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नेपाल प्लेन हादसे में सब कुछ जल गया... लेकिन बचा रह गया ब्लैक बॉक्स, जानिए किस चीज का बना होता है ये

दुनिया में जब विमान हादसों की संख्या बढ़ने लगी तो साल 1953-54 के दौरान इन हादसों का पता लगाने के लिए डेविड रोनाल्डो वॉरेन ने ब्लैक बॉक्स का आविष्कार किया.

नेपाल में 72 लोगों को ले जा रहा एक विमान 15 जनवरी रविवार को हादसे का शिकार हो गया. अब तक मलबे से 68 शव निकाले जा चुके हैं, जबकि 4 लोग अभी भी लापता हैं. अब इस विमान हादसे पर सवाल उठ रहा है कि आखिर इस प्लेन में ऐसी क्या गड़बड़ी थी कि यह साफ मौसम होने के बाद भी हादसे का शिकार हो गया. बताया जा रहा है कि इस विमान का ब्लैक बॉक्स मिल गया है और कुछ ही समय में इसकी मदद से हादसे के सही कारणों का पता लगाया जा सकेगा. आज इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि आखिर यह ब्लैक बॉक्स होता क्या है और इसका काम क्या होता है. सबसे बड़ी बात कि जब पूरा प्लेन क्रैश होने के बाद राख के ढेर में तब्दील हो जाता है, उसके बावजूद भी यह ब्लैक बॉक्स हर बार हर हादसे में कैसे बच जाता है.

क्या होता है ब्लैक बॉक्स

ब्लैक बॉक्स एक तरह का फ्लाइट रिकॉर्डर होता है, जिसमें प्लेन की हर पल की मूवमेंट रिकॉर्ड होती है. यानी किस वक्त प्लेन में इंटरनल रूप से या टेक्निकल रूप से क्या गतिविधियां हुईं, उसके अंदर क्या बदलाव आए या कौन सा इक्विपमेंट्स खराब हुआ या कहां ऐसी समस्या आई जिसकी वजह से प्लेन हादसे का शिकार हुआ, सब कुछ इसमें बेहद बारीकी से रिकॉर्ड हो जाता है. यहां तक की पायलट और प्लेन के अंदर की आवाजों को भी यह ब्लैक बॉक्स रिकॉर्ड करता है. इसीलिए हादसे के बाद सबसे पहले ब्लैक बॉक्स को ढूंढा जाता है और फिर इसकी मदद से हादसे की वजह का पता लगाया जाता है.

यह किस चीज से बना होता है जो हर बार बच जाता है

अब सवाल उठता है कि क्रैश के बाद जब पूरा प्लेन राख के ढेर में तब्दील हो जाता है तो आखिर यह ब्लैक बॉक्स कैसे बच जाता है. इसका जवाब है क्योंकि इसे बेहद मजबूत धातु से बनाया जाता है. यह धातु कुछ और नहीं बल्कि पृथ्वी पर बहुत कम मात्रा में पाया जाने वाला टाइटेनियम है. ब्लैक बॉक्स एक टाइटेनियम के डिब्बे में बंद रहता है, जिसकी वजह से यह सुरक्षित रहता है.

कैसे हुई थी ब्लैक बॉक्स की खोज

दुनिया में जब विमान हादसों की संख्या बढ़ने लगी तो साल 1953-54 के दौरान इन हादसों का पता लगाने के लिए डेविड रोनाल्डो वॉरेन ने ब्लैक बॉक्स का आविष्कार किया. इस बॉक्स का नाम भले ही आज black-box है, लेकिन यह पूरी तरह से लाल रंग का होता है और शुरुआती दौर में इसे रेड एग के नाम से जाना जाता था. लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यानी लगभग 1958 में इसका नाम बदल कर ब्लैक बॉक्स कर दिया गया.

कैसे खोजा जाता है ब्लैक बॉक्स

विमान हादसे के बाद सबसे पहले ब्लैक बॉक्स को ही खोजा जाता है. क्योंकि इसी के माध्यम से पता चलता है कि आखिर प्लेन क्रैश क्यों हुआ. आपको बता दें ब्लैक बॉक्स पूरे 30 दिन तक बिना इलेक्ट्रिसिटी के काम कर सकता है. विमान हादसे के बाद लगभग 30 दिनों तक इसके अंदर से एक सिग्नल निकलता है जो 2 से 3 किलोमीटर के दायरे में आसानी से ट्रैक हो सकता है. इसी सिग्नल की मदद से खोजी टीम ब्लैक बॉक्स का पता लगाती है और इसे ढूंढ लेती है. वहीं अगर प्लेन समुद्र में क्रैश हुआ हो तो 15000 फीट की गहराई तक ब्लैक बॉक्स को खोजा जा सकता है.

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