क्या दोबारा ईस्ट पाकिस्तान बन सकता है बांग्लादेश, किन नियमों के तहत हो सकता है ऐसा?
Bangladesh Violence: बांग्लादेश में इस वक्त जो माहौल चल रहा है, उससे आशंका जताई जा रही है कि क्या यह फिर से ईस्ट पाकिस्तान बनाने की राह पर है. आइए जानें कि क्या वाकई ऐसा संभव है.

दक्षिण एशिया की राजनीति एक बार फिर करवट लेती दिख रही है. जिस बांग्लादेश ने 1971 में खून, संघर्ष और बलिदान के बाद पाकिस्तान से अलग होकर अपनी पहचान बनाई, उसी देश को लेकर आज सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतिहास खुद को दोहराने की ओर बढ़ रहा है. राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ते विरोध, अल्पसंख्यकों पर हमले और सत्ता के सख्त रुख ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं पर्दे के पीछे कोई बड़ी भू-राजनीतिक स्क्रिप्ट तो नहीं लिखी जा रही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि बांग्लादेश को दोबारा से ईस्ट पाकिस्तान बनाने की कवायद चल रही है?
बांग्लादेश की मौजूदा सियासी तस्वीर
बांग्लादेश इन दिनों गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. सरकार विरोधी प्रदर्शन, विपक्ष की आवाज पर सख्ती, मीडिया और नागरिक स्वतंत्रताओं पर दबाव तथा अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ बढ़ती हिंसा ने हालात को चिंताजनक बना दिया है. इन्हीं परिस्थितियों के बीच विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता का रवैया ‘पाकिस्तानी प्लेबुक’ जैसा होता जा रहा है. उनका कहना है कि छोटे विरोध प्रदर्शनों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताना, असहमति को देशद्रोह के चश्मे से देखना और सेना-प्रशासन का बढ़ता दखल, पाकिस्तान के पुराने मॉडल की याद दिलाता है.
‘पाकिस्तानी प्लेबुक’ से क्या मतलब है
सुशांत सरीन के मुताबिक पाकिस्तानी प्लेबुक का आशय उस शासन शैली से है, जिसमें लोकतांत्रिक असहमति को कुचलने के लिए सुरक्षा का तर्क दिया जाता है. पाकिस्तान में दशकों से सेना और खुफिया तंत्र का राजनीति पर प्रभाव रहा है. बांग्लादेश में भी अगर अंतरिम या मौजूदा सत्ता इसी राह पर आगे बढ़ती है, तो यह देश की लोकतांत्रिक आत्मा के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है. हालांकि यह कहना कि बांग्लादेश सीधे पाकिस्तान के प्रभाव में जा रहा है, एक राजनीतिक विश्लेषण है, न कि कोई आधिकारिक प्रक्रिया.
क्या बांग्लादेश दोबारा ईस्ट पाकिस्तान बन सकता है?
कानूनी और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से देखें तो बांग्लादेश का दोबारा पाकिस्तान में शामिल होना बेहद असंभव और जटिल है. 1971 के बाद बांग्लादेश एक संप्रभु राष्ट्र है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सहित पूरी दुनिया की मान्यता प्राप्त है. किसी भी स्वतंत्र देश का किसी दूसरे देश में विलय या शामिल होना केवल राजनीतिक बयानबाजी से संभव नहीं होता है. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, घरेलू संवैधानिक प्रावधान और जनता की स्पष्ट सहमति अनिवार्य होती है.
किसी देश को दूसरे देश में शामिल करने के नियम
अंतरराष्ट्रीय कानून में ऐसा कोई सीधा और बाध्यकारी नियम नहीं है, जो किसी देश को दूसरे देश में शामिल करने की प्रक्रिया को सरल बना दे. आमतौर पर यह एक लंबी और बहु-स्तरीय प्रक्रिया होती है. सबसे पहले दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत और समझौते जरूरी होते हैं. इसके बाद शामिल होने वाले देश में जनमत संग्रह कराया जाता है, ताकि यह साफ हो सके कि जनता का बहुमत इस फैसले के पक्ष में है या नहीं. जनमत संग्रह के बिना ऐसा कोई कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैध नहीं माना जाता है.
संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की अहमियत
अगर किसी देश की जनता किसी दूसरे देश में शामिल होने के पक्ष में मतदान भी कर दे, तब भी उस फैसले को संवैधानिक रूप से वैध बनाना जरूरी होता है. बांग्लादेश के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो पाकिस्तान में विलय की अनुमति देता हो. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मान्यता भी आवश्यक होती है. बिना अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के ऐसा कोई कदम केवल कागजी फैसला बनकर रह जाएगा.
भारत, पाकिस्तान और क्षेत्रीय संतुलन
बांग्लादेश का मुद्दा केवल ढाका और इस्लामाबाद तक सीमित नहीं है. भारत के लिए भी यह रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील विषय है. 1971 का युद्ध, शरणार्थियों का संकट और पूर्वी पाकिस्तान का इतिहास आज भी क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करता है. अगर बांग्लादेश में अस्थिरता बढ़ती है या पाकिस्तान का प्रभाव गहराता है, तो इसका असर भारत की सुरक्षा और दक्षिण एशिया के संतुलन पर पड़ सकता है.
यह भी पढ़ें: भारत हाथ खींच ले तो भूखा मर जाएगा बांग्लादेश, सिर्फ चावल नहीं इन चीजों की भी रहती है डिमांड
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL























