ED खुद जांच शुरू कर देती है, लेकिन CBI को सिफारिश की जरूरत क्यों पड़ती है?
Jharkhand Protest CBI Investigation: झारखंड में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच सीबीआई जांच की मांग को लेकर गतिरोध जारी है. चलिए जानें कि सीबीआई को जांच के लिए अनुमति की जरूरत क्यों है.

- सीबीआई को राज्य में जांच के लिए सहमति जरूरी।
Jharkhand Protest CBI Investigation: झारखंड में जेपीएससी परीक्षा को लेकर छात्रों का विरोध प्रदर्शन लगातार 18वें दिन भी जारी है. राज्य सरकार ने परीक्षा रद्द करने और आयोग के सदस्यों के इस्तीफे जैसी 98 फीसदी मांगें पूरी करने का दावा किया है, लेकिन छात्र केवल सीबीआई जांच की मांग पर डटे हैं. इस प्रशासनिक टकराव के बीच देश की दो सबसे बड़ी जांच एजेंसियों- ईडी और सीबीआई की कानूनी शक्तियों पर नई बहस छिड़ गई है. सवाल उठ रहा है कि जो ईडी बिना राज्य की अनुमति किसी भी मामले में सीधी जांच कर सकती है, वहीं सीबीआई को जांच के लिए राज्य सरकार की औपचारिक सिफारिश और सहमति की जरूरत क्यों पड़ती है.
कैसे शुरू हुआ ED का सफर?
तो सबसे पहले ईडी के बारे में जान लेते हैं. ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय का इतिहास सात दशक पुराना है. 1 मई 1956 को विदेशी मुद्रा विनियमन कानून 1947 (FERA) के तहत वित्त मंत्रालय में एक छोटी प्रवर्तन इकाई बनाई गई थी. इसका मुख्य काम विदेशी मुद्रा के अवैध लेनदेन को रोकना था. शुरुआत में दिल्ली मुख्यालय के साथ मुंबई और कोलकाता में इसकी ब्रांच खुलीं. 1957 में इसका नाम बदलकर प्रवर्तन निदेशालय किया गया और मद्रास में नई शाखा जोड़ी गई. साल 1960 में इस एजेंसी को राजस्व विभाग के तहत लाया गया, जहां यह आज भी काम करती है.
विदेशी मुद्रा से मनी लॉन्ड्रिंग तक का विस्तार
साल 1991 में आर्थिक सुधारों के बाद फेरा कानून खत्म कर 1 जून 2000 को विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून (FEMA) लागू हुआ. इसके बाद वित्तीय अपराधों की रोकथाम के लिए 2002 में अंतरराष्ट्रीय नियमों के आधार पर धन शोधन निवारण कानून (PMLA) बना. 1 जुलाई 2005 से ईडी को इस कानून को लागू करने की पूरी शक्ति मिली. देश का पैसा हड़पकर विदेश भागने वाले आर्थिक अपराधियों और काला धन सफेद करने वालों पर लगाम कसने के लिए 21 अप्रैल 2018 से भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून (FEOA) के तहत भी ईडी को सीधी कार्रवाई का कानूनी अधिकार दिया गया.
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पीएमएलए के तहत ईडी को मिले असीमित अधिकार
पीएमएलए कानून काले धन को सफेद करने के धंधे को खत्म करने और अवैध कमाई से बनाई गई संपत्तियों को कुर्क करने के लिए बना है. इस कानून के तहत ईडी को किसी भी राज्य में जाकर छापेमारी करने, संदिग्धों से पूछताछ करने, संपत्तियां सीज करने और विशेष अदालत के आदेश पर उन्हें जब्त करने का सीधा अधिकार है. इसके लिए ईडी को किसी राज्य सरकार से अनुमति मांगने की जरूरत नहीं होती है.
सीबीआई का गठन और उसकी भूमिका
सीबीआई भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अधीन काम करती है. यह देश की मुख्य नोडल पुलिस एजेंसी है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरपोल के सदस्य देशों के साथ जांच का तालमेल बैठाती है. इसका काम सिर्फ पैसों की हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़े भ्रष्टाचार, हत्या, संगठित अपराध और गंभीर कानूनी उल्लंघनों की जांच करने वाली एक पूर्ण विधि प्रवर्तन एजेंसी है.
स्पेशल पुलिस से लेकर आधुनिक सीबीआई तक का सफर
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1941 में सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) बना था. आजादी के ठीक पहले 1946 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (DSPE एक्ट) लागू हुआ. 1963 में इसी व्यवस्था का नाम बदलकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई रखा गया. 1980 के दशक से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने भी जनहित के मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए केस सीबीआई को सौंपना शुरू कर दिया.

सीबीआई को राज्य सरकार की सहमति क्यों जरूरी?
भारतीय संविधान में पुलिस और कानून व्यवस्था राज्य सूची का विषय है. डीएसपीई एक्ट 1946 की धारा 2 के तहत सीबीआई सिर्फ केंद्र शासित प्रदेशों में सीधे केस दर्ज कर सकती है. इसी कानून की धारा 6 यह स्पष्ट करती है कि किसी भी राज्य में जांच करने के लिए सीबीआई को संबंधित राज्य सरकार की पूर्व सहमति या सिफारिश अनिवार्य रूप से लेनी होगी. जब तक राज्य सरकार अपनी सहमति नहीं देती, केंद्र सरकार भी सीबीआई को राज्य में सीधी समानांतर जांच का निर्देश नहीं दे सकती है.
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