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ममता बनर्जी को कौन सी सिक्योरिटी मिली है, इसका कौन उठाता है खर्चा?

Mamata Banerjee Security: हाल ही में ममता बनर्जी ने इस बात का दावा किया है कि उन पर जानलेवा हमला हुआ है. आइए जानते हैं कि उन्हें कौन सी सिक्योरिटी मिली है.

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  • बैरकपुर में ममता बनर्जी ने अपनी गाड़ी पर हमले का दावा किया।
  • उन्हें Z+ सुरक्षा प्राप्त है, जिसमें 248 कर्मी तैनात होते हैं।
  • इसमें बुलेटप्रूफ गाड़ी, एस्कॉर्ट शामिल; खर्च सरकार उठाती है।

Mamata Banerjee Security: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रविवार को इस बात का दावा किया कि उत्तर 24 परगना में एक टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने जाते समय बैरकपुर में उन पर जानलेवा हमला हुआ. ममता बनर्जी के मुताबिक असामाजिक तत्वों ने पुलिसकर्मियों के सामने उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके. टक्कर इतनी जोरदार थी कि उन्हें डर था कि अगर खिड़कियां खुली होती तो उन्हें गंभीर चोट लग सकती थी. इस आरोप के बीच पूर्व मुख्यमंत्री को दी गई सुरक्षा, उनकी सुरक्षा के लिए तैनात कर्मियों की संख्या और इस सुरक्षा का खर्च कौन उठाता है इस पर भी सवाल उठ रहे हैं. आइए जानते हैं क्या हैं इन सवालों के जवाब.

ममता बनर्जी के पास Z+ सुरक्षा

ममता बनर्जी को Z+ श्रेणी की सुरक्षा दी गई है. यह भारत में मौजूद सुरक्षा के उच्चतम स्तरों में से एक है. ऐसी सुरक्षा किसी व्यक्ति के लिए खतरे की आशंका का आकलन करने के बाद ही दी जाती है. इसके लिए खुफिया जानकारी और सुरक्षा समीक्षाओं का सहारा लिया जाता है. इस व्यवस्था में हथियारबंद जवान, एस्कॉर्ट गाड़ियां, आवास की सुरक्षा और पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर शामिल होते हैं. सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के आसपास एक समय में 55 से ज्यादा जवान तैनात हो सकते हैं. ये जवान कई शिफ्टों में काम करते हैं. 

कितने जवान शामिल होते हैं? 

सुरक्षा व्यवस्था उस संख्या से काफी बड़ी होती है जितने जवान एक समय में बनर्जी के साथ होते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक तीन शिफ्टों और सहायक कार्यों में लगभग 248 सुरक्षाकर्मी शामिल होते हैं. तैनाती में अलग-अलग जिम्मेदारियां शामिल होती हैं. जैसे आवास पर सुरक्षा, आवाजाही के दौरान सुरक्षा, एक्सेस कंट्रोल और आपातकालीन स्थिति में कार्रवाई. किसी खास जगह पर तैनात जवानों की सही संख्या खतरे के आकलन, कार्यक्रम और आवाजाही के शेड्यूल के आधार पर बदल सकती है. 


ममता बनर्जी को कौन सी सिक्योरिटी मिली है, इसका कौन उठाता है खर्चा?

Z+  सुरक्षा में क्या-क्या शामिल है? 

Z+  सुरक्षा में आमतौर पर सुरक्षा की कई परतें होती हैं, ना कि सिर्फ किसी नेता के आसपास हथियारबंद गार्ड तैनात करना. सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति को बुलेटप्रूफ गाड़ी, हथियारबंद एस्कॉर्ट और करीबी सुरक्षा कर्मी मिल सकते हैं. हमले या फिर किसी दूसरी आपातकालीन स्थिति में तेजी से कार्रवाई करने के लिए एक क्विक रिएक्शन टीम भी काफिले के साथ हो सकती है. 

सुरक्षाकर्मी आधुनिक संचार उपकरण और दूसरी सुरक्षा तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं. आवास की सुरक्षा में खतरे के आकलन के आधार पर एक्सेस कंट्रोल सिस्टम, स्क्रीनिंग उपकरण और दूसरे उपाय भी शामिल हो सकते हैं. 

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अतिरिक्त सुरक्षा क्यों कम की गई?

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हालात बदलने के बाद रिपोर्ट्स के मुताबिक कोलकाता पुलिस ने बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास के बाहर की अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था को हटा दिया था. इसमें कुछ बैरिकेड्स और सुरक्षा की एक अतिरिक्त घेराबंदी भी शामिल थी. हालांकि मुख्य Z+  सुरक्षा घेरा बना रहता है. 

सुरक्षा इंतजाम हमेशा एक जैसे नहीं रहते. अधिकारी समय-समय पर खतरे का आकलन करते हैं और खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षा के खास खतरों को बढ़ा या घटा सकते हैं.


ममता बनर्जी को कौन सी सिक्योरिटी मिली है, इसका कौन उठाता है खर्चा?

सुरक्षा का खर्च कौन उठाता है? 

वीआईपी सुरक्षा, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत तय होती है. इसमें येलो बुक से जुड़ा ढांचा भी शामिल है. हालांकि असल तैनाती में संबंधित राज्य की पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसी शामिल हो सकती है. बनर्जी के मामले में राज्य के अंदर सुरक्षा देने में पश्चिम बंगाल पुलिस और कोलकाता पुलिस बड़ी भूमिका निभाते हैं. इस वजह से ऐसी सुरक्षा बनाए रखने का खर्च ज्यादातर सरकारी बजट से उठाया जाता है. 

Z+  सुरक्षा का खर्च कितना आता है? 

वीआईपी सुरक्षा का खर्च कर्मचारियों की संख्या, गाड़ियों, यात्रा के शेड्यूल, उपकरणों और ऑपरेशनल जरूरत के आधार पर काफी अलग-अलग हो सकता है. अनुमानों के मुताबिक हाई लेवल सुरक्षा इंतजाम का खर्च कभी-कभी ₹50 लाख प्रति महीने या फिर 6 करोड़ रुपये सालाना भी हो सकता है. लेकिन असल खर्च इससे थोड़ा अलग हो सकता है. बड़े खर्चों में कर्मचारियों की सैलरी और भत्ते, ईंधन, गाड़ी का रखरखाव, बुलेट प्रूफ गाड़ी, कम्युनिकेशन उपकरण और सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल होते हैं. अगर कर्मचारियों को इलाके के बाहर से बुलाया जाता है तो रहने की जगह और दूसरी लॉजिस्टिकल व्यवस्था का खर्च भी इसमें जुड़ सकता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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