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Sweat Tax: प्राचीन मिस्र में लगाया जाता था पसीने पर टैक्स, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

Sweat Tax: प्राचीन मिस्त्र में टैक्स देने का एक अनोखा तरीका अपनाया गया था. आइए जानते हैं क्या था यह तरीका और क्या थी इसे अपनाने की वजह.

Sweat Tax: प्राचीन मिस्त्र में पसीने पर टैक्स लगाया जाता था. यह सुनने में काफी ज्यादा अजीब लग सकता है लेकिन असलियत काफी ज्यादा प्रैक्टिकल और दिलचस्प थी. जिसे लोग पसीने पर टैक्स कहते हैं वह असल में जरूरी शारीरिक मेहनत का एक सिस्टम था जिसे कोर्वी कहा जाता था. उस समय जब सिक्कों और कागज की करेंसी का ज्यादा इस्तेमाल नहीं होता था टैक्स अक्सर पैसे में नहीं बल्कि सामान में या फिर मेहनत में दिया जाता था. पुराने मिस्त्र के समाज में अगर कोई राज्य को अनाज, जानवर या फिर खेती की दूसरी चीज नहीं दे सकता था तो उसे इसके बदले अपना समय और मेहनत देनी पड़ती थी. 

टैक्स देने के तरीके के तौर पर मेहनत 

पुराने मिस्त्र की इकोनॉमी ज्यादातर खेती पर आधारित थी. टैक्स आमतौर पर फसलों के रूप में इकट्ठा किए जाते थे. हालांकि हर कोई हमेशा अनाज या फिर सामान में पेमेंट नहीं कर सकता था. ऐसे मामलों में राज्य को हर साल एक तय समय के लिए सरकारी प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए काबिल आदमियों की जरूरत होती थी. इस जरूरी मेहनत को कोर्वी सिस्टम के नाम से जाना जाता था. सिक्कों के बजाय नागरिक मेहनत करके पेमेंट करते थे. खुदाई, उठाना, तराशना और सामान लाना ले जाना. पसीने पर टैक्स एक मॉडर्न डिस्क्रिप्शन है लेकिन यह इस सच्चाई को दिखाता है कि शारीरिक मेहनत ही सरकार को पेमेंट का काम करती थी. 

मिस्त्र के अजूबों का निर्माण 

मिस्त्र के ज्यादातर बड़े आर्किटेक्चर को इसी लेबर सिस्टम से सपोर्ट मिलता था. पिरामिड, मंदिर, नहरें और माइनिंग ऑपरेशन जैसे बड़े कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट काफी हद तक ऑर्गेनाइज्ड सरकारी लेबर पर निर्भर थे. गीजा पिरामिड परिसर के मशहूर पिरामिड अक्सर जबरदस्ती की मजदूरी से जुड़े होते थे. हालांकि मॉडर्न इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि कई मजदूर गुलामी के बजाय टैक्स की जिम्मेदारी को पूरा करने वाले सीजनल मजदूर थे. 

नील नदी और टैक्स रेट 

पुराने मिस्त्र में टैक्स नील नदी से काफी करीब से जुड़ा हुआ था. नदी की हर साल आने वाली बाढ़ फसलों की सफलता और इसलिए लगाए जाने वाले टैक्स के लेवल को तय करती थी. पानी का लेवल निलोमीटर नाम के एक डिवाइस से मापा जाता था. अगर नदी में अच्छी खासी बाढ़ आती थी तो इसका मतलब था उपजाऊ मिट्टी और खूब फसल. ऐसे सालों में टैक्स बढ़ा दिए जाते थे क्योंकि राज्य को खेती का ज्यादा उत्पादन होने की उम्मीद होती थी. बाढ़ कम होती तो फसल खराब हो जाती और टैक्स की मांग को उसी हिसाब से एडजस्ट किया जा सकता था.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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