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बाबर, अकबर या औरंगजेब... अयोध्या पर किन-किन लोगों ने राज किया?

अयोध्या के राम मंदिर को 21 मार्च 1528 को ध्वस्त कर दिया था. ये लड़ाई धीरे-धीरे बढ़ती गई. आइए जानते हैं विस्तार से कि अयोध्या में किन-किन लोगों ने राज किया है.

अयोध्या ने 491 सालों में एक लंबा विवाद झेला है. बता दें ये एक सामान्य लड़ाई नहीं थी इसमें दो समाज के लोगों के बीच काफी हिंसा हुई. जानकारी के अनुसार बाबर के आदेश के बाद उसके सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या के राम मंदिर को 21 मार्च 1528 को ध्वस्त कर दिया था. ये लड़ाई धीरे-धीरे बढ़ती गई. आइए जानते हैं विस्तार से कि अयोध्या में किन-किन लोगों ने राज किया है.

कुश, भगवान राम के पुत्र, ने अयोध्या की धरोहर को नया जीवन देने का प्रयास किया और राम के जन्मस्थान पर एक विशाल मंदिर बनवाया. युगों के सफर के दौरान, यह मंदिर और अयोध्या अस्थायी हानि में पड़ गए, फिर एक राजा विक्रमादित्य ने इसे बचाया. 1528 में मीर बाक़ी द्वारा ध्वस्त किए जाने वाले मंदिर को 57 ईसा पूर्व में पुनः निर्माण किया गया. इसे राजाधिराज के शीर्षक से जाना जाता है, जिसने इसे नए युग का प्रेरणास्त्रोत बनाया.

यह मंदिर हिन्दुओं के आस्था और पहचान का शीर्ष केंद्र बना रहा. यह संकट मध्यकाल की शुरुआत से ही दिखाई देने लगा था. महमूद गजनवी के भतीजे सैयद सलार तुर्क ने अपनी शक्ति के विस्तार में अयोध्या क्षेत्र को शामिल करने का प्रयास किया. हालांकि 1033 ईस्वी में राजा सुहेलदेव ने उसे मारकर इसे मुक्त कर दिया. 1440 ईस्वी में जौनपुर के शारकी शासक महमूद शाह के शासन में अयोध्या को शामिल होने का भी उल्लेख है. इसके बावजूद, राम मंदिर के क्षतिग्रस्त होने के खिलाफ प्रतिरोध की ताकत अयोध्या प्रेमियों की रगों में अब भी थी.

राम मंदिर के वापसी के लिए 76 युद्ध लड़े गए थे. कभी-कभी ऐसा होता था कि विवादित स्थान पर मंदिर के दावेदार राजा और योद्धाओं ने इसे कुछ समय के लिए कब्जा कर लिया था. एक सैन्य अभियान चलाया गया था जिसका नेतृत्व पास के भीती रियासत के राजा महताब सिंह, हंसवार रियासत के राजा रणविजय सिंह, रानी जयराज कुंवरी, राजगुरु पं. देवीदीन पाण्डेय आदि ने किया था, उन्होंने निश्चित रूप से राजसी सेना को विचलित किया, लेकिन उसे परास्त नहीं कर सके. 1530 से 1556 ईसवी के बीच हुमायूं और शेर शाह के शासन के दौरान 10 युद्ध हुए.

संत बलरामाचार्य  शहीद 

हिन्दुओं की ओर से, इन युद्धों का नेतृत्व हंसवार की रानी जयराज कुंवरी और स्वामी महेशानंद ने किया. रानी ने महिला सेना का नेतृत्व किया और महेशानंद ने साधु सेना का नेतृत्व किया. इन युद्धों के दौरान, 1556 से 1605 ईसवी के बीच, अकबर के शासन के दौरान 20 युद्धों का उल्लेख है. इन युद्धों में, आयोध्या के संत बलरामाचार्य ने एक कमांडर के रूप में लड़ना जारी रखा और अंत में शहीद हो गए. इन युद्धों के परिणामस्वरूप, अकबर को इस पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया गया. बीरबल और तोदरमल की राय के साथ, उन्होंने बाबरी मस्जिद के सामने स्थित मंच पर राम मंदिर बनाने की अनुमति दी. अकबर के वंशज और औरंगज़ेब की नीतियाँ सांप्रदायिक थीं और इसका असर मंदिर-मस्जिद विवाद पर भी पड़ा. उनके शासनकाल के बीच, 1658 से 1707 ईसवी, राम मंदिर के लिए 30 युद्ध लड़े गए.

ऐसा भी कहा जाता है कि राम मंदिर को बाबर के आदेशों पर नहीं, बल्कि औरंगज़ेब के आदेशों पर नष्ट किया गया था, और उनके आदेशों पर अयोध्या के कुछ अन्य प्रमुख मंदिरों को भी नष्ट किया गया था. 18वीं सदी के बीच, मुघल शक्ति कमजोर हो गई थी, लेकिन मंदिर के लिए संघर्ष जारी रहा हालांकि, नवाबों के समय में अवध के नवाबों के दौरान अयोध्या ने कुछ मायने की सांस्कृतिक-धार्मिक स्वतंत्रता हासिल की. अवध के नवाब सादत अली खान  ने हिन्दू और मुस्लिमों को अकबर की तरह साथ में पूजा-पाठ करने की अनुमति दी. इसके बावजूद, संघर्ष नहीं रुका.

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