बेस ईयर बदलने से कैसे बदल जाते हैं GDP के आंकड़े, इसका कितना बड़ा रोल?
GDP Growth: हाल ही में भारत की जीडीपी ग्रोथ को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. आइए जानते हैं कि बेस ईयर बदलने से जीडीपी के आंकड़े कैसे बदल जाते हैं.

- 7.8% जीडीपी वृद्धि पर राजनीतिक विवाद, विपक्ष ने दावे उठाए।
- पूर्व सांख्यिकीविद् ने जीडीपी आधार वर्ष बदलाव को बताया कारण।
- नए आधार वर्ष में उभरते क्षेत्रों का बेहतर मूल्यांकन होता है।
- आधार वर्ष बदलाव केवल माप है, भौतिक वृद्धि नहीं।
GDP Growth: मौजूदा फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8% दर्ज की गई है. इस आंकड़े के जारी होने से देश में एक बड़ा आर्थिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. जहां विपक्ष और कुछ आलोचकों का यह दावा है कि असल ग्रोथ रेट सिर्फ 2.6% थी वहीं सरकार और जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने इस दावे को बे-बुनियाद बता कर खारिज कर दिया है.
क्यों बताया जा रहा है इस दावे को बे-बुनियाद?
भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् और जाने माने अर्थशास्त्री टीसीए अनंत के मुताबिक भारत का जीडीपी बेस ईयर अब 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है. ऐसे बदलाव आमतौर पर समय-समय पर किए जाते हैं ताकि इस बात को पक्का किया जा सके कि जीडीपी की गणना अर्थव्यवस्था के बदलते ढांचे को सही ढंग से दिखाए. जब भी कोई नया बेस ईयर लागू किया जाता है तो पिछले सालों के आंकड़ों की भी नए बेंचमार्क के हिसाब से दोबारा गणना की जाती है. इससे एक बड़ा सवाल उठता है. जीडीपी बेस ईयर बदलने से आर्थिक आंकड़ों पर क्या असर पड़ता है और बेस ईयर इतना जरूरी क्यों है?

जीडीपी बेस ईयर क्या है?
बेस ईयर असल में किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक ग्रोथ और आकार की गणना के लिए एक रेफरेंस पॉइंट का काम करता है. जीडीपी को मौजूदा कीमतों और स्थिर कीमतों दोनों पर मापा जा सकता है. वास्तविक जीडीपी ग्रोथ की गणना के लिए चुने गए बेस ईयर की कीमतों का इस्तेमाल बेंचमार्क के तौर पर किया जाता है.
हालांकि जैसे-जैसे समय के साथ अर्थव्यवस्था बदलता है पुराना बेस ईयर देश के आर्थिक ढांचे को सही ढंग से नहीं दिखा पाता. नए उद्योग उभरते हैं, ग्राहकों की पसंद बदलता है और कुछ सेक्टर एक दशक पहले की तुलना में काफी ज्यादा अहम हो जाते हैं. इस वजह से बेस ईयर को अपडेट करने से आर्थिक मापदंड इन बदलावों को बेहतर ढंग से दिखा पाते हैं.
बेस ईयर बदलने पर जीडीपी के आंकड़े क्यों नहीं बदलते?
जब सरकार बेस ईयर बदलती है तो आर्थिक गतिविधि को मापने के तरीके में दो बड़े बदलाव होते हैं:
नई वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करना
वक्त के साथ अर्थव्यवस्था का ढांचा काफी बदल जाता है. जो उत्पाद और सेवा पिछले बेस ईयर के दौरान या तो मौजूद नहीं थे या काफी कम अहम थे वे आर्थिक गतिविधि में बड़ा योगदान देने वाले बन सकते हैं.
उदाहरण के लिए बीते कुछ सालों में डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स, सोलर एनर्जी और गिग इकॉनमी जैसे क्षेत्रों का महत्व काफी बढ़ चुका है. नए मापन ढांचे में ऐसे उभरते क्षेत्रों को शामिल करने से जीडीपी गणना का दायरा बढ़ सकता है. इसी के साथ पुराने क्षेत्रों का सापेक्ष महत्व भी बदल सकता है. इस वजह से एक नया बेस ईयर यह दिखाता है कि असल में आर्थिक गतिविधि को क्या चीज आगे बढ़ा रही है.
महंगाई के असर को कम करना
बेस ईयर का एक मुख्य मकसद उत्पादन में असल बढ़ोतरी और सिर्फ कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से सामान और सेवा की कीमत में हुई बढ़ोतरी के बीच फर्क करना है. रियल जीडीपी एक तय समय की कीमतों का इस्तेमाल करती है. इससे यह पता लगाना मुमकिन हो जाता है कि क्या अर्थव्यवस्था ने असल में ज्यादा सामान और सेवा बनाई हैं या फिर जीडीपी में बढ़ोतरी मुख्य रूप से महंगाई की वजह से बनी हुई है.
जब बेस ईयर को अपडेट किया जाता है तो हिसाब किताब के लिए इस्तेमाल होने वाला कीमत का ढांचा भी मौजूदा आर्थिक हालात के ज्यादा करीब आ जाता है. इससे अर्थव्यवस्था का हिसाब लगाया गया आकार और विकास दर बदल सकती है.

क्या बेस ईयर बदलने से अर्थव्यवस्था बढ़ जाती है?
ऐसा जरूरी नहीं है. बेस ईयर में बदलाव का मतलब यह नहीं है कि देश का भौतिक उत्पादन अचानक रातों रात बढ़ गया. इसके बजाय यह आर्थिक गतिविधि को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सांख्यिकीय पैमाने को बदल देता है.
इसे पुराने मापने वाले पैमाने को नए और ज्यादा सही मापने से बदलने जैसा समझें. जिस चीज को मापा जा रहा है वह जरूरी नहीं है कि बदली हो, लेकिन माप अलग हो सकता है क्योंकि रेफरेंस पॉइंट बदल गया है.
यही वजह है कि नया बेस ईयर लागू होने पर पिछले सालों के जीडीपी आंकड़ों में भी बदलाव किया जा सकता है. पुराने डेटा का नए तरीके और बेंचमार्क का इस्तेमाल करके फिर से हिसाब लगाया जाता है ताकि अलग-अलग सालों के बीच तुलना सार्थक बनी रहे.
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यह बदलाव क्यों जरूरी
बेस ईयर को अपडेट करने से अर्थव्यवस्था के अनुमानित आकार में बदलाव हो सकता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नए तरीके में ऐसी आर्थिक गतिविधि और सेक्टर शामिल किए जा सकते हैं जिन्हें पिछले ढांचे के तहत ठीक से शामिल नहीं किया गया था.
यही वजह है कि नए मापन सिस्टम के तहत भारत की जीडीपी बड़ी दिख सकती है. इसका मतलब यह नहीं कि अर्थव्यवस्था रातों-रात उतनी ही बढ़ गई. बल्कि अपडेट किए गए बेंचमार्क और तरीके की वजह से सांख्यिकीय अनुमान व्यापक या अलग हो गया.
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