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क्या अकेले घर और अंधेरे कमरे में बुलाने पर सच में मिलने आती हैं आत्माएं? डरा देगा ये सच

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो आत्माओं और भूत-प्रेत में विश्वास करते हैं, दूसरे वो लोग जो कि इनको नहीं मानते हैं. चलिए जानें कि क्या वाकई अंधेरे और सुनसान कमरे में आत्मा बुलाने से मिलने आती है कि नहीं.

सदियों से भूत-प्रेत और आत्माओं की दुनिया इंसानों के लिए रहस्य रही है. जब कभी भी इस विषय पर बात होती है तो समाज दो गुटों में बंटा नजर आता है. एक गुट इसे सच मानता है तो वहीं दूसरा जो इसे सिर्फ मन का वहम कहता है. पुरानी कहानियों में अक्सर ऐसा दावा किया जाता है कि सुनसान जगहों या फिर अंधेरे कमरे में आत्माएं जल्दी सक्रिय होती हैं. लेकिन क्या सचमुच किसी बंद अकेले कमरे में आत्माओं को बैठकर बुलाने से रूहें खिंची चली आती हैं? इस दिलचस्प सवाल के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक सच हैरान करने वाला है.

अकेलेन में दिमाग का मनोवैज्ञानिक खेल

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी अकेले घर या फिर अंधेरे कमरे में बुलाने पर किसी आत्मा के आने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है. विज्ञान इन अनुभवों को पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक यानी मानसिक खेल मानता है. जब भी कोई व्यक्ति पूरी तरह से अकेला होता है तो सबसे पहले उसके मन में भूत-प्रेत का खौफ होता है, तो उसका दिमाग अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है. ऐसे में डर और अकेलेपन के कारण दिमाग खुद कई तरह के भ्रम पैदा करने लगता है. हवा से हिलते पर्दे या फिर किसी छोटी सी आहट को भी इंसान भूत समझ बैठता है.

नकारात्मक ऊर्जा और अध्यात्म का नजरिया

दूसरी तरफ अगर हम अध्यात्म और पुरानी लोक मान्यताओं की बात करें तो वहां एक अलग दृष्टिकोण देखने को मिलता है. आध्यात्मिक जानकारों का मानना है कि अकेलापन और घना अंधेरा कुछ खास तरह की नकारात्मक ऊर्जाओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है. ऐसा माना जाता है कि अगर किसी स्थान का वातावरण लंबे समय से बहुत शांत, सुनसान या दूषित रहा तो वहां पर नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है. यही वजह है कि लोग ऐसी जगहों पर अजीब सा भारीपन या फिर बेचैनी महसूस करते हैं.

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डर और इंसानी सोच का कनेक्शन

अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि इस तरह के डरावने अनुभवों के पीछे सबसे बड़ा हाथ व्यक्ति के अपने डर और उसकी मानसिक स्थिति का होता है. अगर कोई व्यक्ति पहले से ही डरा हुआ है और वह किसी के द्वारा कही गई बातों पर विश्वास कर लेता है तो उसका अवचेतन मन कमरे के अंधेरे में वैसी ही आकृतियां या परछाइयां दिखाने लग जाता है. सीधे शब्दों में कहें तो आप जिस चीज के बारे में जितना ज्यादा सोचेंगे, आपका दिमाग उसे सच मानने लगेगा.

विज्ञान की नजर में भूत-प्रेत

पूरी दुनिया केवल वैज्ञानिक और शोधकर्ता इस बात को साफ कर चुके हैं कि पैरानॉर्मल एक्टिविटी या आत्माओं का दिखना केवल इंसानी मस्तिष्क की एक रासायनिक प्रक्रिया है. जब हमारी आंखें अंधेरे में साफ नहीं देख पाती हैं तो दिमाग अधूरी तस्वीरों को पूरा करने के लिए पुरानी डरावनी यादों का सहारा लेता है, जिससे परछाईं दिखने का भ्रम होता है. इसलिए किसी भी इंसान द्वारा या फिर तांत्रिक क्रिया द्वारा या अकेले में आत्माओं को बुलाने के दावों का कोई वास्तविक आधार नहीं है. यह सब केवल इंसान के अंदर छिपे गहरे डर का नतीजा होता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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