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Afghanistan History: पहले अमेरिका फिर पाकिस्तान! जानें परमाणु शक्ति न होते हुए भी दुश्मनों को कैसे धूल चटाता है अफगानिस्तान?

Afghanistan History: अफगानिस्तान के पास कोई परमाणु हथियार नहीं है. लेकिन इसके बावजूद भी वह अमेरिका और पाकिस्तान जैसे देशों को धूल चटाने में कामयाब रहा. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह?

Afghanistan History: अफगानिस्तान जिसे अक्सर साम्राज्यों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है हजारों साल पुराने इतिहास को अपने अंदर समेटे हुए है. सदियों से अफगानिस्तान ने साम्राज्यों के उत्थान और पतन के साथ साथ आक्रमणों और विदेशी कब्जों को देखा है. हाल के समय में पाकिस्तान के साथ इसके संबंध काफी ज्यादा तनावपूर्ण चल रहे हैं. हालांकि इसकी जड़ें काफी पुरानी हैं. इसी तरह अमेरिका से भी अफगानिस्तान के संबंध कुछ खास नहीं रहे. आज हम जानेंगे कि बिना परमाणु शक्ति के भी कैसे अफगानिस्तान अपने दुश्मनों को धूल चटाता आया है. इससे पहले एक नजर डालते हैं अफगानिस्तान के इतिहास पर. 

प्राचीन इतिहास और इस्लाम का प्रसार 

अफगानिस्तान में मानव बस्ती पाषाण युग से चली आ रही है. समय के साथ-साथ यह फारसी साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य और सिकंदर महान की विजय जैसे प्रमुख साम्राज्यों का हिस्सा बनता गया. सातवीं शताब्दी ईस्वी तक यहां इस्लाम का प्रसार शुरू हो गया और नौवीं शताब्दी तक यह है एक प्रमुख धर्म बन गया. 

मध्यकालीन काल के दौरान अफगानिस्तान मुगल और सफवी फारसी साम्राज्य के बीच एक युद्ध क्षेत्र था. 18 वीं शताब्दी में अहमद शाह दुर्रानी ने दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की. इसके बाद 19वीं शताब्दी में आते-आते ब्रिटिश और रूसी साम्राज्य के बीच एक भू राजनीतिक संघर्ष 'ग्रेट गेम' आया. इसका प्रभाव अफगानिस्तान पर भी पड़ा लेकिन 1919 में अफगानिस्तान ने पूर्ण संप्रभुता प्राप्त की. 

सोवियत युद्ध और अमेरिकी हस्तक्षेप 

1979 के सोवियत आक्रमण ने एक बड़े युद्ध को जन्म दिया. 1989 में सोवियत वापसी के बाद अफगानिस्तान गृह युद्ध में उलझ गया. यही वजह थी कि 1990 के दशक में तालिबान का शासन स्थापित हुआ. 9/11 कि हमले के बाद 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को अस्थायी रूप से हटा दिया. लेकिन 2 दशकों की सैन्य उपस्थिति भी स्थायी नियंत्रण हासिल नहीं कर पाई. 2021 में अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान ने दोबारा सत्ता हासिल कर ली. 

परमाणु हथियारों के बिना अफगानिस्तान की मजबूती 

दरअसल अफगान लड़ाके गुरिल्ला युद्ध में माहिर होते हैं. यह घात लगाकर हमला करने में विश्वास रखते हैं और हिट एंड रन हमलों का इस्तेमाल करके पहाड़ी गुफाओं में छिप जाते हैं. इलाके का स्थानीय ज्ञान भी उन्हें काफी जरूरी लाभ देता है. इसके अलावा अगर हथियारों की बात करें अफगानिस्तान के पास हथियारों का सबसे बड़ा स्रोत अमेरिका रहा है. दरअसल जब अमेरिका 2021 में अफगान से अपनी सेना लेकर लौटा था तो बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण और हथियार वहीं छोड़ गया था. इसके अलावा अफगानिस्तान के पास सोवियत काल के हथियार भी हैं. इतना ही नहीं बल्कि पिछले 40 सालों के युद्धों में तालिबान ने अफगानिस्तान सी और बाकी समूह से बड़ी मात्रा में हथियार और गोला बारूद जब्त किए हैं.

इसी के साथ अगर बाकी देशों के समर्थन की बात करें तो चीन, ईरान, कतर और रूस पर तालिबान को समर्थन देने के आरोप लगाते आए हैं. इतना ही नहीं बल्कि तालिबान को पाकिस्तान से समर्थन मिलने के भी आरोप लगाते रहे हैं. दूसरी और अफगानिस्तान की पहाड़ी भूभाग खासकर हिंदू कुश पर्वतमाला विदेशी सेनन के लिए काफी बड़ी चुनौती साबित होती है. सैकड़ों गुफाएं लड़ाकों के लिए सुरक्षित आश्रय देती हैं. जिस वजह से किसी भी सेना के लिए स्थायी नियंत्रण हासिल करना काफी ज्यादा मुश्किल हो जाता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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