
संसद के दोनों सदनों की मंजूरी जरूरी
एक बार पेश किए जाने के बाद संशोधन विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अलग-अलग बहस की जाती है. इसे दोनों सदनों में स्वतंत्र रूप से मंजूरी मिलनी चाहिए. सामान्य कानून के उलट अगर दोनों सदन संविधान संशोधन विधेयक पर सहमत नहीं होते तो संयुक्त बैठक का कोई भी प्रावधान नहीं है. जब तक दोनों सदन विधेयक को जरूरी तरीके से पारित नहीं करते तब तक संशोधन आगे नहीं बढ़ सकता.
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कुछ संशोधन के लिए राज्यों की मंजूरी भी जरूरी
हर संविधान संशोधन के लिए राज्य विधानसभा की सहमति की जरूरत नहीं होती. लेकिन अगर संशोधन भारत के संघीय ढांचे को प्रभावित करता है जैसे कि राष्ट्रपति के चुनाव, केंद्र और राज्यों की शक्तियां या फिर जीएसटी जैसे प्रावधान से संबंधित मामले, तो इसे कम से कम आधी राज्य विधानसभाओं द्वारा भी मंजूरी दी जानी चाहिए.
राष्ट्रपति की सहमति आखिरी चरण
संसद और जहां लागू हो वहां जरूरी राज्य विधानसभाओं द्वारा संशोधन को मंजूरी दिए जाने के बाद विधेयक को भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. 1971 में लागू हुए 24वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हैं. राष्ट्रपति इसे अस्वीकार नहीं कर सकते या फिर इस पर दोबारा विचार के लिए संसद को वापस नहीं भेजा जा सकता. एक बार मंजूरी मिलने के बाद संशोधन आधिकारिक तौर पर संविधान का हिस्सा बन जाता है.
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