CEC ज्ञानेश कुमार को कौन सी सिक्योरिटी मिली है, कितना आता है खर्च?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगे हैं. इसी बीच उनकी सिक्योरिटी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. आइए जानें कि उनको कौन सी सुरक्षा मिली है और खर्चा कितना है.

देश के चुनाव आयोग के भीतर अंदरूनी तालमेल को लेकर आई मीडिया रिपोर्ट्स के बाद से ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चुनाव आयोग के शीर्ष नेतृत्व पर सीधा हमला बोला है. रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई थी कि दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग की कार्यप्रणाली और वोटर लिस्ट के आंकड़ों के रखरखाव को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने 14 बार लिखित रूप में अपनी शिकायत दर्ज कराई थी. इन गंभीर आरोपों और विपक्ष के तीखे बयानों के बीच अब ज्ञानेश कुमार की सुरक्षा व्यवस्था और उनकी गिरफ्तारी को लेकर कानून में दिए गए विशेष अधिकारों पर चर्चा छिड़ गई है. चलिए इस बारे में जान लेते हैं.
ज्ञानेश कुमार की सुरक्षा श्रेणी और उस पर होने वाला खर्च
ज्ञानेश कुमार को आधिकारिक तौर पर कोई विशेष VIP सुरक्षा श्रेणी जैसे X, Y या Z दी गई है या नहीं, इस बारे में सरकार की तरफ से कोई सार्वजनिक जानकारी साझा नहीं की गई है. हालांकि, देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार की सुरक्षा को देखते हुए गृह मंत्रालय ने उन्हें खतरे के आकलन के आधार पर 'Z' श्रेणी की सुरक्षा दी थी, जिसमें CRPF के सशस्त्र जवान तैनात रहते हैं. इस स्तर की सुरक्षा व्यवस्था में करीब 22 से 30 सुरक्षाकर्मी चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं और इसका महीने का खर्च लाखों रुपये में आता है. ज्ञानेश कुमार के मामले में यह सुरक्षा शब्द किसी शारीरिक घेरे से ज्यादा उनके बचाव के कानूनी प्रावधानों को लेकर चर्चा में बना हुआ है.
ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी के सामने क्या है कानूनी ढाल?
विपक्ष लगातार मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और कार्रवाई की मांग कर रहा है, लेकिन इसके सामने साल 2023 का नया कानून एक मजबूत दीवार बनकर खड़ा है. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को एक विशेष कानूनी सुरक्षा देती है. इस धारा के तहत पद पर रहते हुए या पद छोड़ने के बाद भी, उनके द्वारा अपनी सरकारी ड्यूटी के दौरान लिए गए किसी भी फैसले या किए गए काम के लिए किसी भी अदालत में कोई सिविल या आपराधिक केस दर्ज नहीं किया जा सकता और न ही उनकी गिरफ्तारी हो सकती है.
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2023 का नया कानून
2023 से पहले देश में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई स्पष्ट कानून मौजूद नहीं था. उस दौरान राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह पर ही चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करते थे, जिसमें अदालत या विपक्ष की कोई भागीदारी नहीं होती थी. स्थिति को बदलने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में अनूप बरनवाल केस में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक चयन समिति बनाई थी. इस समिति में प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया था, ताकि जब तक संसद कानून न बना ले, तब तक निष्पक्षता बनी रहे.
चयन समिति में बदलाव और निष्पक्षता पर उठते सवाल
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने संसद में नया कानून पेश किया, लेकिन उसमें CJI को चयन समिति से बाहर कर दिया गया. उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को समिति का हिस्सा बनाया गया. अब इस तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री और उनके मंत्री शामिल हैं, जिससे विपक्ष के नेता की भूमिका सीमित हो जाती है और बहुमत के आधार पर फैसले आसानी से लिए जा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट में जब इस मामले पर सुनवाई हुई तो अदालत ने भी टिप्पणी की थी कि इस बदलाव के बाद अब समिति में कोई निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं बचा है.

हंगामे के बीच जुड़ा कानूनी सुरक्षा का प्रावधान
मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्रवाई से छूट देने वाला यह कानून शुरुआत में बिल का हिस्सा नहीं था. अगस्त 2023 में जब यह बिल संसद में पेश किया गया था, तब धारा 16 में इस तरह के कड़े बचाव के नियम शामिल नहीं थे. संसद सत्र के दौरान करीब चार महीने बाद सरकार द्वारा इस प्रावधान को जोड़ा गया. विपक्ष ने इस बदलाव का कड़ा विरोध किया और सदन से वॉकआउट भी किया, लेकिन भारी हंगामे के बावजूद सरकार ने इस कानून को संसद से पास करवा लिया, जो आज मुख्य चुनाव आयुक्त का सबसे बड़ा कानूनी बचाव है.
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