फ्रांस में फिर लौट रहा येलो वेस्ट आंदोलन, 2018 में आखिर क्या हुआ था?
फ्रांस में भड़के मौजूदा हिंसक छात्र और नागरिक प्रदर्शनों ने साल 2018 के चर्चित 'येलो वेस्ट' आंदोलन की यादें ताजा कर दी हैं. उस वक्त लाखों लोगों के हंगामे ने सरकार के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया था.

फ्रांस में एक बार फिर से साल 2018 के चर्चित येलो वेस्ट आंदोलन की डरावनी तस्वीरें लौटती हुई दिखाई दे रही हैं. राजधानी पेरिस से लेकर लियोन, मार्सिले और लिमोज जैसे बड़े शहरों की सड़कों पर भारी हंगामा मचा हुआ है. मौजूदा छात्र आंदोलन ने अब बेहद आक्रामक रूप ले लिया है, जिसमें ट्रेड यूनियनों के सदस्य और पुराने प्रदर्शनकारी भी खुलकर शामिल हो चुके हैं. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि फ्रांस के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक करीब 6,00,000 लोग सड़कों पर उतर आए हैं. इस बड़े पैमाने पर फैली हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ के मामलों में पुलिस ने अब तक लगभग 2400 लोगों को हिरासत में लिया है, जिससे राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के सामने एक बार फिर से गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है. आइए जानें कि 2018 में हुआ येलो वेस्ट आंदोलन क्या था.
वर्तमान प्रदर्शनों का उग्र रूप
बीते रविवार को फ्रांस के कई प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शनों ने अचानक हिंसक मोड़ ले लिया. प्रदर्शनकारियों ने जगह-जगह तोड़फोड़ करने के साथ ही दुकानों में लूटपाट की घटनाओं को भी अंजाम दिया. सुरक्षा बलों और उग्र भीड़ के बीच हुई झड़पों ने आम जनजीवन को पूरी तरह से ठप कर दिया है. प्रशासन इस बात से चिंतित है कि यह मौजूदा असंतोष कहीं आठ साल पुराने उस दौर की तरह व्यापक न हो जाए, जिसने देश की अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था दोनों को गहरी चोट पहुंचाई थी.
आठ साल पुराना ऐतिहासिक आंदोलन
फ्रांस के आधुनिक इतिहास में येलो वेस्ट आंदोलन को सबसे लंबे और हिंसक आंदोलनों में गिना जाता है. आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार यह विरोध प्रदर्शन लगभग 589 दिनों यानी 1 वर्ष, 7 महीने और 11 दिनों तक लगातार चला था. इसकी शुरुआत 17 नवंबर 2018 को हुई थी और यह 28 जून 2020 को जाकर शांत हुआ था. इस दौरान हर शनिवार को देश की सड़कों पर आम जनता का हुजूम उतरता था, जिसने देश के शासन तंत्र को हिलाकर रख दिया था.
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ईंधन टैक्स और महंगाई से शुरुआत
इस पूरे विरोध की नींव नवंबर 2018 में ईंधन पर लगाए गए भारी-भरकम करों और बढ़ती कीमतों के विरोध में पड़ी थी. तत्कालीन सरकार ने डीजल और पेट्रोल के दामों में टैक्स बढ़ाकर पर्यावरण संरक्षण का तर्क दिया था. लेकिन आम जनता और कामगार वर्ग का कहना था कि इस नीति का सीधा और सबसे बुरा असर उन मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जिन्हें नौकरी पर जाने या बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए रोजाना गाड़ियों का इस्तेमाल करना पड़ता है.
येलो वेस्ट क्यों पड़ा आंदोलन का नाम?
इस आंदोलन के नाम के पीछे फ्रांस का एक दिलचस्प कानूनी नियम जुड़ा हुआ है. फ्रांस में हर वाहन चालक के लिए अपनी गाड़ी में एक चमकदार पीली रिफ्लेक्टिव जैकेट रखना अनिवार्य होता है, ताकि आपात स्थिति में चालक दूर से नजर आ सके. प्रदर्शनकारियों ने सरकार का विरोध जताने के लिए इसी पीली जैकेट को अपनी पहचान बना लिया था. दिलचस्प बात यह है कि इस आंदोलन का संचालन किसी राजनीतिक दल या नेता ने नहीं किया था, बल्कि यह पूरी तरह से आम नागरिकों का स्वतःस्फूर्त जन-आंदोलन था.

हिंसा की आग और पेरिस में तबाही
शुरुआत में यह विरोध सिर्फ हाईवे जाम करने और शांतिपूर्ण रैलियों तक सीमित था, लेकिन सरकार के रुख में नरमी न आने पर यह 1 दिसंबर 2018 को बेहद हिंसक हो गया. प्रसिद्ध स्मारक आर्क डी ट्रायम्फ के आसपास भड़की हिंसा ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड्स जलाए, वाहनों को आग के हवाले किया और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया. भारी दबाव के बाद सरकार को अंततः ईंधन टैक्स बढ़ोतरी का फैसला वापस लेना पड़ा था, लेकिन तब तक आंदोलन का दायरा काफी बड़ा हो चुका था.
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