दिल्ली में क्यों नहीं बन सकती बुर्ज खलीफा जैसी इमारत, क्या हैं दिक्कतें?
राजधानी दिल्ली में 2047 तक कई हाईराइज बिल्डिंग बनाने का सरकार का प्लान है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या यहां पर बुर्ज खलीफा जैसी इमारत क्यों नहीं बन सकती है. इसमें क्या दिक्कतें हैं.

- भारी संसाधन खपत, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन बड़ी चुनौतियां हैं।
दिल्ली में जमीन की कमी, बढ़ती आबादी, बढ़ता प्रदूषण आम समस्याएं हो चुकी हैं. ऐसे में अब देश की राजधानी के विकास की तस्वीर बदलने जा रही है. अब शहर का विस्तार जमीन की बजाए ऊंचाई में देखने को मिलेगा, यानि कि अब दिल्ली में मास्टर प्लान 2047 में हाइराइज इमारतों को बढ़ावा देने की योजना बनाई जा रही है. हाईराइज बिल्डिंग की बात हो और बुर्ज खलीफा का जिक्र न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर दिल्ली में इस तरीके की बिल्डिंग क्यों नहीं बन सकती है और अगर बन गई तो इसके क्या नुकसान हैं.
दिल्ली में बुर्ज खलीफा जैसी इमारत बनाने के जोखिम
दिल्ली में इतनी बड़ी और ऊंची इमारत बनाने के लिए सबसे बड़ा और प्राकृतिक नुकसान वहां का भूकंपीय दायरा है. पूरी दिल्ली और एनसीआर का क्षेत्र उच्च भूकंपीय जोखिम वाले सिस्मिक जोन-IV में आते हैं. इस जोन में हर वक्त तेज झटके आने की संभावना बनी ही रहती है. जितने भी लोग दिल्ली या एनसीआर के इलाके में रहते हैं, वो इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं कि वहां पर अक्सर भूकंप आते ही रहते हैं. यही कारण है कि अगर यहां पर बुर्ज खलीफा की तरह से बहुत ऊंची इमारतें बनाई जाएं तो सबसे पहले उन बिल्डिंग्स को भूकंपरोधी करना होगा, जिसके लिए इंजीनियरिंग व सुरक्षा मानकों पर करोड़ों रुपये खर्चा होंगे. इस वजह से परियोजना की लागत काफी बढ़ जाएगी.
हवाई उड़ानों को लेकर नियम
इतनी ऊंची बिल्डिंग के लिए प्राकृतिक खतरों के अलावा देश के उड्डयन नियम और प्रशासनिक सीमाएं भी रास्ते का रोड़ा हैं. भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के कड़े दिशा-निर्देशों के कारण हवाई अड्डों के आसपास इमारतों की ऊंचाई पर सख्त पाबंदियां लागू रहती हैं. वहां पर एक तय मानक से ज्यादा बिल्डिंग की ऊंचाई को नहीं बढ़ा सकते हैं. इसके साथ-साथ राजधानी में लागू पुराना फ्लोर स्पेस इंडेक्स नियम भी डेवलपर्स को एक सीमित जमीन पर अत्यधिक ऊंचाई तक इमारत का निर्माण करने की अनुमति नहीं देता है.
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भारी-भरकम लागत और तकनीक
बुर्ज खरीफा जैसी इमारत बनाना कोई बाएं हाथ का खेल तो है नहीं. ऐसे मेगा-स्ट्रक्चर परियोजनाओं को आकार देने के लिए सिर्फ साधारण निर्माण सामग्री काफी नहीं होती है, बल्कि इसके लिए एडवांस तकनीक, खास ग्रेड की स्टील, कंक्रीट और विशेषज्ञों की पूरी टीम की जरूरत होती है. ऐसे बड़े लेवल पर इमारतों के निर्माण और बाद में उनके रखरखाव में आने वाला खर्चा इतना ज्यादा होता है कि बहुत सारे इन्वेस्टर्स को इतने बड़े और भारी भरकम वित्तीय जोखिम को देखते हुए पीछे हट जाते हैं.
संसाधनों की खपत और पर्यावरण पर इसका असर
दिल्ली जैसे शहर में जहां पर पहले से ही इतनी भारी-भरकम आबादी है, जहां की जनता साफ हवा-पानी के लिए जूझ रही है, वहां पर बुर्ज खलीफा जैसी इमारत बनाने से पर्यावरणीय व्यवस्था पर गहरा असर देखने को मिलेगा. निर्माण और रोजमर्रा के काम के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होगी. इस वजह से भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरेगा. इसके अलावा इतनी बड़ी बिल्डिंग में दिन-रात लिफ्ट और सेंट्रलाइज्ड एसी चलने से बिजली की अत्यधिक खपत और पावर ग्रिड पर दबाव देखने को मिलेगा. इसके अलावा भारी मात्रा में सीमेंट-स्टील के इस्तेमाल से कार्बल उत्सर्जन में बढ़ोतरी होगी.

आपदा प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियां
कहीं पर अगर ऊंची-ऊंची इमारतें बनाना हों तो सिर्फ स्ट्रक्चर खड़ा कर देने भर से काम नहीं चल जाता है, बल्कि उसमें सुविधाएं और सुरक्षा मानकों का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है. अगर दिल्ली जैसे शहर में इतनी बड़ी बिल्डिंग बनती है तो हजारों लोगों और वाहनों की आवाजाही से शहर में सड़कों पर जाम की समस्या और बढ़ जाएगी. वहीं आपदा प्रबंधन के लिहाज से इतनी ऊंचाई पर आग लगने या फिर अन्य किसी विपत्ति की स्थिति में त्वरित राहत व बचाव कार्य करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है. इसके अलावा इन बिल्डिंगों की वजह से हवा का प्राकृतिक बहाव बाधित हो जाएगा, जिससे गर्मी और प्रदूषण एक ही जगह कैद हो सकता है.
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