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गूगल क्लाउड बिगड़ा तो ब्रिटेन में बैंकिंग सेक्टर ठप, भारत में कैसे होता है काम?

ब्रिटेन में क्लाउड फेल होने से बैंकिंग ठप हो गई थी. जबकि भारत में आरबीआई के सख्त नियमों, डेटा लोकलाइजेशन और मजबूत डिजास्टर रिकवरी सिस्टम के कारण बैंकिंग सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित और आत्मनिर्भर है.

ब्रिटेन में हाल ही में गूगल क्लाउड की सेवाएं ठप होने से वहां का पूरा वित्तीय और बैंकिंग तंत्र कुछ समय के लिए चरमरा गया, जिससे ऑनलाइन पेमेंट और डिजिटल बैंकिंग ठप हो गई. इस बड़ी तकनीकी चूक ने पूरी दुनिया का ध्यान इस बात पर आकर्षित किया है कि देश का डिजिटल बुनियादी ढांचा कितना सुरक्षित है. क्या ऐसा संकट भारत जैसे विशाल देश में आ सकता है? इस रिपोर्ट में हम विस्तार से जानेंगे कि ब्रिटेन में यह समस्या क्यों पैदा हुई और भारतीय रिजर्व बैंक के कड़े नियमों के चलते भारत का बैंकिंग ढांचा किसी भी वैश्विक तकनीकी विफलता से निपटने के लिए कितना मजबूत और आत्मनिर्भर है.

ब्रिटेन में बैंकिंग सेक्टर ठप होने की असली वजह

ब्रिटेन में गूगल क्लाउड के लंदन स्थित डेटा सेंटर में बिजली से जुड़ी एक बड़ी तकनीकी खराबी (पावर इवेंट) सामने आई थी. इस व्यवधान के कारण रिवोल्यूट, एचएसबीसी और लॉयड्स बैंक जैसे दिग्गज वित्तीय संस्थानों की सेवाएं अचानक बाधित हो गईं. सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उस क्षेत्र में गूगल का केवल एक ही क्लाउड रीजन एक्टिव था. जब मुख्य डेटा सेंटर फेल हुआ, तो बैकअप के लिए कोई दूसरा स्थानीय विकल्प न होने के कारण पूरा बैंकिंग सिस्टम कुछ ही पलों में ठप हो गया, जिससे लाखों उपभोक्ताओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा.

डेटा लोकलाइजेशन और मल्टीपल क्लाउड रीजन्स

भारतीय बैंकिंग प्रणाली को इस तरह के संकटों से सुरक्षित रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने बहुत सख्त और स्पष्ट नियम तय किए हैं. भारत के सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि ग्राहकों का पूरा वित्तीय डेटा देश की भौगोलिक सीमा के भीतर ही सुरक्षित रखा जाए. विदेशी धरती पर निर्भरता न होने के कारण बाहरी तकनीकी गड़बड़ियों का असर यहां के सिस्टम पर नहीं पड़ता. इसके अलावा, गूगल क्लाउड, अमेजन वेब सर्विसेज (AWS) और माइक्रोसॉफ्ट एज्योर जैसी बड़ी कंपनियों के डेटा सेंटर भारत में मुंबई, दिल्ली-NCR, पुणे और हैदराबाद जैसे अलग-अलग शहरों में फैले हुए हैं. यदि किसी एक शहर के सर्वर में कोई दिक्कत आती है, तो ट्रैफिक बिना किसी देरी के दूसरे शहर के सर्वर पर शिफ्ट हो जाता है.

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गूगल क्लाउड बिगड़ा तो ब्रिटेन में बैंकिंग सेक्टर ठप, भारत में कैसे होता है काम?

हाइब्रिड और प्राइवेट क्लाउड मॉडल की ताकत

भारत के सरकारी और निजी क्षेत्र के बड़े बैंक जैसे एसबीआई, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई अपने कोर बैंकिंग सॉल्यूशंस (CBS) और अत्यधिक संवेदनशील डेटा के लिए पूरी तरह से किसी बाहरी पब्लिक क्लाउड पर निर्भर नहीं रहते हैं. सुरक्षा के लिहाज से ये बैंक अपने खुद के निजी क्लाउड या ऑन-प्रिमाइसेस डेटा सेंटर्स का इस्तेमाल करते हैं. पब्लिक क्लाउड का उपयोग केवल मोबाइल ऐप के फ्रंट-एंड, ग्राहक सेवा या सामान्य डाटा एनालिटिक्स जैसे गैर-संवेदनशील कामों के लिए किया जाता है, जिससे किसी भी बड़े साइबर या क्लाउड आउटेज का खतरा लगभग न के बराबर हो जाता है.

डिजास्टर रिकवरी और बिजनेस कंटिन्यूटी प्लान

भारतीय वित्तीय संस्थानों में तकनीकी मोर्चे पर आपदा से निपटने के लिए डिजास्टर रिकवरी सिस्टम का कड़ाई से पालन किया जाता है. हर बड़े बैंक का एक मुख्य डेटा सेंटर होता है और देश के किसी अन्य सुरक्षित शहर में उसकी एक पूरी तरह से तैयार डिजास्टर रिकवरी साइट भी मौजूद होती है. इन दोनों सेंटर्स के बीच हर सेकंड का डेटा रीयल-टाइम में सिंक होता रहता है. यदि कभी मुख्य डेटा सेंटर में बिजली चली जाए या कोई बड़ी तकनीकी बाधा आ जाए, तो दूसरी जगह मौजूद डीआर साइट स्वतः एक्टिव हो जाती है और बैंकिंग सेवाएं बिना एक सेकंड रुके सुचारू रूप से चलती रहती हैं.


गूगल क्लाउड बिगड़ा तो ब्रिटेन में बैंकिंग सेक्टर ठप, भारत में कैसे होता है काम?

आरबीआई के कड़े नियम और आईटी आउटसोर्सिंग गाइडलाइंस

भारतीय रिजर्व बैंक की मास्टर डायरेक्शंस ऑन आउटसोर्सिंग ऑफ आईटी सर्विसेज के प्रावधानों के तहत किसी भी बैंक को क्लाउड सेवा देने वाली कंपनी पर पूरी तरह निर्भर रहने की अनुमति नहीं दी जाती है. नियमों के मुताबिक हर बैंक के पास अपनी एक्जिट स्ट्रेटजी होना जरूरी है ताकि जरूरत पड़ने पर वे बिना किसी रुकावट के दूसरी तकनीक अपना सकें. इसके साथ ही, यदि देश में कोई भी तकनीकी या साइबर आउटेज होता है, तो बैंकों को मात्र 6 घंटे के भीतर इसकी जानकारी आरबीआई को देनी होती है. केंद्रीय बैंक खुद इन तकनीकी प्रदाताओं के सुरक्षा ऑडिट और संयुक्त परीक्षण करवाता है, जिससे भारत का बैंकिंग सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित रहता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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