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Animal Language: क्या जानवरों की भाषा भी समझ सकते हैं इंसान, जानें इस पर अब तक कितना हुआ काम?

Animal Language: विज्ञान दुनिया में काफी प्रगति कर चुका है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इंसान जानवर की भाषा को समझ सकते हैं? आइए जानते हैं विज्ञान इस मामले में कहां तक पहुंचा है.

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  • डॉल्फिन की सीटियां इंसानी शब्दों सी, व्यवस्थित संवाद प्रणाली का संकेत।
  • अल्ट्रासोनिक आवाजों को समझना, भावनाओं व चेतावनियों का महत्वपूर्ण संचार।
  • हाथी कम फ्रीक्वेंसी ध्वनि व AI से स्पर्म व्हेल की भाषा अध्ययन।
  • शोर के कारण AI सिस्टम का कंफ्यूज होना, भाषा समझने में बाधा।

Animal Language: सदियों से जानवरों से बात करने का विचार कहानियों और कल्पनाओं में ही रहा है. लेकिन आज विज्ञान इस जिज्ञासा को गंभीरता से ले रहा है. दरअसल अब सवाल यह नहीं है कि क्या हम जानवरों से बात कर सकते हैं? बल्कि यह है कि हम उनकी भाषा को असल में कितना समझ सकते हैं? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

डॉल्फिन का बात करना 

सबसे बड़ी उपलब्धियां में से एक तब सामने आई जब अमेरिका की एक शोध टीम ने 2025 में यह साबित कर दिया था कि डॉल्फिन की कुछ सीटियां ठीक इंसानी शब्दों की तरह ही काम करती हैं. इससे यह पता चलता है कि जानवर सिर्फ बेतरतीब आवाज नहीं निकलते बल्कि वे एक व्यवस्थित संवाद प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं.

वह सुनना जो इंसान नहीं सुन सकते

जानवरों को समझने में हमेशा से एक बड़ी रुकावट इंसानों की सुनने की क्षमता रही है. जहां इंसान लगभग 20 किलोहर्ट्ज तक की आवाज सुन सकते हैं, वहीं चमगादड़ जैसे जानवर इस सीमा से कहीं ज्यादा 200 प्लस किलोहर्ट्ज की आवाज निकालते हैं.

केट जोन्स जैसे शोधकर्ताओं ने इस बात को साबित किया कि आधुनिक माइक्रोफोन की मदद से अब हम इन अल्ट्रासोनिक आवाजों को रिकॉर्ड कर सकते हैं. इससे यह पता चलता है कि जानवर अपनी भावना, चेतावनी और यहां तक की प्रजनन के संकेत के लिए भी आवाज का इस्तेमाल करते हैं.

कंपन के जरिए बातचीत 

जानवरों के आपसी संवाद के क्षेत्र में एक जबरदस्त खोज की गई है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं ने यह पाया कि हाथी काफी कम फ्रीक्वेंसी वाली आवाज का इस्तेमाल करके आपस में बात करते हैं. इस फ्रीक्वेंसी को इंसान नहीं सुन सकते. इस काम की वजह से एलीफेंट लिसनिंग प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई. यह आज भी हाथियों के आपसी संवाद को स्टडी कर रहा है. 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का योगदान 

बीते कुछ सालों में सबसे बड़ी छलांग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में लगी है. डेविड ग्रुबर जैसे वैज्ञानिकों ने स्पर्म व्हेल की क्लिक आवाज के पैटर्न को स्टडी करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया. ऐसा इसलिए ताकि इस बात को समझा जा सके कि क्या यह आवाज किसी भाषा जैसी संरचना का पालन करती हैं. इसी तरह शोधकर्ता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल को इस तरह से प्रशिक्षित कर रहे हैं कि वह आवाजों के डेटाबेस से जानवरों की भावना और व्यवहार को पहचान सकें.

कितना है यह मुश्किल? 

प्रगति होने के बावजूद भी जानवरों की भाषा को समझना आसान नहीं है. एक सबसे बड़ी समस्या है शोर. रिकॉर्डिंग डिवाइस हर चीज रिकॉर्ड कर लेते हैं बारिश, पक्षी और आसपास की आवाज. इस वजह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम कंफ्यूज हो सकते हैं.

यह भी पढ़ें: दुनिया का कौन-सा देश भारत को बेचता है सबसे सस्ता तेल? समझ लें पूरा हिसाब-किताब

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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