बिना स्मार्टफोन पहाड़ों से मैदान तक कैसे पहुंचती थी तबाही की खबर, कैसे बचती थी जान?
स्मार्टफोन से पहले पहाड़ों पर प्राकृतिक आपदाओं की सूचना आग, धुएं, शंखध्वनि, चर्च की घंटियों और अल्पाइन हॉर्न जैसे पारम्परिक संसाधनों से भेजी जाती थी. आइए जानें कि उस दौर में कैसे जान बचती थी.

स्मार्टफोन और सैटेलाइट के इस आधुनिक युग में मौसम के पल-पल के बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं की सटीक चेतावनी समय रहते मिल जाती है. दूरदराज के क्षेत्रों से भी ऑडियो-वीडियो के माध्यम से त्वरित संपर्क साधना अब बेहद आसान हो चुका है. लेकिन जब ये तकनीकी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं, तब भी पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की एक मजबूत और व्यावहारिक व्यवस्था काम करती थी. उस दौर में विषम परिस्थितियों, भूस्खलन, हिमस्खलन और बाढ़ जैसे खतरों की स्थिति में पहाड़ों से नीचे मैदानी इलाकों और घाटियों तक जीवन रक्षक संकेत भेजने के लिए अनूठे पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था.
आग और धुएं से संकेतों का आदान-प्रदान
प्राचीन काल में पहाड़ों पर आई मुसीबत का अलर्ट निचले इलाकों तक भेजने का सबसे असरदार जरिया रोशनी और धुआं हुआ करते थे. दिन के समय ऊंचे शिखरों पर गीली लकड़ियों व पत्तियों को जलाकर घना धुआं किया जाता था, जो कई किलोमीटर दूर से साफ नजर आता था. वहीं रात के अंधेरे में विशाल मशालें या आग की ऊंची लपटें जलाकर खतरे की सूचना दी जाती थी. घाटी में रहने वाले लोग इन संकेतों को देखते ही सतर्क हो जाते थे और सुरक्षित स्थानों की ओर चले जाते थे.
हिमालयी क्षेत्रों में 'खडपटिया' की प्राचीन परंपरा
भारतीय हिमालयी राज्यों में आपदा का त्वरित संदेश फैलाने के लिए 'खडपटिया' प्रणाली बेहद प्रचलित थी. इसके तहत पहाड़ों की रणनीतिक चौकियों और ऊंची चोटियों पर सूखी लकड़ियों के विशाल ढेर तैयार रखे जाते थे. जैसे ही पहाड़ी पर लैंडस्लाइड, हिमपात या जलप्रलय का अंदेशा होता, वहां तैनात लोग तुरंत इस ढांचे में आग लगा देते थे. दूर-दराज के गांवों के निवासी इस जलते ढेर को देखते ही समझ जाते थे कि ऊपर कोई गंभीर संकट आन पड़ा है और तुरंत बचाव में जुट जाते थे.
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ध्वनि संकेतों से चेतावनी और शंखनाद
दृश्य संकेतों के अलावा तेज आवाज पैदा करने वाले साधनों का इस्तेमाल भी सूचना तंत्र के रूप में किया जाता था. खतरे की स्थिति में शंख, तुरही और बिगुल बजाकर विशिष्ट प्रकार की स्वर लहरियां उत्पन्न की जाती थीं. इसके अलावा बाद में पटाखों और तेज धमाकों के जरिए भी दूर तक अलर्ट भेजा जाने लगा. इन आवाजों की लय और तीव्रता से ग्रामीण भली-भांति समझ जाते थे कि आपदा किस तरह की है और कितनी तेजी से नीचे की तरफ बढ़ रही है.
आल्पस की पहाड़ियों पर चर्च बेल और अल्पाइन हॉर्न
यूरोप के आल्पस पर्वतीय इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं से आगाह करने के लिए अलग और व्यवस्थित नियम बने हुए थे. वहां पहाड़ों पर स्थित चर्च के विशाल घंटों को एक खास लय और रफ्तार में बजाया जाता था. हिमस्खलन या फ्लैश फ्लड के लिए अलग-अलग तरह के घंटी पैटर्न तय थे. इसके साथ ही लकड़ी से बने लंबे अल्पाइन हॉर्न का उपयोग किया जाता था, जिसकी गूंज गहरी घाटियों को पार करती हुई एक चोटी से दूसरी चोटी तक चेतावनी संदेश पहुंचा देती थी.

बारूद के धमाके और ऊंची पुकार की तकनीक
आल्प्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय पहाड़ी बस्तियों में खनन गतिविधियों या अचानक आई आपदाओं के प्रति सचेत करने के लिए गनपाउडर के विस्फोट किए जाते थे. बंदूकों से लगातार गोलियां चलाकर भी आपात स्थिति का ऐलान किया जाता था. इसके अलावा, पहाड़ी इलाकों की तेज बर्फीली हवाओं को चीरते हुए दूर तक संदेश भेजने के लिए स्थान-विशेष की विशिष्ट ऊंची आवाज वाली पुकार (योडलिंग या खास चीख) का सहारा लिया जाता था, जिससे आसपास की चोटियों पर मौजूद लोग तुरंत सजग हो जाते थे.
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