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Ballimaran History: बल्लीमारान में क्या सच में बिल्ली मारने वाले रहते थे? जानिए कैसे पड़ा इसका नाम

Ballimaran History: दिल्ली के बल्लीमारान का नाम तो आप सभी ने सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं की इसके नाम के पीछे की क्या कहानी है? आज हम आपको इसी दिलचस्प कहानी के बारे में बताएंगे.

Ballimaran History: दिल्ली की पुरानी गलियां एक जीते जागते म्यूजियम जैसी लगती हैं. यहां के हर कोने में एक अनोखी कहानी और एक बड़ा इतिहास छिपा हुआ है. आज हम एक ऐसी ही जगह की बात करने जा रहे हैं जिसने शायर, स्वतंत्रता सेनानी, कारीगरों और व्यापारियों के पदचिन्हों को महसूस किया है. हम बात कर रहे हैं बल्लीमारान की. यह जगह आज भी एक तरफ चश्मे की दुकानों और दूसरी तरफ जूते की दुकानों के लिए मशहूर है. लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं मालूम की इस जगह का यह नाम कैसे पड़ा. लोगों को लगता है कि यहां बिल्लियों को मारने वाले रहते थे. लेकिन यह सच नहीं है. बल्कि सच तो और भी दिलचस्प है. आइए जानते हैं इसी दिलचस्प सच को.

क्यों पड़ा इसका यह नाम? 

बल्लीमारान शब्द का मतलब होता है 'बल्ली मारने वाला'. दरअसल मुगल काल में दिल्ली के पास यमुना नदी ज्यादा गहरी नहीं होती थी और नाव की पतवार आसानी से नदी के तल से टकरा जाती थी. यही वजह थी की नाव चलाने वाले लंबी बांस की छड़ें इस्तेमाल करते थे. इनमें से ज्यादातर नाविक उसी जगह पर रहते थे जिसे अब बल्लीमारान कहा जाता है.

खास बात यह है कि मुगलों के शाही परिवारों से उनका संबंध काफी अच्छा होता था, जिस वजह से उनका शहर में काफी रुतबा था. लेकिन समय के साथ-साथ यहां पर नाविक कम होने लगे. इसके बाद यह जगह एक दूसरी कला के लिए मशहूर हो गई. वह कला थी 'चांदी की नक्काशी'. यहां के कारीगर इतने कमाल के थे की पूरी दिल्ली में उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता था.

बल्लीमारान से कुछ मशहूर हस्तियों का नाता 

बल्लीमारान सिर्फ व्यापार या फिर कारीगरी के लिए ही नहीं बल्कि कई महान लोगों के लिए भी मशहूर है. आपको बता दें कि प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब पास की ही एक गली कासिम जान में रहते थे. यह गली बल्लीमारान की यादों का एक खूबसूरत हिस्सा है. गालिब के घर को अब एक विरासत स्थल के रूप में बदल दिया गया है जहां कविता प्रेमी अक्सर आते रहते हैं. 

इसी के साथ विदाई के कवि मौलाना हसरत मोहानी ने भी इन्हीं गलियों से प्रेरणा पाई है. उनकी गजल जैसे 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है', या फिर कई शेर जैसे 'नहीं आती तो उनकी याद बरसों तक नहीं आती, मगर जब आते हैं तो अक्सर याद आते हैं' इन्हीं गलियों में लिखे गए हैं. मशहूर चिकित्सक और स्वतंत्रता सेनानी हकीम अजमल खान कभी यहीं पर एक बड़ा सा घर था. इस घर में कांग्रेस नेताओं और क्रांतिकारियों का आना-जाना लगा रहता था. साथ ही जाकिर हुसैन जो बाद में भारत के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बने, भी बल्लीमारान के काफी करीब थे. उस समय वे यहां के हाफिज होटल में जरूर खाना खाते थे.

खैर, यूं तो अब यहां पर नाव चलाने वालों और चांदी की कारीगरी करने वालों की रौनक नहीं रही लेकिन अभी भी यह जगह अपने बाजार, पुरानी इमारतों और कविताओं की यादों की वजह से आज भी खूबसूरत है. बाहर से अगर देखोगे तो जूते और चश्मे बिकते हुए नजर आएंगे लेकिन जब इसकी गलियों में से गुजरोगे तो शायर और देशभक्ति की कहानी बयां होंगी .

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