कहां से कहां तक थीं अखंड भारत की सीमाएं, तब कितना शक्तिशाली था अपना देश?
प्राचीन काल में भारत केवल वर्तमान सीमाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार और इंडोनेशिया जैसे कई देश शामिल थे. आइए जानें कि आज इसकी चर्चा क्यों हो रही है.

- प्राचीन ग्रंथों में भारतवर्ष समुद्र के उत्तर, हिमालय के दक्षिण वर्णित है.
- अखंड भारत में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका शामिल थे.
- थाईलैंड 'स्वर्णभूमि', इंडोनेशिया 'यवद्वीप' प्राचीन भारत का हिस्सा थे.
- चंद्रगुप्त-अशोक के शासन में सीमाओं का विस्तार, साम्राज्य चरमोत्कर्ष पर था.
आज जब पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अपनी कंगाली का कटोरा लेकर पूरी दुनिया के चक्कर काट रहा है, तब उसकी बदहाली देखकर इतिहास के पन्ने याद आते हैं. कर्ज में डूबे पाकिस्तान के हुक्मरान आज अपनी बर्बादी छुपाने के लिए यूएई जैसे संपन्न देशों को अखंड भारत का हिस्सा होने का डर दिखा रहे हैं, लेकिन क्या वे जानते भी हैं कि जिस अखंड भारत का वे नाम ले रहे हैं, वह कितना शक्तिशाली और वैभवशाली था? यह वह भारत था जिसके आगे पूरी दुनिया सिर झुकाती थी. चलिए जानें कि इसकी सीमाएं कहां तक थीं.
प्राचीन ग्रंथों में क्या थी भारत की परिभाषा?
विष्णु पुराण के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार, समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो भूभाग स्थित है, वही भारतवर्ष है. प्राचीन काल में इसे 'जम्बूद्वीप' कहा जाता था, जो चक्रवर्ती सम्राट भरत की विरासत को दर्शाता है. यह एक ऐसी इकाई थी जहां हिमालय की चोटियों से लेकर हिंद महासागर की लहरों तक एक ही संस्कृति का प्रभाव था.
शक्तिशाली आर्यावर्त और जम्बूद्वीप का विस्तार कहां तक था?
अखंड भारत के स्वरूप को समझने के लिए हमें इसके पुराने नक्शे को देखना होगा. इसमें आज का अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका शामिल थे. उस समय अफगानिस्तान को 'उपगणस्थान' और म्यांमार को 'ब्रह्मदेश' कहा जाता था. यह पूरा क्षेत्र न केवल भौगोलिक रूप से एक था, बल्कि व्यापारिक और सैन्य रूप से भी बेहद शक्तिशाली था.
किस नाम से जाना जाता था आज का इंडोनेशिया और थाईलैंड?
अखंड भारत की पहचान उसकी सांस्कृतिक समरसता से थी. थाईलैंड को तब 'स्वर्णभूमि' या 'श्यामदेश' कहा जाता था, जबकि इंडोनेशिया को 'यवद्वीप' के नाम से जाना जाता था. तिब्बत को 'त्रिविष्टप' के रूप में पहचान मिली थी. इन सभी क्षेत्रों में वैदिक और बौद्ध विचारधारा का प्रसार था. इस विशाल भू-भाग पर राजनीतिक और धार्मिक तौर पर एक ही सभ्यता का प्रभाव दिखता था.
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ऐतिहासिक शहरों के पौराणिक नाम
इतिहास बताता है कि आज के कई चर्चित शहर कभी भारतीय पहचान का हिस्सा थे. मुल्तान को 'मूलस्थान' कहा जाता था, जो एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था. पेशावर को 'पुरुषपुर' और काबुल को 'कुभानगर' के नाम से जाना जाता था. ये शहर उस समय के व्यापारिक मार्गों के मुख्य पड़ाव थे, जो अखंड भारत की आर्थिक मजबूती की गवाही देते थे.
आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त ने रखी महान साम्राज्य की नींव
अखंड भारत को हकीकत में बदलने का सबसे बड़ा श्रेय आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य को जाता है. विदेशी आक्रमणों के खतरे को देखते हुए चाणक्य ने छोटे-छोटे राज्यों को जोड़कर एक महान साम्राज्य की नींव रखी. चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी आक्रांता सेल्यूकस निकेटर को हराकर कंधार और हेरात को भारत का हिस्सा बनाया, जिससे भारतीय सीमाएं सुदूर पश्चिम तक सुरक्षित हो गईं.
सम्राट अशोक और सीमाओं का चरमोत्कर्ष
मौर्य वंश के ही सम्राट अशोक के समय भारत अपनी शक्ति के चरम पर था. उनका प्रशासन इतना व्यवस्थित था कि आज भी उनके शिलालेख अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक मिलते हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि उस समय एक ही नियम और एक ही झंडे के नीचे पूरा अखंड भारत एकजुट होकर रहता था और किसी बाहरी शक्ति की हिम्मत नहीं थी कि वह आंख उठाकर देख सके.
कब शुरू हुए विदेशी आक्रमण और सीमाओं का सिमटना
करीब 2500 सालों के इतिहास में अखंड भारत की सीमाओं पर लगातार हमले हुए. शक, हूण, अरब, तुर्क, मंगोल और अंत में ब्रिटिश शासकों ने इस विशाल भू-भाग को धीरे-धीरे टुकड़ों में बांट दिया. समय के साथ सांस्कृतिक पहचान राजनीतिक सीमाओं में उलझ गई और वह विशाल साम्राज्य आज के आधुनिक भारत के नक्शे तक सीमित होकर रह गया.
वृहत्तर भारत का वैश्विक प्रभाव
भारत का प्रभाव केवल उसकी सीमाओं के भीतर नहीं था, बल्कि इसे 'वृहत्तर भारत' (Greater India) के रूप में भी देखा गया. कंबोडिया में बना 'अंकोरवाट मंदिर' और इंडोनेशिया का 'श्रीविजय साम्राज्य' इस बात का जीता-जागता सबूत हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की भाषा, परंपराओं और खान-पान पर आज भी संस्कृत और रामायण की गहरी छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है.
अखंड भारत की अटूट विरासत
अंततः अखंड भारत केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा है. हिमालय से समुद्र तक फैला यह क्षेत्र कभी ज्ञान, विज्ञान और धर्म का केंद्र हुआ करता था. आज की दुनिया में भले ही राजनीतिक सरहदें बदल गई हों, लेकिन इतिहास हमें यह याद दिलाता रहता है कि एकता में ही शक्ति है और भारत की जड़ें कितनी गहरी और प्राचीन हैं.
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