कैसे होता है बुलेट ट्रेन का ट्रायल, इसमें क्या किया जाता है मॉनिटर?
हाई-स्पीड ट्रैक पर सुरक्षा, ब्रेकिंग सिस्टम और वाइब्रेशन की होगी बारीकी से जांच, जानिए कैसे होता है बुलेट ट्रेन का सफर सुरक्षित और अत्याधुनिक तकनीकों का यह ट्रायल?

बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर भारत में तेजी से काम चल रहा है. मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर (MAHSR) पर सूरत और बिलिमोरा के बीच जल्द ट्रायल रन शुरू होने की तैयारी है. इसी बीच जापान में भी शिंकानसेन ट्रेनों का ट्रायल चल रहा है, जो बाद में भारत भेजी जाएंगी. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बुलेट ट्रेन का ट्रायल कैसे होता है और इसमें किन चीजों को मॉनिटर किया जाता है.
ट्रायल रन क्या होता है?
किसी भी नई ट्रेन को यात्रियों के लिए शुरू करने से पहले उसे लंबे समय तक टेस्ट किया जाता है, जिसे ट्रायल रन कहते हैं. बुलेट ट्रेन के मामले में यह प्रक्रिया और भी सख्त होती है, क्योंकि इसकी रफ्तार 300 किलोमीटर प्रति घंटे से भी ज्यादा होती है. ट्रायल के दौरान ट्रेन को अलग-अलग स्पीड पर चलाया जाता है, ताकि यह पता चल सके कि वह हर हाल में सुरक्षित रूप से दौड़ सकती है या नहीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में ट्रायल के दौरान ट्रेन करीब 350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक टेस्ट किया जाएगा, जबकि यात्रियों के लिए इसकी सामान्य रफ्तार 320 किलोमीटर प्रति घंटे रखी जाएगी.
किन बातों की होती है निगरानी?
सबसे पहले ट्रेन की स्पीड और उसकी ब्रेकिंग सिस्टम को परखा जाता है. तेज रफ्तार से चलती ट्रेन कितनी जल्दी और कितनी सुरक्षित तरीके से रुक सकती है, यह देखा जाता है.
इसके अलावा पटरियों यानी ट्रैक की स्थिरता पर भी ध्यान दिया जाता है. बुलेट ट्रेन खास तरह के स्लैब ट्रैक सिस्टम पर चलती है, जो जापानी तकनीक पर आधारित हैं. ट्रायल में यह देखा जाता है कि इतनी तेज रफ्तार पर ट्रैक और ट्रेन के पहियों के बीच संतुलन बना रहता है या नहीं. ट्रेन के सिग्नलिंग और ऑटोमेटिक सिस्टम की जांच होती है. यह सिस्टम तय करता है कि ट्रेन सही समय पर रुके, सही स्पीड पर चले और किसी भी खतरे की स्थिति में खुद-ब-खुद धीमी हो जाए.
मौसम और तापमान के असर की जांच भी ट्रायल का अहम हिस्सा है. जापान में हो रहे ट्रायल में खासतौर पर देखा जा रहा है कि ट्रेन भारत की गर्मी, धूल और अलग-अलग मौसमी परिस्थितियों में कैसा प्रदर्शन करती है. इसके साथ ही शोर और कंपन यानी नॉइज और वाइब्रेशन को भी मापा जाता है. तेज रफ्तार पर ट्रेन के अंदर यात्रियों को कम से कम झटके और आवाज महसूस हो, यह सुनिश्चित किया जाता है.
भारत में ट्रायल की मौजूदा स्थिति
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव पहले ही कह चुके हैं कि सूरत-बिलिमोरा सेक्शन पर पहला ट्रायल रन 2026 में होने की उम्मीद है. इसके लिए जापान से E3 और E5 सीरीज की शिंकानसेन ट्रेनें भारत भेजी जा रही हैं. इन ट्रेनों का जापान में पहले से ट्रायल चल रहा है, जिसमें तापमान सहनशीलता, धूल से बचाव और ड्राइविंग कंडीशन जैसे पहलुओं को परखा जा रहा है.
यह भी पढ़ें: जब बम नहीं नारियल के जरिए लड़ा गया युद्ध, कब चलाए गए थे कोकोनेट ग्रेनेड?
ट्रायल क्यों है जरूरी?
बुलेट ट्रेन जैसी हाई स्पीड टेक्नोलॉजी में जरा सी भी चूक बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है. यही वजह है कि इसे यात्रियों के लिए शुरू करने से पहले महीनों या सालों तक अलग-अलग परिस्थितियों में टेस्ट किया जाता है. हर पैरामीटर की बारीकी से जांच के बाद ही तय होता है कि ट्रेन को व्यावसायिक रूप से चलाने की मंजूरी दी जाए.
यह भी पढ़ें: घोड़े पालने का है शौक, जानें किस नस्ल के घोड़े होते हैं सबसे दमदार?



















