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कैसे पैसा कमाती है प्रशांत किशोर की IPAC, जानें कितनी है इस कंपनी की नेटवर्थ?

IPAC की नींव 2013 में प्रशांत किशोर ने अपने साथियों प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल के साथ रखी थी. शुरुआत में इसका नाम सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस था.

पश्चिम बंगाल में इस साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. चुनावों से पहले ही पश्चिम बंगाल में सियासी हलचल तेज हो गई है. दरअसल, आज ईडी ने कोयला घोटाले को लेकर कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंट फर्म IPAC के ऑफिस में छापेमारी की है. ईडी ने IPAC के प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर भी छापेमारी की है. दरअसल, IPAC एक पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म है और यह कंपनी पश्चिम बंगाल की सीएम ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करती है.

ऐसे में जब ईडी की टीम आईपैक के चीफ प्रतीक जैन के घर और ऑफिस पर रेड मार रही थी, तभी ममता बनर्जी भी वहां पहुंच गई. बताया जा रहा है कि ईडी की रेड के दौरान ममता बनर्जी IPAC के ऑफिस से फाइल और लैपटॉप लेकर निकली है. इस रेड के बीच IPAC को लेकर भी लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि प्रशांत किशोर की IPAC कैसे पैसा कमाती है और कंपनी की नेटवर्थ कितनी है. 

क्या है IPAC और कैसे हुई इस कंपनी की शुरुआत?

IPAC की नींव  2013 में प्रशांत किशोर ने अपने तीन साथियों प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल के साथ रखी थी. शुरुआत में इसका नाम सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस था, जो बाद में इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के रूप में जानी जाने लगी. इस कंपनी का मकसद राजनीतिक दलों और नेताओं को चुनावी रणनीति, संगठन मजबूत करने और डेटा आधारित फैसलों में मदद करना है. आईपैक के जरिये ही प्रशांत किशोर ने 2014 में नरेंद्र मोदी के राजनीतिक प्रचार-प्रसार का जिम्मा लिया था. इसके बाद बिहार चुनावों में नीतीश कुमार, पंजाब में अमरिंदर सिंह और आंध्र प्रदेश वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के लिए भी प्रशांत किशोर की कंपनी ने काम किया था. इसके बाद से आईपैक पश्चिम बंगाल की सीएम ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करती है. वहीं बताया जाता है कि 2021 में प्रशांत किशोर ने आधिकारिक रूप से इस कंपनी को छोड़ दिया था. इसके बाद से ऋषि राज सिंह, विनेश चंदेल और प्रतीक जैन कंपनी के डायरेक्टर बन गए.

चुनावी रणनीति से होती है IPAC की कमाई

आईपैक की कमाई का सबसे बड़ा जरिया राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के लिए की जाने वाली कंसल्टेंसी है. यह कंपनी चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान पार्टियों को पूरी रणनीति देती है. इसमें उम्मीदवार चयन, जमीनी सर्वे, वोटर डेटा एनालिसिस, प्रचार रणनीति, सोशल मीडिया कैंपेन और मैसेजिंग तक शामिल होता है. राजनीतिक दल आईपैक को इसके लिए मोटी फीस देते हैं, जो प्रोजेक्ट और चुनाव के स्तर के हिसाब से तय होती है.

कितनी है IPAC की नेटवर्थ?

आईपैक एक प्राइवेट पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म है, इसलिए इसकी सटीक नेटवर्थ सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है. हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बड़े चुनावी प्रोजेक्ट्स और लगातार बढ़ते काम को देखते हुए कंपनी की वैल्यू करोड़ों रुपये में आंकी जाती है. देश के बड़े राज्यों में चुनावी कैंपेन संभालने और लंबे समय तक पार्टियों के साथ काम करने से आईपैक की कमाई और प्रभाव दोनों लगातार बढ़े है.

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कविता गाडरी बीते कुछ साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी हुई है. राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाली कविता ने अपनी पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में की है. 
पत्रकारिता में अपना सफर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से शुरू किया जहां उन्होंने नेशनल एडिशन और सप्लीमेंट्स जैसे करियर की उड़ान और शी न्यूज के लिए बाय लाइन स्टोरी लिखी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो पर काम करने का मौका मिला. जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन के लिए नए अनुभव दिए. 

इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क नोएडा का रुख किया. यहां बतौर कंटेंट राइटर उन्होंने लाइफस्टाइल, करंट अफेयर्स और ट्रेडिंग विषयों पर स्टोरीज लिखी. साथ ही वह कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार सक्रिय रही. कविता गाडरी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं. न्यूज़ राइटिंग रिसर्च बेस्ड स्टोरीटेलिंग और मल्टीमीडिया कंटेंट क्रिएशन उनकी खासियत है. वर्तमान में वह एबीपी लाइव से जुड़ी है जहां विभिन्न विषयों पर ऐसी स्‍टोरीज लिखती है जो पाठकों को नई जानकारी देती है और उनके रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़ती है.

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