क्या RBI ने सच में बेच दिया अपना सोना, जानें इससे पहले कब-कब ऐसा कर चुका है भारत?
सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में आरबीआई द्वारा अरबों डॉलर का सोना बेचने का दावा किया जा रहा था, हालांकि आरबीआई ने इसका खंडन किया है. चलिए जानें इससे पहले देश का सोना कब बेचा गया.

- भारत ने आर्थिक सुधारों के बाद गिरवी सोना छुड़ाया.
भारतीय रिजर्व बैंक को लेकर हाल ही में एक ऐसी खबर सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में तैरने लगी जिसने पूरे देश की धड़कनें बढ़ा दीं. दावा किया गया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव के बीच आरबीआई ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए 12 अरब डॉलर की भारी कीमत का सोना बेच दिया है. इस खबर के सामने आते ही देश के आर्थिक गलियारों में हड़कंप मच गया और लोग इसकी तुलना साल 1991 के उस दौर से करने लगे जब देश को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था. आइए जानते हैं कि इस सनसनीखेज खबर के पीछे का असली सच क्या है और भारत के स्वर्ण भंडार का असल इतिहास क्या रहा है.
आरबीआई ने दावों को किया खारिज
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट का हवाला देकर यह दावा किया जा रहा था कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और आर्थिक उथल-पुथल की वजह से भारत ने अपने खजाने से सोने की बड़ी बिक्री की है. इस खबर पर तुरंत एक्शन लेते हुए रिजर्व बैंक ने एक आधिकारिक बयान जारी किया. केंद्रीय बैंक ने साफ लफ्जों में कहा कि सोने के भंडार को कम करने या बेचने की खबरें पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद हैं. आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि भारत का गोल्ड रिजर्व पूरी तरह से सुरक्षित है और देश की आर्थिक सेहत को लेकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है.
क्या कभी बेचना पड़ा था देश का सोना?
भले ही मौजूदा समय में सोना बेचने की बात महज एक अफवाह साबित हुई हो, लेकिन भारत के इतिहास में एक ऐसा काला दौर भी आया था जब देश को सच में अपना सोना बेचना तो नहीं पड़ा बल्कि विदेशी बैंकों के पास गिरवी रखना पड़ा था. यह बात साल 1991 की है जब भारत के सामने आजादी के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया था. उस समय देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतनी बुरी तरह खाली हो चुका था कि भारत के पास विदेशों से जरूरी चीजें जैसे कच्चा तेल और दवाइयां मंगाने के लिए महज कुछ ही हफ्तों के पैसे बचे थे.
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खाड़ी युद्ध और देश की तबाही
साल 1990 और 1991 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था भारी कर्ज और देश के भीतर चल रही राजनीतिक अस्थिरता के कारण वेंटिलेटर पर पहुंच गई थी. इसी नाजुक समय में दुनिया में खाड़ी युद्ध छिड़ गया, जिसने जलती पर घी का काम किया. इस युद्ध की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं. दूसरी तरफ, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों का रोजगार छिन गया, जिससे विदेशों से भारत आने वाले पैसे की आवक अचानक बहुत कम हो गई और देश दिवालिया होने की कगार पर आ गया.
जब दुनिया के बैंकों ने मोड़ा अपना मुंह
हालात इस कदर बिगड़ चुके थे कि भारत के पास अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को चुकाने के लिए डॉलर खत्म हो रहे थे. देश की साख को गिरता देख दुनिया की बड़ी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारत की रेटिंग को बेहद निचले स्तर पर डाल दिया. इस गिरावट का असर यह हुआ कि दुनिया के किसी भी देश और बड़े अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने भारत को नया कर्ज देने से पूरी तरह मना कर दिया. ऐसे में देश को डिफॉल्ट यानी दिवालिया होने से बचाने के लिए तत्कालीन सरकार और आरबीआई के पास एकमात्र रास्ता अपना सोना इस्तेमाल करने का बचा था.
गुप्त तरीके से विदेशों में भेजा गया सोना
इस महासंकट से उबरने के लिए आरबीआई ने एक बेहद गोपनीय और ऐतिहासिक ऑपरेशन चलाया. देश के मान-सम्मान को बचाने के लिए भारत ने अपने खजाने से करीब 47 मीट्रिक टन (यानी 47,000 किलोग्राम) सोना चुपचाप ट्रकों में भरकर मुंबई एयरपोर्ट पहुंचाया. वहां से इसे विशेष कार्गो विमानों के जरिए लंदन के 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' और 'यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड' भेजा गया. इस बेहद गुप्त मिशन का मकसद बिना शोर मचाए विदेशी बैंकों में सोना जमा कराकर तुरंत डॉलर का इंतजाम करना था ताकि देश की साख बची रहे.
बदले में मिला 40 करोड़ डॉलर का कर्ज
इस 47 टन सोने को गिरवी रखने के एवज में अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने भारत को लगभग 40 करोड़ (405 मिलियन) डॉलर का आपातकालीन कर्ज जारी किया था. इस कदम से ठीक पहले सरकार ने विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा जब्त किए गए करीब 20 टन सोने को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर भी 215 मिलियन डॉलर जुटाए थे. इन दोनों ही कड़े फैसलों से मिली रकम की बदौलत भारत अपने विदेशी भुगतानों को समय पर चुकाने में कामयाब रहा और दुनिया के सामने दिवालिया होने के बड़े कलंक से बाल-बाल बच गया.
और फिर अखबार की सुर्खियों से देश में मचा हड़कंप
सरकार ने इस पूरे गोल्ड ऑपरेशन को बेहद गुप्त रखा था और यहां तक कि कस्टम अधिकारियों को भी इस पर बात न करने के कड़े निर्देश थे. लेकिन 8 जुलाई 1991 को एक अंग्रेजी अखबार ने इस गोपनीय सौदे की भनक पाते ही Secret Sale of Gold by RBI Again नाम से बड़ी खबर छाप दी. इस खबर के सार्वजनिक होते ही पूरे देश के लोगों में भारी गुस्सा और हलचल मच गई, क्योंकि भारतीय समाज में सोने को सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि परिवार और राष्ट्र की इज्जत और आखिरी सुरक्षा कवच माना जाता है.
राष्ट्रीय अपमान या आर्थिक मजबूरी की बहस
सोना विदेश भेजे जाने की खबर को आम जनता और विपक्षी दलों ने एक बड़े राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखा और सरकार की कड़ी आलोचना हुई. हालांकि, दुनिया भर के बड़े अर्थशास्त्रियों का मानना था कि तत्कालीन परिस्थितियों में देश को बचाने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. अगर आरबीआई उस समय यह कड़ा और कड़वा फैसला नहीं लेता, तो भारत पूरी दुनिया के सामने डिफॉल्टर बन जाता और देश की पूरी बैंकिंग व्यवस्था और साख हमेशा के लिए जमींदोज हो जाती.
नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने छुड़ाया गिरवी सोना
इस आर्थिक तबाही के बीच ही 21 जून 1991 को देश में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ. प्रधानमंत्री राव ने मशहूर अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को देश का नया वित्त मंत्री बनाया. मनमोहन सिंह ने कमान संभालते ही देश में बड़े और कड़े आर्थिक सुधारों की नींव रखी. उन्होंने लाइसेंस राज को खत्म किया, भारतीय बाजारों को विदेशी कंपनियों के लिए खोला और देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की. इस दूरदर्शी नीति ने आगे चलकर भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बना दिया और बाद में भारत ने अपना गिरवी रखा पूरा सोना भी सुरक्षित वापस छुड़ा लिया.
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