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यहां विकास के नाम पर नहीं काटे जाते हैं पेड़, जानें कैसे काम करती है रीलोकेशन तकनीक

दुनिया के ज्यादातर देशों में विकास की अंधी दौड़ के नाम पर इमारत या सड़क बनाने के दौरान सबसे पहले पेड़ काट दिए जाते हैं. लेकिन एक ऐसा देश भी है जो इन पेड़ों को काटने की बजाय एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट कर देता है.

दुनियाभर में जब भी नई सड़कें, चमचमाती इमारतें या फिर नई रेलवे लाइन बिछाने की तैयारी की जाती है, तो विकास की इस अंधी दौड़ में सबसे पहली गाज सालों पुराने हरे-भरे पेड़ों पर ही गिरती है. इंसानी तरक्की के नाम पर जंगलों और शहरों के फेफड़ों के बेरहमी से साफ कर दिया जाता है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जिसने एक मिसाल पेश की है और सभी को हैरान कर दिया है. इस देश में विकास के नाम पर इन बहुमूल्य पेड़ों की बलि नहीं दी जाती है, बल्कि उनको बेहद वैज्ञानिक तरीके से नया जीवनदान दिया जाता है. आधुनिक इंजीनियरिं और तकनीकी विशेषज्ञता के दम पर ये लोग विशालकाय पेड़ को बिना नुकसान पहुंचाए एक जगह से दूसरी जगह सुरक्षित रीलोकेट कर देते हैं. चलिए देखें कि यह तकनीक कहां और कैसे काम करती है.

महीनों की कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक सूझबूझ का कमाल

किसी सालों पुराने भारी-भरकम वृक्ष को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने का यह काम सुनने में जितना आसान लगता है, हकीकत में यह बेहद जटिल और लंबा वक्त लेने वाला काम होता है. इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देने में कई महीनों और कभी-कभी तो साल भर से भी ज्यादा लंबा समय लग जाता है. पेड़ों को अपनी मूल जगह से हिलाने से बहुत पहले एक्सपर्ट्स उसकी जड़ों पर काम करना शुरू कर देते हैं, ताकि वह नए माहौल और नई मिट्टी में जाकर आसानी से खुद को ढाल सके और जीवित रह सके. इस पारंपरिक और बेहद वैज्ञानिक तकनीक को जापानी भाषा में नेमावाशी कहा जाता है. यह तकनीक सदियों पुरानी बागवानी कला और आज की आधुनिक इंजीनियरिंग का ऐसा बेजोड़ मेल है, जो प्रकृति के प्रति जापान के गहरे आदर को दर्शाता है.

तो क्या कंस्ट्रक्शन के रास्ते में आने वाले हर पौधे को करते हैं रीलोकेट?

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि जापान में कंस्ट्रक्शन के रास्ते में आने वाले हर छोटे-बड़े या नए पौधे को रीलोकेट किया जाता है. यह बेहद खर्चीली और जटिल प्रक्रिया मुख्य रूप से उन्हीं पेड़ों के लिए अपनाई जाती है जिनका कोई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या खास इकोलॉजिकल महत्व होता है. इनमें से ज्यादातर पेड़ सदियों पुराने मंदिरों, धार्मिक स्थलों, पारंपरिक जापानी बगीचों, सरकारी पार्कों या एतिहासिक मोहल्लों में स्थित होते हैं. ये पेड़ कई पीढ़ियों से एक ही जगह पर खड़े होकर वहां की स्थानीय विरासत का एक अभिन्न अंग बन चुके होते हैं. किसी भी परिपक्व पेड़ को बचाने से वहां की जैव विविधता और प्राकृतिक सुंदरता भी पूरी तरह से सुरक्षित रहती है और सरकार के बुनियादी ढांचे का काम भी बिना किसी रुकावट के लगातार चलता रहता है.

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जमीनी स्तर पर कैसे की जाती है इसकी तैयारी?

इस पूरी रीलोकेशन प्रक्रिया का सबसे अद्भुत और महत्वपूर्ण हिस्सा भारी-भरकम क्रेन या मशीनों के आने से बहुत पहले की जमीन के नीचे चुपचाप शुरू हो जाता है. पेड़ को उसकी जगह से हटाने से कई महीने पहले वनस्पति वैज्ञानिक और एक्सपर्ट्स उसकी जड़ों की बहुत सावधानी से छंटाई शुरू करते हैं. वे पूरी जड़ को एकसाथ कभी नहीं उखाड़ते हैं, बल्कि पेड़ के चारों ओर से चुनिंदा बड़ी जड़ों की धीरे-धीरे छंटाई करते हैं. ऐसा करने से पेड़ के मुख्य तने के पास बारीक और नई फीडर जड़ें बहुत तेजी से विकसित होती हैं. ये छोटी फीडर जड़ें ही किसी भी पेड़ के जिंदा रहने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होती हैं, क्योंकि मिट्टी से अधिकांश पानी और जरूरी पोषक तत्व सोखने का असली काम यही करती हैं.

पेड़ों को नए माहौल के तनाव से कैसे बचाते हैं?

रीलोकेशन यानी पेड़ को शिफ्ट करने से पहले इन नई और छोटी जड़ों को विकसित होने का पूरा समय दिया जाता है. ऐसा करने से पेड़ को ट्रांसप्लांट शॉक यानी नई जगह पर जाने से होने वाले तनाव और झटके का सामना नहीं करना पड़ता है और उसके सूखने का खतरा कम हो जाता है. पेड़ के आकार, उसकी मेटाई और उसकी प्रजाति के आधार पर जमीन के नीचे की जाने वाली इस शुरुआती तैयारी में छह महीने से लेकर एक साल या उससे ज्यादा का भी वक्त लग सकता है. जड़ों को पहले से तैयार की जाने की इसी जापानी कला को नेमावाशी कहा जाता है. इसका सीधा और शाब्दिक अर्थ होता है, जड़ों के चारों ओर घूमना. यह जापानी संस्कृति की गहरी सोच को प्रदर्शित करता है.

किस तरीके से रीलोकेट किए जाते हैं एतिहासिक पेड़?

जब महीनों की तैयारी के बाद जड़ों का यह पूरा तंत्र जमीन के नीचे सुरक्षित रूप से तैयार हो जाता है, तब जाकर पेड़ को उसकी जगह से हटाने का मुख्य और चुनौतीपूर्ण काम शुरू होता है. कंपनी के ट्रेंड कर्मचारी पेड़ के चारों और बहुत ही बारीकी से गहरी खुदाई करते हैं ताकि तैयार की गई नई जड़ों का मुख्य हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित रहे और उन पर कोई खरोंच न आने पाए. इसके बाद जड़ों के उस पूरे हिस्से को टाट या किसी मोटे सुरक्षात्मक कपड़े से अच्छी तरह से लपेटकर बांध दिया जाता है. इसके साथ ही सफर के दौरान किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए पेड़ के मुख्य तने औप उसकी भारी टहनियों को भी मजबूत रस्सियों के सहारे आपस में सुरक्षित बांध दिया जाता है.

नए ठिकाने पर रोपाई और निगरानी

पेड़ के वजन और उसके विशाल आकार के अनुसार बड़े-बड़े हाइड्रोलिक लिफ्टिंग उपकरण, भारी क्रेन और खासतौर पर डिजाइन किए गए बड़े ट्रकों का इस्तेमाल करके इसे इसके नए ठिकाने पर पहुंचाया जाता है. वहां पहले से ही वैज्ञानिक मापदंडों के अनुसार तैयार किए गए बड़े गड्ढे में इस पेड़ को दोबारा बहुत सुरक्षा के साथ रोपा जाता है. तेज हवाओं या फिर भारी बारिश से बचाने के लिए उसके चारों ओर लकड़ी या लोहे के मजबूत ढांचे का सहारा लिया जाता है. जब तक उस पेड़ में नई कोपलें और हरी पत्तियां दोबारा नहीं आ जातीं, तब तक विशेषज्ञों की टीम नियमित पानी, खाद और दवाओं के जरिए उसकी निगरानी करती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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