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आज ही के दिन लगी थी न्यूट्रॉन बम बनाने पर रोक, जानें परमाणु बम से यह कितना ज्यादा खतरनाक?

न्यूट्रॉन बम भी एक तरह का अटॉमिक वेपन है, लेकिन यह पारंपरिक परमाणु बम से अलग होता है. गौर करने वाली बात यह है कि न्यूट्रॉन बम की विस्फोटक ताकत कम होती है, लेकिन इससे न्यूट्रॉन रेडिएशन ज्यादा होता है.

इतिहास की कई बड़ी घटनाएं सात अप्रैल की तारीख में दर्ज हैं. इनमें कुछ ऐसी घटनाएं भी हैं, जो दुनिया को मौजूदा सूरत देने में मददगार हैं तो काफी ज्यादा डरा देती हैं. इनमें से एक ऐसी घटना वह है, जब न्यूट्रॉन बम बनाने पर रोक लगाई गई थी. दरअसल, 7 अप्रैल 1978 के दिन अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने न्यूट्रॉन बम बनाने पर रोक लगाई थी. हालांकि, इस कार्यक्रम को पूरी तरह 1990 में रोका गया था. आइए आपको बताते हैं कि परमाणु बम के मुकाबले न्यूट्रॉन बम कितना खतरनाक था?

कैसा होता है न्यूट्रॉन बम?

न्यूट्रॉन बम को तकनीकी रूप से एन्हांस्ड रेडिएशन वेपन (Enhanced Radiation Weapon) कहा जाता है. यह भी एक तरह का अटॉमिक वेपन है, लेकिन यह पारंपरिक परमाणु बम से अलग होता है. गौर करने वाली बात यह है कि न्यूट्रॉन बम की विस्फोटक ताकत कम होती है, लेकिन इससे न्यूट्रॉन रेडिएशन काफी ज्यादा होता है. ऐसे में जैविक ऊतक इस बम के विस्फोट से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, लेकिन इमारतों और ढांचों को कम नुकसान पहुंचता है.

पहली बार कब बनाया गया था न्यूट्रॉन बम?

न्यूट्रॉन बम को बनाने की प्लानिंग पहली बार 1950 के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक सैमुअल कोहेन ने की थी. 1960 के दशक में इसका परीक्षण शुरू हुआ और 1970-80 के दशक में अमेरिका ने इसे विकसित कर लिया. 1963 में अमेरिका ने न्यूट्रॉन बम का सफल परीक्षण किया. इस बम को शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के टैंकों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए खासतौर पर बनाया गया था.

क्यों सफल नहीं हो पाया न्यूट्रॉन बम?

न्यूट्रॉन बम को 'कैपिटलिस्ट बम' कहा गया, क्योंकि इससे लोगों की मौत हो जाती थी, लेकिन इमारतों आदि को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता था. अमेरिका ने शीत युद्ध के दौरान न्यूट्रॉन बम को यूरोप में तैनात करने की योजना बनाई थी, लेकिन पश्चिमी यूरोपीय देशों ने इसका जमकर विरोध किया. अहम बात यह है कि न्यूट्रॉन बम सिर्फ खास हालात जैसे टैंक हमलों को रोकने के लिए उपयोगी था, जबकि नॉर्मल वॉर में पारंपरिक परमाणु हथियार ज्यादा प्रभावी माने गए. न्यूट्रॉन रेडिएशन का असर कुछ किलोमीटर तक ही सीमित था. इसके अलावा न्यूट्रॉन बम बनाने के लिए ड्यूटेरियम और ट्रिटियम जैसे दुर्लभ व महंगे आइसोटोप की जरूरत होती थी, जिससे इसे बनाने में काफी खर्च आता था. साथ ही, न्यूट्रॉन बम के रखरखाव का खर्च भी ज्यादा होता था. वहीं, शी युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका ने 1990 के दशक में अपने न्यूट्रॉन बम कार्यक्रम को बंद कर दिया. 

देश-दुनिया के इतिहास में सात अप्रैल की तारीख पर ये घटनाएं भी दर्ज हैं. 

  • 1818: ब्रिटिश सरकार ने बिना मुकदमे के लोगों को निर्वासित करने और हिरासत में रखने वाला कानून ‘बंगाल स्टेट प्रिजनर्स रेगुलेशन एक्ट’ पेश किया. यह कानून भारत की आजादी तक प्रभावी रहा.
  • 1919: बाबेरियन सोवियत गणराज्य की स्थापना.
  • 1920: भारत के प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रवि शंकर का जन्म.
  • 1929: पहली वाणिज्यिक उड़ान भारत पहुंची, जब ब्रिटेन के इंपीरियल एयरवेज की लंदन-काहिरा सेवा को कराची तक बढ़ाया गया.
  • 1946: फ्रांस से सीरिया की आजादी का अनुमोदन.
  • 1948: संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन का गठन.  डब्ल्यूएचओ दुनियाभर के देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए आपसी सहयोग एवं मानक विकसित करने का दायित्व निभाता है. डब्ल्यूएचओ का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में है. इस दिन को दुनिया भर में विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है.
  • 1955: विंस्टन चर्चिल ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया.
  • 1978: अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने न्यूट्रॉन बम बनाने पर रोक लगाई.
  • 2010: पटना की एक विशेष अदालत ने बिहार में एक दिसंबर 1997 को अरवल जिले के लक्ष्मणपुर और बाथे गांवों में 58 दलितों की हत्या के मामले में 16 दोषियों को फांसी और 10 को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई.
  • 2020: भारत ने मलेरिया के उपचार की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को आंशिक रूप से हटाने का फैसला किया.
  • 2022: आरबीआई ने बैंकों को डिजिटल बैंकिंग इकाइयां स्थापित करने के दिशानिर्देश जारी किए.

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