तीनों चुनाव आयुक्तों में मतभेद हो तो फैसला कैसे होता है, क्या है नियम?
संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के कानून के तहत चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के पास बराबर वोट और अधिकार होते हैं. किसी भी विषय पर मतभेद होने पर जो नियम तय किया गया है उस आधार पर फैसला होता है.

भारत के तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज और निर्णय प्रक्रिया को लेकर हाल ही में काफी चर्चा देखने को मिली है. मीडिया रिपोर्ट की एक पड़ताल में सामने आया कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्तों की ओर से कम से कम 14 बार अलग राय या आपत्तियां दर्ज की गईं. इस पर सफाई देते हुए आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर देश की सबसे बड़ी चुनावी संस्था में फैसले लेने का कानूनी आधार और तय प्रक्रिया क्या है और मतभेद पर निर्णय कैसे होते हैं.
संविधान के अनुच्छेद 324 से मिलती है चुनाव आयोग को शक्ति
भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना और उसकी शक्तियों का मूल आधार देश का संविधान है. संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को संसद, राज्यों की विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के चुनावों के संचालन, दिशा-निर्देशन और मतदाता सूची तैयार करने का पूरा अधिकार देता है. इसी अनुच्छेद के तहत देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी इस संस्था पर डाली गई है. इसमें यह भी व्यवस्था की गई है कि आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) होंगे और राष्ट्रपति की ओर से तय की जाने वाली संख्या के अनुसार अन्य चुनाव आयुक्त शामिल किए जाएंगे. प्रशासनिक और संवैधानिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ही इस पूरे आयोग की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं.
2023 का नया कानून और फैसले
चुनाव आयोग के दैनिक कामकाज और प्रशासनिक नियमों को संचालित करने के लिए 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' लागू है. इस कानून की धारा 17 में साफ तौर पर लिखा है कि आयोग का सारा कामकाज इसी एक्ट में बताए गए नियमों के तहत पूरा किया जाएगा. कानून यह सुनिश्चित करता है कि चुनावी फैसलों में पारदर्शिता बनी रहे और प्रक्रिया में किसी एक व्यक्ति का एकाधिकार न हो. इसके तहत आयोग के सभी सदस्यों को संस्थागत जिम्मेदारियों को मिलकर निभाने और स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने का पूरा कानूनी अधिकार दिया गया है.
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सर्वसम्मति न बनने पर कैसे लिया जाता है निर्णय?
2023 के अधिनियम की धारा 18 में आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाया गया है. नियम के मुताबिक आयोग का यह प्रयास रहता है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से यानी तीनों सदस्यों की आपसी सहमति से लिए जाएं. हालांकि, अगर किसी गंभीर मुद्दे या शिकायत पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच राय एक जैसी नहीं बनती है, तो उस मामले में बहुमत के आधार पर फैसला किया जाता है. चूंकि वर्तमान में आयोग में कुल तीन सदस्य (एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त) शामिल हैं, इसलिए दो सदस्यों की सहमति से लिया गया निर्णय ही आयोग का आधिकारिक फैसला माना जाता है.
तीनों आयुक्तों को हासिल हैं बराबर अधिकार
आम तौर पर यह धारणा रहती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास बाकी सदस्यों से ज्यादा अधिकार होते हैं, लेकिन कानूनी रूप से ऐसा बिल्कुल नहीं है. यद्यपि मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और संस्था का चेहरा होते हैं, मगर जब किसी प्रस्ताव या विवाद पर वोटिंग की नौबत आती है, तो तीनों सदस्यों के पास बिल्कुल बराबर अधिकार होता है. मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों में से प्रत्येक के पास केवल एक-एक वोट का अधिकार होता है. इसका सीधा मतलब यह है कि दो चुनाव आयुक्त मिलकर मुख्य चुनाव आयुक्त की राय से अलग बहुमत वाला फैसला भी पारित कर सकते हैं.
कब एक-सदस्यीय से तीन-सदस्यीय बना आयोग?
चुनाव आयोग की संरचना हमेशा से तीन सदस्यों की नहीं रही है. साल 1993 से पहले यह मुख्य रूप से एक-सदस्यीय निकाय के रूप में काम करता था. 1993 में केंद्र सरकार ने इसे स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय बनाते हुए तीन सदस्यों का आयोग बना दिया. उस समय के चर्चित मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन और नवनियुक्त चुनाव आयुक्तों एम. एस. गिल और जी. वी. जी. कृष्णमूर्ति के बीच शक्तियों को लेकर काफी तीखा टकराव देखने को मिला था. टी. एन. शेषन ने अन्य दो आयुक्तों की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी, लेकिन अदालत ने सरकार के फैसले को बरकरार रखते हुए बहु-सदस्यीय व्यवस्था को सही ठहराया.
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और दर्जा
वर्ष 1995 में टी. एन. शेषन बनाम भारत सरकार मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग के कामकाज की स्थिति पूरी तरह साफ कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का संवैधानिक दर्जा, वेतन, भत्ते और शक्तियां बिल्कुल समान हैं. अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले से यह बात हमेशा के लिए स्थापित हो गई कि निर्णय प्रक्रिया में तीनों सदस्यों की भूमिका पूरी तरह बराबर होगी और मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य आयुक्तों पर कोई विशेषाधिकार या वीटो पावर हासिल नहीं है.
2009 में सीईसी और चुनाव आयुक्त का चर्चित विवाद
आयोग के इतिहास में मतभेद का एक और बड़ा उदाहरण जनवरी 2009 में देखने को मिला था. उस समय तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को एक पत्र भेजकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश कर दी थी. उन्होंने नवीन चावला पर राजनीतिक रूप से निष्पक्ष न होने का आरोप लगाया था. हालांकि, राष्ट्रपति भवन की ओर से इस सिफारिश पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. इसके बाद जब एन. गोपालस्वामी का कार्यकाल खत्म हुआ, तो परंपरा के अनुसार नवीन चावला को ही देश का अगला मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया था.

अगर कोई चुनाव आयुक्त सहमत हो तो क्या करें?
चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार, देश भर से आने वाली चुनाव संबंधी शिकायतों और प्रशासनिक मामलों पर सदस्यों के बीच अलग-अलग विचार होना एक सामान्य प्रक्रिया है. आयोग आमतौर पर लंबित मामलों पर विचार-विमर्श करने के लिए हफ्ते में एक या दो बार औपचारिक बैठकें करता है. इन बैठकों में गहन मंथन के बाद ही कोई अंतिम निर्देश जारी किया जाता है. यदि कोई चुनाव आयुक्त बहुमत के फैसले से पूरी तरह असहमत होता है, तो उसे यह पूरा हक है कि वह संबंधित सरकारी फाइल या मिनट्स पर अपनी लिखित असहमति दर्ज करा सकता है.
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