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IPL 2026: MI और LSG की तरह IPL प्लेऑफ से बाहर होने वाली टीमों को कितना होगा घाटा? समझें पूरा हिसाब

IPL 2026: मुंबई इंडियंस और लखनऊ सुपर जायंट्स आईपीएल 2026 प्लेऑफ से बाहर हो सकती हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि इससे टीम को कितना नुकसान होता है.

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  • आईपीएल 2026: प्लेऑफ से बाहर होने पर टीमों को प्राइज मनी का नुकसान.
  • प्राइज मनी के नुकसान के अलावा ब्रांड वैल्यू पर भी पड़ता है असर.
  • मैच डे रेवेन्यू और भविष्य की स्पॉन्सरशिप डील पर भी पड़ती है मार.
  • सेंट्रलाइज्ड रेवेन्यू मॉडल से टीमों को मिलता है आर्थिक सहारा.

IPL  2026: आईपीएल 2026 में मुंबई इंडियंस और लखनऊ सुपर जायंट्स प्लेऑफ से बाहर होने की कगार पर हैं. आईपीएल में प्लेऑफ से चूकने का असर टीम के फाइनेंशियल बैलेंस शीट पर भी पड़ता है. जो टीम क्वालीफाई नहीं कर पाती उसे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से कोई भी प्राइज मनी नहीं मिलता. इसी के साथ चौथे स्थान पर रहने वाली टीम को भी करोड़ों रुपये मिलने की गारंटी होती है.

सीधा प्राइज मनी का नुकसान 

इसका सबसे सीधा असर प्राइज मनी के नुकसान के रूप में होता है. आईपीएल में प्राइज मनी देने का एक साफ स्ट्रक्चर है. यहां प्लेऑफ के हर स्टेज पर फाइनेंशियल इनाम मिलते हैं. यहां तक कि चौथे स्थान पर रहने वाली टीम को भी लगभग ₹6.5 करोड़ मिलते हैं. इसी के साथ तीसरे स्थान पर रहने वाली टीम को लगभग ₹7 करोड़,  रनर-अप टीम को ₹13 करोड़ और जीतने वाली टीम को ₹20 करोड़ दिए जाते हैं. 

लेकिन मुंबई इंडियंस और लखनऊ सुपर जायंट्स जैसी टीमों के लिए प्लेऑफ से पहले ही बाहर हो जाने का मतलब है कि उन्हें इस प्राइज पूल से कुछ भी हासिल नहीं होगा. इसका मतलब है कि उन्हें सीधे कम से कम ₹6.5 करोड़ का नुकसान होगा. 

ब्रांड वैल्यू पर असर 

मैदान पर टीम का प्रदर्शन मैदान के बाहर उसकी इमेज को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. जब टीम क्वालीफाई नहीं कर पाती तो उनकी ब्रांड वैल्यू कम हो जाती है. स्पॉन्सर अगले सीजन में कम रेट पर डील को फिर से नेगोशिएट करने की कोशिश करते हैं. ऐसा जर्सी पर लोगो लगाने और पार्टनरशिप के मामलों में ज्यादा किया जाता है.

इतना ही नहीं बल्कि फैंस का जुड़ाव भी कम हो जाता है. कम जीत का मतलब है कम उत्साह. इसका सीधा असर जर्सी, कैप और फैन गियर जैसी  मर्चेंडाइज की बिक्री पर पड़ता है. समय के साथ इस तरह की गिरावट की वजह से टीम को प्राइज मनी के अलावा भी करोड़ों रुपये का नुकसान हो सकता है.

मैच डे रेवेन्यू का नुकसान 

प्लेऑफ में क्वालीफाई करने से बड़े मैचों के जरिए ज्यादा रेवेन्यू कमाने के नए रास्ते खुलते हैं. जो टीम टूर्नामेंट में आगे तक जाती हैं उन्हें बड़े स्टेडियम में खेलने, टिकटों की ज्यादा कीमत रखने और ज्यादा लाइमलाइट में आने के मौके मिलते हैं. जो टीम बाहर हो जाती हैं वे इन फायदों से वंचित रह जाती हैं.

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स्पॉन्सरशिप और भविष्य की कमाई पर असर 

स्पॉन्सर को लाइमलाइट में रहना ज्यादा पसंद होता है और प्लेऑफ इसकी पूरी गारंटी देते हैं. जब कोई टीम क्वालीफाई नहीं कर पाती तो उसे न सिर्फ मौजूदा कमाई का नुकसान होता है बल्कि भविष्य में डील्स के लिए भी मोलभाव करने में परेशानी होती है.  ब्रांड्स उन सफल टीमों में ज्यादा निवेश करने को तैयार रहते हैं जो टूर्नामेंट में काफी आगे तक जाती हैं.

क्या टीमों को ज्यादा नुकसान होता है? 

इन नुकसानों के बावजूद आईपीएल टीम जरूरी नहीं कि आर्थिक संकट में पड़ जाए. आईपीएल के सेंट्रलाइज्ड रेवेन्यू मॉडल की वजह से हर फ्रेंचाइजी को ब्रॉडकास्टिंग राइट्स और केंद्रीय स्पॉन्सरशिप से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा दिया जाता है. बीसीसीआई कुल सेंट्रल रेवेन्यू का लगभग 50% हिस्सा सभी टीमों में बराबर बांट देती है. इस हिस्से का अंदाजा हर टीम के लिए लगभग ₹400 से ₹500 करोड़ लगाया जा सकता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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