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Explained: दूध के नए जादुई पैकेट का जुगाड़ क्या? कैसे कूड़े के ढेर से गायब होने पर लगेगी लगाम, दिल्ली में नहीं दिखेंगी पुरानी थैलियां

Fugitive Plastic Rid: फ्यूजिटिव प्लास्टिक की समस्या तभी कम होगी जब लोग कचरे को सही जगह फेंकने की आदत डालें और रिसाइक्लिंग का बुनियादी ढांचा मजबूत हो. नया पाउच एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच की तरह है.

हर रोज सिर्फ दिल्ली-NCR में लाखों दूध की थैलियां खाली होती हैं, मरोड़कर फेंक दी जाती हैं और फिर एक अजीब किस्म की गुमनामी में खो जाती हैं. ये न कूड़े के सही ढेर पर रुकती हैं, न रिसाइक्लिंग प्लांट तक पहुंचती हैं. ये हैं ‘फ्यूजिटिव प्लास्टिक’. लेकिन अब इस पर लगाम लगाने के लिए एक ऐसा कदम उठने जा रहा है जो भारत में पहली बार हो रहा है. 5 जून 2026 यानी विश्व पर्यावरण दिवस पर मदर डेयरी एक ऐसा दूध का पाउच लॉन्च कर रही है जो अगर रिसाइकिल न हो पाए और मिट्टी में पहुंच जाए, तो खुद-ब-खुद गलकर प्रकृति में वापस मिल जाएगा. आइए जानते हैं कि आपकी रसोई में रोज आने वाली दूध की थैली कैसे बड़ा बदलाव लाने जा रही है...

दूध के पाउच और ‘गायब होता प्लास्टिक’ की असल समस्या क्या है?

जब हम प्लास्टिक प्रदूषण की बात करते हैं तो आमतौर पर बोतल, शॉपिंग बैग या पैकेजिंग का ध्यान आता है. लेकिन दूध के पाउच जैसी रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीजों का कचरा बहुत बड़ा संकट खड़ा कर रहा है. ये पाउच बेहद हल्के होते हैं और घरों से लेकर कूड़ेदान तक के सफर में अक्सर हवा में उड़कर इधर-उधर बिखर जाते हैं. यही वो प्लास्टिक है जिसे एक्सपर्ट ‘फ्यूजिटिव प्लास्टिक’ कहते हैं. यानी ऐसा प्लास्टिक जो कलेक्शन और रिसाइक्लिंग की औपचारिक व्यवस्था से बचकर निकल जाता है और सीधे खुले पर्यावरण में पहुंच जाता है.

इस समस्या की भयानकता समझने के लिए आंकड़े काफी हैं. देशभर में हर दिन करीब 12 करोड़ दूध के पाउच बेचे और फेंके जाते हैं. अकेले दिल्ली-NCR में मदर डेयरी जैसी बड़ी कंपनियां लाखों लीटर दूध पाउच में सप्लाई करती हैं. साल 2018 में पर्यावरण संस्था ‘चिंतन’ ने दिल्ली के कूड़े का ऑडिट किया था, जिसमें एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ. राजधानी के कूड़े में जो भी ब्रांडेड सिंगल-लेयर प्लास्टिक मिला, उसका 57 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ दूध के पाउच और टेट्रा पैक का था. मतलब, आपके घर से निकलने वाला हर दूसरा पाउच सही तरीके से रिसाइकल नहीं हो पाता. यह नालियों को चोक करने, मिट्टी की उर्वरता खराब करने और पानी के जरिए माइक्रोप्लास्टिक बनकर पूरी फूड चेन में घुसने लगता है.

तो क्या दूध के पाउच को बंद नहीं किया जा सकता?

यहीं पर पूरी डेयरी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दुविधा शुरू होती है. दूध एक ऐसी चीज है जो हर घर में रोज आती है, उसे सस्ता भी होना चाहिए, हाइजीन भी पूरी चाहिए और उसे लाखों घरों तक बिना खराब हुए पहुंचाने की बड़ी सप्लाई चेन भी काम करनी चाहिए. प्लास्टिक पाउच ने पिछले कई दशकों से ये तीनों जरूरतें पूरी की हैं. यह बेहद हल्का होता है जिससे ढुलाई सस्ती पड़ती है, सील बंद होने के कारण दूध बाहरी संक्रमण से बचा रहता है और इसकी कीमत इतनी कम होती है कि दूध की कीमत पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ता.

कांच की बोतल या दूसरे पैकेजिंग ऑप्शन या तो महंगे हैं या उतने प्रैक्टिकल नहीं. इसलिए डेयरी इंडस्ट्री के सामने चुनौती यही रही है कि पाउच के फायदे बरकरार रखते हुए पर्यावरण पर पड़ने वाले इसके नुकसान को कैसे खत्म किया जाए.

मदर डेयरी के नए पाउच का जादू क्या है?

इसी चुनौती का हल निकालने के लिए मदर डेयरी ने एक यूरोपीय रिसर्च कंपनी के साथ मिलकर पिछले चार सालों तक रिसर्च की. नतीजा एक ऐसा पाउच है जो दिखने, छूने और इस्तेमाल करने में बिल्कुल आम प्लास्टिक पाउच जैसा ही लगता है. स्टोरेज, ढुलाई और दूध रखने के दौरान इसकी मजबूती, स्वाद, क्वालिटी और शेल्फ लाइफ में रत्ती भर का भी फर्क नहीं पड़ता. लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब यह फेंका जाता है और अगर यह रिसाइकिल होने की बजाय पर्यावरण में कहीं मिट्टी में पहुंच जाए.

कंपनी के मुताबिक, मिट्टी के संपर्क में आने पर यह पाउच सबसे पहले एक ‘बायोअवेलेबल वैक्स’ में बदलने लगता है. इसके बाद मिट्टी में प्राकृतिक तौर पर मौजूद सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स) इस वैक्स को अपना भोजन बनाकर तोड़ने लगते हैं. पूरी प्रक्रिया के अंत में यह पाउच बिना किसी प्लास्टिक के कण छोड़े पूरी तरह प्राकृतिक तत्वों में बदल जाता है. पारंपरिक प्लास्टिक पाउच को गलने में जहां सैकड़ों साल लगते हैं, वहीं यह नया पाउच उपयुक्त मिट्टी की स्थितियों में कुछ ही सालों के भीतर गलकर खत्म हो जाएगा.

इस खासियत को परखने के लिए इसका परीक्षण NABL से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र प्रयोगशाला में किया गया, जिसमें इसकी बायोडिग्रेडेबिलिटी और इको-टॉक्सिसिटी दोनों को जांचा गया ताकि यह साबित हो सके कि गलने के बाद यह मिट्टी या पानी में कोई जहरीला पदार्थ नहीं छोड़ता.

पहला कदम कहां से शुरू होगा और आम उपभोक्ता पर क्या असर पड़ेगा?

मदर डेयरी यह बदलाव पूरे पोर्टफोलियो पर एक साथ नहीं कर रही. इसकी शुरुआत 5 जून 2026 से केवल एक वेरिएंट काउ मिल्क यानी गाय के दूध से की जा रही है. यह अकेला वेरिएंट दिल्ली-NCR में कंपनी की कुल दैनिक बिक्री का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है. यानी शुरुआती दौर में ही लाखों पाउच रोजाना इस नई तकनीक से बनेंगे.

नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड और मदर डेयरी के चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह ने साफ तौर पर कहा है कि इस पैकेजिंग की लागत में जो भी इजाफा हुआ है, उसे कंपनी खुद वहन करेगी. उपभोक्ताओं को दूध के दाम में कोई बढ़ोतरी नहीं दिखेगी. इतना ही नहीं, दूध का स्वाद, महक, रख-रखाव का तरीका और पैकेट खोलने का अनुभव भी पूरी तरह जस का तस रहेगा. गलने की प्रक्रिया तभी शुरू होगी जब पाउच फेंक दिया जाए और वह मिट्टी के संपर्क में माइक्रोबियल एक्टिविटी वाली परिस्थितियों में पहुंचे. घर के फ्रिज में या दुकान के स्टोरेज में यह अपने आप गलना शुरू नहीं कर देगा.

मदर डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर जयतीर्थ चारी का कहना है कि यह पहल ‘फ्यूजिटिव प्लास्टिक’ की उस चुनौती से निपटने के लिए है जो रिसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की पहुंच से बाहर है. उनके मुताबिक, 'ये पाउच रिसाइकिल भी हो सकते हैं, लेकिन असली फर्क तब पड़ता है जब ये सिस्टम से बाहर निकल जाते हैं और वहां ये बिना कोई प्लास्टिक ट्रेस छोड़े प्राकृतिक तत्वों में बदल जाते हैं.'

क्या यह सच में काम करेगा और इसकी चुनौतियां क्या हैं?

यह तकनीक जितनी आकर्षक लगती है, इसके साथ कुछ अहम सवाल भी जुड़ते हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच फेंके गए पाउचों को गलने लायक सही मिट्टी और नमी वाला वातावरण मिल पाएगा? बहुत सारा प्लास्टिक कचरा लैंडफिल की सूखी परतों में या पानी से भरी नालियों में चला जाता है, जहां माइक्रोबियल एक्टिविटी सीमित हो सकती है. 

एनवॉयरमेंटलिस्ट डॉ. सुभाष सी पांडे का कहना है कि इस पाउच को गलने के लिए मिट्टी के भीतर सूक्ष्मजीवों की सक्रियता वाला वातावरण जरूरी है, इसलिए अगर पाउच सीमेंट के ढेर या प्लास्टिक की परतों के बीच दब जाए तो डीग्रेडेशन की रफ्तार कम हो सकती है. यह पहल अहम हो सकती हैं क्योंकि दूध के पाउच का बड़ा हिस्सा शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में खुले में ही फेंका जाता है, जहां मिट्टी और नमी का संपर्क होता ही है.

दूसरा पहलू यह है कि भारत में पहली बार किसी बड़ी डेयरी कंपनी ने सिंगल-लेयर पैकेजिंग में बायोडिग्रेडेशन की ऐसी असली क्षमता लाने का दावा किया है. यह ऑक्सो-डिग्रेडेबल प्लास्टिक जैसे विवादित दावों से बिल्कुल अलग है, जो सिर्फ छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक कणों में टूटते हैं, पूरी तरह नष्ट नहीं होते. मदर डेयरी ने जो टेस्टिंग करवाई है, उसमें पूरी बायोडिग्रेडेबिलिटी और गैर-विषाक्तता साबित करने का दावा है.

एक पाउच से पूरी इंडस्ट्री के बदलाव तक

मदर डेयरी का यह कदम एक प्रोडक्ट लॉन्च भर नहीं है, बल्कि यह उस सोच का नतीजा है जो पैकेजिंग को ही समस्या का समाधान बनाना चाहती है. अभी यह सिर्फ एक वेरिएंट तक सीमित है, लेकिन कंपनी के संकेत हैं कि अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो इसे पूरे पोर्टफोलियो और दूसरे शहरों में भी ले जाया जाएगा. इससे पूरी डेयरी इंडस्ट्री के लिए एक मिसाल कायम हो सकती है.

बहरहाल, यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ तकनीक से प्रदूषण खत्म नहीं होगा. फ्यूजिटिव प्लास्टिक की समस्या तभी कम होगी जब लोग कचरे को सही जगह फेंकने की आदत डालें और रिसाइक्लिंग का बुनियादी ढांचा मजबूत हो. नया पाउच एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच की तरह है. अगर पाउच सिस्टम से बाहर निकल भी जाए तो वह प्रकृति में वापस घुलकर नुकसान कम कर सकेगा.

अगर यह पहल उम्मीद के मुताबिक काम करती है तो हम दूध की थैली को लेकर उस अपराधबोध से मुक्ति पा सकते हैं जो हर सुबह कूड़ेदान में देखने पर होता है. फिलहाल, 5 जून से आप जब दिल्ली-NCR में मदर डेयरी का गाय का दूध खरीदेंगे तो यह पाउच दिखने में भले ही वही लगे, लेकिन इसकी अंदरूनी केमिस्ट्री पर्यावरण के लिए एक बड़ी राहत का वादा लेकर आ रही है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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