क्या दूसरे देशों में आर्मी बेस बनाकर किसी भी देश पर हमला कर सकता है US, जानें क्या हैं नियम?
ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. लेकिन क्या आपको पता है कि अमेरिका किसी दूसरे देश में सैन्य बेस बनाकर वहां से किसी अन्य देश पर हमला कर सकता है क्या? आइए जानें.

ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच छिड़ी जंग अब अपने दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुकी है. आसमान मिसाइलों और ड्रोनों से पटा हुआ है और खाड़ी देशों की शांति दांव पर है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही युद्ध के जल्द खत्म होने के संकेत दिए हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. इस बीच एक बड़ा कानूनी और रणनीतिक सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका या कोई भी देश किसी दूसरे देश में बने अपने मिलिट्री बेस का इस्तेमाल किसी तीसरे देश पर हमला करने के लिए कर सकता है? क्या अंतरराष्ट्रीय कानून और मेजबान देशों की संधियां इसकी इजाजत देती हैं?
युद्ध का 11वां दिन और ट्रंप का सिग्नल
आज 10 मार्च 2026 को जंग के 11वें दिन राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि युद्ध जल्द खत्म होने वाला है. इस बीच ईरान में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट है और मुजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना गया है. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक करने की कोशिश की, तो उसे 20 गुना ज्यादा ताकत से जवाब दिया जाएगा.
विदेशी सैन्य अड्डों से हमले के अंतरराष्ट्रीय नियम
संयुक्त राष्ट्र (UN) के चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता पर हमला करना प्रतिबंधित है, लेकिन जब बात दूसरे देश में स्थित सैन्य अड्डे की आती है, तो स्टेटस ऑफ फोर्सेज एग्रीमेंट (SOFA) लागू होता है. नियम यह है कि अमेरिका अपने विदेशी अड्डों का उपयोग कैसे करेगा, यह उस देश के साथ हुई द्विपक्षीय संधि पर निर्भर करता है. सामान्य तौर पर, अमेरिका को हमला करने के लिए उस मेजबान देश की सहमति की आवश्यकता होती है. हालांकि, अमेरिका अक्सर इन्हें अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानकर आत्मरक्षा के नाम पर बिना पूछे भी कार्रवाई कर देता है.
मेजबान देश की जिम्मेदारी और एग्रेशन का खतरा
अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, यदि कोई देश अपनी जमीन का उपयोग किसी दूसरे देश पर हमला करने के लिए होने देता है, तो वह भी उस युद्ध का हिस्सा माना जा सकता है. ईरान ने इसी तर्क के आधार पर खाड़ी देशों को चेतावनी दी है. नियम कहते हैं कि यदि कतर, बहरीन या यूएई जैसे देशों में स्थित अमेरिकी अड्डों से ईरान पर मिसाइलें दागी जाती हैं, तो कानूनी तौर पर ईरान को उन अड्डों पर जवाबी कार्रवाई करने का अधिकार मिल जाता है. यही कारण है कि खाड़ी देश अक्सर अमेरिका से यह लिखित आश्वासन मांगते हैं कि उनकी जमीन का इस्तेमाल हमले के लिए नहीं होगा.
SOFA संधि- सुरक्षा कवच या हमले की छूट?
अमेरिका की दुनिया भर के 100 से अधिक देशों के साथ सोफा (SOFA) संधि है. यह संधि अमेरिकी सैनिकों को मेजबान देश के कानूनों से सुरक्षा देती है, लेकिन यह संधि युद्ध शुरू करने का अधिकार नहीं देती है. यह केवल शांति काल में सैनिकों के रहने और ट्रेनिंग के नियम तय करती है. युद्ध की स्थिति में, मेजबान देश के पास यह अधिकार होता है कि वह अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल पर रोक लगा दे. हालिया संघर्ष में ईरान ने साफ किया है कि वह उन सभी अड्डों को वैध सैन्य लक्ष्य मानेगा जहां से उस पर हमले हो रहे हैं.
क्या भारत के अड्डों का इस्तेमाल कर सकता है अमेरिका?
हाल ही में यह अफवाह उड़ी थी कि अमेरिका ईरान पर हमले के लिए भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल कर रहा है. भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसे सिरे से खारिज करते हुए फेक बताया है. भारत और अमेरिका के बीच लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) है, जो ईंधन और रसद की आपूर्ति की अनुमति तो देता है, लेकिन यह किसी भी तरह से युद्ध के लिए सैन्य अड्डे का उपयोग करने या तीसरे देश पर हमले की अनुमति नहीं देता है. भारत ने हमेशा शांति और संयम की अपील की है.
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Source: IOCL


























