जब भारतीय नौसेना ने कराची पोर्ट को बनाया आग का समंदर, सात दिनों तक जलता रहा था पाकिस्तान
उस रात के भारत के हमले ने पाकिस्तान के कराची पोर्ट को आग का समंदर बना दिया और पाक की नौसेना को पंगु कर दिया था. सात दिन तक जलती आग ने 1971 के युद्ध में भारत की निर्णायक बढ़त को पुख्ता कर दिया था.

दिसंबर की वो सर्द रात, अरब सागर की लहरों पर सन्नाटा और दूर कराची की रोशनी. पाकिस्तान को जरा भी अंदाजा नहीं था कि समुद्र से ऐसी आग बरसने वाली है, जो उसके सबसे बड़े बंदरगाह की किस्मत बदल देगी. कुछ ही घंटों में हालात ऐसे बने कि कराची पोर्ट धधक उठा, तेल के भंडार जलने लगे और पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत बिखर गई. यह सिर्फ एक हमला नहीं था, बल्कि इतिहास का वो पल था जिसने पूरे युद्ध की दिशा तय कर दी.
1971 का युद्ध और समुद्र से आई चुनौती
साल 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हालात तेजी से बिगड़ चुके थे. पूर्वी पाकिस्तान में हालात बेकाबू थे और वहां भारतीय सेना निर्णायक बढ़त बना रही थी. इसी बीच पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उसकी नौसेना कराची पोर्ट के सहारे सुरक्षित रहेगी. कराची उस वक्त पाकिस्तान की आर्थिक और सैन्य रीढ़ था. यहीं से तेल, हथियार और रसद की सप्लाई होती थी. भारत जानता था कि अगर इस बंदरगाह को झटका दिया गया, तो पाकिस्तान की कमर टूट सकती है.
ऑपरेशन ट्राइडेंट की गुप्त तैयारी
भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल एस.एम. नंदा ने हालात को भांपते हुए एक साहसिक योजना बनाई. योजना इतनी गोपनीय थी कि दुश्मन को भनक तक न लगे. मिसाइल बोट्स से लैस एक छोटा लेकिन तेज बेड़ा तैयार किया गया. इस ऑपरेशन की कमान कमांडर बबरू भान को सौंपी गई. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से चर्चा के बाद हरी झंडी मिली और तय हुआ कि दुश्मन के दिल पर वार किया जाएगा.
वो रात जब कराची कांप उठा
3 दिसंबर की रात भारतीय नौसेना के जहाज चुपचाप कराची की ओर बढ़े. आधी रात के बाद जैसे ही ऑपरेशन शुरू हुआ, एंटी-शिप मिसाइलों ने तबाही मचा दी. यह पहली बार था जब भारत ने इस तरह की मिसाइलों का इस्तेमाल किया था. पाकिस्तानी नौसेना के जहाज पीएनएस खैबर, पीएनएस मुहाफिज और पीएनएस चैलेंजर बर्बाद हो गए. हथियारों की सप्लाई करने वाले जहाज तबाह हुए और कराची पोर्ट पर मौजूद ऑयल डिपो आग की चपेट में आ गया.
सात दिनों तक जलता रहा कराची पोर्ट
कराची के तेल भंडारों में लगी आग इतनी भयानक थी कि उसे बुझाना नामुमकिन हो गया. आग की लपटें मीलों दूर से दिख रही थीं. सात दिन तक लगातार जलते तेल ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और युद्ध क्षमता दोनों को गहरी चोट पहुंचाई. नौसेना के छोटे जहाजों से बंदरगाह बचाने की कोशिश नाकाम रही. एक ही रात में पाकिस्तान को ऐसा नुकसान हुआ, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी.
भारत को भी चुकानी पड़ी कीमत
इस ऑपरेशन में भारत को भी नुकसान हुआ. INS खुकरी डूब गया और करीब 200 नौसैनिक शहीद हुए. यह भारतीय नौसेना के इतिहास का एक दुखद क्षण था, लेकिन रणनीतिक तौर पर देखा जाए तो ऑपरेशन ट्राइडेंट ने पाकिस्तान की समुद्री ताकत लगभग खत्म कर दी. इसके बाद भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन पाइथन के जरिए बचे-खुचे ठिकानों पर भी हमला किया.
युद्ध का रुख और नौसेना दिवस
कराची पोर्ट पर हमले के बाद पाकिस्तान रक्षात्मक मुद्रा में आ गया. समुद्र से सप्लाई रुकने का असर जमीनी मोर्चे पर भी दिखा. पूर्वी पाकिस्तान में हालात तेजी से भारत के पक्ष में गए और 16 दिसंबर 1971 को 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया. इसी ऐतिहासिक नौसैनिक विजय की याद में भारत सरकार ने 4 दिसंबर को नौसेना दिवस घोषित किया, जो आज भी गर्व के साथ मनाया जाता है.
यह भी पढ़ें: क्या होती है कैटफिशिंग और यह कैसे की जाती है, जानें कौन है दुनिया का सबसे बड़ा कैटफिशर?
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL


























