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Delhi Cinema Hall: दिल्ली के वो सिनेमाघर, जहां फिल्म नहीं, यादें चला करती थीं... आज उनका क्या हुआ ?

Connaught Cinema: आज के डिजिटल युग में लोगों की जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है. पहले लोग परिवार के साथ फिल्म देखने के लिए सिनेमा घर जाते थे. लेकिन अब वही मनोरंजन मोबाइल और टीवी स्क्रीन तक सिमट गया है.

Delhi Single Screen Halls: एक समय ऐसा था जब दिल्ली में शुक्रवार सिर्फ नई फिल्म का नहीं, बल्कि पूरे परिवार के साथ सिनेमा जाने का दिन हुआ करता था. टिकट खिड़की पर लंबी लाइनें लगती थीं, बालकनी की सीट मिल जाए तो लोग खुद को खुशकिस्मत मानते थे. लेकिन आज उन्हीं सिनेमाघरों के बाहर या तो ताले लटके हुए हैं, या फिर उनकी जगह शोरूम, दफ्तर और मल्टीप्लेक्स बन चुके हैं.

जहां कभी 'हाउसफुल' के बोर्ड लगते थे, वहां आज सन्नाटा क्यों है? पढ़िए दिल्ली के पुराने सिनेमा घरों की पूरी कहानी.

आखिर दिल्ली के पुराने सिनेमा घर गायब कैसे हो गए?

आज के डिजिटल युग में लोगों की जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है. पहले लोग परिवार या दोस्तों के साथ फिल्म देखने के लिए सिनेमा घर जाना पसंद करते थे, लेकिन अब वही मनोरंजन मोबाइल और टीवी स्क्रीन तक सिमट गया है. अब लोग घरो के आरामदायक सोफे पर बैठकर Netflix, Amazon Prime, Jio Hotstar जैसे OTT प्लेटफॉर्म पर अपनी पसंद की फिल्में और वेब सीरीज देखना ज्यादा पसंद करते हैं.

बाहर निकलने, टिकट खरीदने और सिनेमा हॉल जाने के झंझट से बचना उन्हें ज्यादा आसान लगता है. यही वजह है कि पुराने सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ती चली गई और उनमें से कई हमेशा के लिए बंद ही हो गए.

पहले समझिए, सिंगल स्क्रीन सिनेमा क्या होते थे?

आज ज्यादातर लोग मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखते हैं, जहां एक ही इमारत में कई स्क्रीन होती हैं. लेकिन पहले ऐसा नहीं था. एक बड़े हॉल में सिर्फ एक स्क्रीन होती थी, जहां एक समय में सिर्फ एक ही फिल्म दिखाई जाती थी. इन्हें सिंगल स्क्रीन सिनेमा कहा जाता था. दिल्ली में ऐसे दर्जनों मशहूर सिनेमा हॉल थे, जिनकी अपनी अलग अलग पहचान थी.

दिल्ली के सबसे मशहूर पुराने सिनेमाघर

1. रेगल सिनेमा (कनॉट प्लेस)

अगर दिल्ली के सिनेमा इतिहास की बात होती है, तो रेगल का नाम सबसे पहले आता है.
1932 में शुरू हुआ यह सिनेमाघर अंग्रेजों के समय बनाया गया था.
यह सिर्फ फिल्म देखने की जगह नहीं थी, बल्कि यहां नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम और कई बड़े फिल्म प्रीमियर भी होते थे.
कई दशकों तक यह कनॉट प्लेस की पहचान बना रहा.
लेकिन लगातार घटते दर्शकों और आर्थिक मुश्किलों के कारण 2017 में इसे बंद कर दिया गया.

2. शीला सिनेमा (पहाड़गंज)

शीला सिनेमा कभी दिल्ली के सबसे लोकप्रिय थिएटरों में गिना जाता था.
नई फिल्म रिलीज होते ही यहां टिकट मिलना मुश्किल हो जाता था.
धीरे-धीरे मल्टीप्लेक्स बढ़े, दर्शक कम हुए और आखिरकार यह भी बंद हो गया.

3. प्लाजा सिनेमा

प्लाजा में कई बड़ी बॉलीवुड फिल्मों के प्रीमियर हुए.
एक समय ऐसा था, जब किसी फिल्म का प्लाजा में लगना उसकी लोकप्रियता की निशानी माना जाता था.

4. रिवोली

रिवोली खासतौर पर अंग्रेजी फिल्मों के लिए मशहूर था.
समय के साथ इसे भी मल्टीप्लेक्स में बदल दिया गया.

5. कनॉट 

कनॉट प्लेस का एक और प्रतिष्ठित सिनेमाघर.
आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है.

6. डिलाईट सिनेमा

आज़ादी के बाद शुरू हुए दिल्ली के सबसे चर्चित सिनेमाघरों में से एक.
यहां फिल्मों के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते थे.

फिर शुरू हुआ मल्टीप्लेक्स का दौर
 

1. मल्टीप्लेक्स का दौर

1990 के दशक के आखिर में मल्टीप्लेक्स आने लगे. एक ही जगह  कई फिल्में बेहत सीटें शानदार साउंड साफ-सुथरा माहौल मिलने लगा. लोगों ने धीरे-धीरे सिंगल स्क्रीन छोड़ दिया.

2. OTT प्लेटफॉर्म

नेटफलिक्स, अमेज़न प्राइम वीडियो और जियो हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म आने के बाद लोगों ने घर पर ही फिल्म देखना शुरू कर दिया.

कोविड महामारी के दौरान यह बदलाव और तेज हो गया.

3. जमीन की बढ़ती कीमत

कनॉट प्लेस जैसी जगहों पर जमीन इतनी महंगी हो गई कि सिनेमाघर चलाने से ज्यादा कमाई उस इमारत को दफ्तर, शोरूम या किसी दूसरे व्यावसायिक इस्तेमाल में बदलने से होने लगी.

4. रखरखाव का खर्च

पुराने सिनेमा हॉल बहुत बड़े होते थे.
उनकी मरम्मत, बिजली, एसी, कर्मचारियों का खर्च और नई तकनीक लगाना आसान नहीं था.
कम दर्शकों के कारण यह खर्च निकालना मुश्किल होता गया.

5. लोगों की पसंद बदल गई

आज लोग सिर्फ फिल्म नहीं, पूरा अनुभव चाहते हैं. डॉल्बी अटमॉस, IMAX, ऑनलाइन टिकट और फूड कोर्ट जैसी सुविधाएं अब आम हो चुकी हैं.

सिर्फ सिनेमाघर नहीं, एक संस्कृति भी खत्म हुई

  • पहले फिल्म देखना सिर्फ मनोरंजन नहीं था. पूरा परिवार तैयार होकर जाता था.
  • दोस्त पहले से टिकट बुक करवाते थे.
  • इंटरवल में समोसे और कोल्ड ड्रिंक लेना भी अनुभव का हिस्सा था.
    कई लोगों की पहली फिल्म या बचपन की सबसे प्यारी यादें इन्हीं सिनेमाघरों से जुड़ी हैं.

यानी जब ये सिनेमाघर बंद हुए, तो सिर्फ एक इमारत बंद नहीं हुई, बल्कि शहर की एक सांस्कृतिक परंपरा भी धीरे-धीरे खत्म होती चली गई.

About the author शईरा नाज़

शईरा नाज़ जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग से 'बीए मास मीडिया' फाइनल ईयर की छात्रा हैं. पत्रकारिता में उभरती हुई साख के साथ वह बिजनेस, पॉलिटिक्स और एंटरटेनमेंट जैसे क्षेत्रों पर गहरी नजर रखती हैं. समसामयिक और राजनीतिक घटनाक्रमों को समझने का उनका जुनून और उनके विश्लेषण की अनूठी शैली उनके लेखन को धार देती है. डिजिटल मीडिया के बदलते दौर में शईरा सटीक और निष्पक्ष पत्रकारिता के जरिए अपनी एक खास पहचान बनाने के लिए प्रयासरत हैं.

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