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DETAILS: अब 2019 का यह सियासी युद्ध राहुल गांधी के लिए क्या मायने रखता है?

यदि 2019 का यह समर राहुल गांधी नहीं जीत पाते हैं तो 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद बीजेपी जिस प्रकार से लगभग हर चुनाव में पीएम मोदी को चुनावी चेहरा बनाती रही है ऐसे में एक बार फिर से मोदी लहर को नकार पाना विपक्ष के लिए मुश्किल होगा.

नई दिल्ली: सियासी गहमागहमी, दांव-पेंच, आरोप-प्रत्यारोप का पारा तेजी से चढ़ता जा रहा है. मतदाता किसे ताज पहनाएंगे यह दिल्ली के राजनीतिक गलियारों की धड़कन बढ़ा रहा है. रोज रंग बदलती राजनीति में पूरा देश दिलचस्पी ले रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की लोकसभा चुनाव में पहली परीक्षा है. जिस वक्त राहुल गांधी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी हुई थी, उस वक्त तक कांग्रेस करीब दो दर्जन हार का सामना कर चुकी थी. अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को मजबूत करने, खुद को बदलने और विपक्ष पर आक्रामक रुख अख्तियार कर राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने की कोशिश की. बहन प्रियंका को पार्टी में मौका देकर और पूर्वांचल की जिम्मेदारी देकर राहुल गांधी ने पीएम मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.

अब 2019 का यह सियासी युद्ध राहुल गांधी के लिए क्या मायने रखता है?

पीएम पद की दावेदारी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद राहुल गांधी ने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन में जोरदार मोलभाव दिखाया. यूपी, दिल्ली, बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस ने सहयोगी दलों के सामने झुकने के बजाए अकेले चलना मुनासिब समझा. बिहार और महाराष्ट्र में भी सम्मानपूर्वक गठबंधन करके यह जता दिया कि कांग्रेस दबाव में नहीं है. कई बार राहुल गांधी ने पब्लिक के बीच पीएम पद पर अपनी दावेदारी भी स्पष्ट कर दी. कांग्रेस की कोशिश है कि वह अधिक से अधिक सीटें लाकर अपने नेतृत्व में सरकार बनाए. यदि कांग्रेस के पास सम्मानजनक सीटें आती हैं तो सहयोगी दलों के बीच राहुल गांधी का कद बढेगा, पीएम पद पर दावेदारी मजबूत होगी. यूपीए के सहयोगी दलों में राहुल के नेतृत्व की स्वीकार्यता बढ़ेगी.

यदि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें घटती हैं तो सहयोगी दल पीएम पद पर अपनी दावेदारी पेश करेंगे. जैसे ममता बनर्जी ने कुछ दिन पहले ही कहा कि अगली सरकार टीएमसी के नेतृत्व में केंद्र में बनेगी. कांग्रेस की सीटों की संख्या सिमटती है तो फिर बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए सहयोगी दलों को अपना समर्थन देकर केंद्र में सरकार बनवाना कांग्रेस की मजबूरी हो जाएगी. कांग्रेस की स्थिति करो या मरो की है.

सांगठनिक क्षमता की परीक्षा राहुल गांधी सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और मिलिंद देवड़ा सहित अन्य कई युवा नेताओं के साथ टीम बनाकर काम कर रहे हैं. पार्टी के कई पुराने चेहरों को सक्रिय भागीदारी से दूर रखा गया है. यदि इस चुनाव में सफलता मिलती है तो बुजुर्गों की विदाई होगी और राहुल गांधी की नई टीम मजबूत होकर पार्टी के भीतर उभरेगी. यदि कांग्रेस अपेक्षाकृत सफलता हासिल नहीं कर पाती है तो पार्टी के भीतर ही नेतृत्व पर एक बार फिर सवाल उठना शुरू हो जाएगा. पार्टी में भगदड़ की स्थिति हो जाएगी. नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठने लगेगी. प्रियंका गांधी के आने से इस मांग को और बल मिलेगा. प्रियंका का कद पार्टी में बढ़ाने की मांग जोर पकड़ने लगेगी.

आक्रामक रुख पर असर राहुल गांधी हर प्लेटफॉर्म का उपयोग मोदी सरकार पर हमले के लिए कर रहे हैं. खासकर सोशल मीडिया पर कांग्रेस तेजी से सक्रिय हुई है. राहुल गांधी लगातार जनता से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं. राहुल लगातार राफेल, किसानों के हक और बेरोजगारी का मुद्दा उठाते रहे हैं. इस बार घोषणापत्र में न्याय के जरिए किसान और युवा दोनों को समाधान बताने की कोशिश की गई है. यदि 2019 का यह समर राहुल गांधी नहीं जीत पाते हैं तो 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद बीजेपी जिस प्रकार से लगभग हर चुनाव में पीएम मोदी को चुनावी चेहरा बनाती रही है ऐसे में एक बार फिर से मोदी लहर को नकार पाना विपक्ष के लिए मुश्किल होगा. चुनावी बिसात पर किसकी चाल किस पर भारी पड़ेगी, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है.

यूपीए पर असर यदि 2019 का समर यूपीए ने संयुक्त अभियान से जीत लिया तो कांग्रेस की सीटों की संख्या बताएंगी कि नेतृत्व किसका हो? लेकिन यदि कांग्रेस की सीटों की संख्या कम आती है. अगर यूपीए भी बीजेपी सरकार को सत्ता से दूर करने में असमर्थ होता है तो इस गठबंधन के बिखरने की संभावना बढ़ जाएगी. लेकिन यदि यूपीए सत्ता में आती है तो इसके साथ अन्य दल भी जुड़ेंगे और यूपीए का आकार बढ़ जाएगा.

भाई -बहन की जोड़ी की परीक्षा

प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने सरप्राइज मूव की तरह इस चुनाव में पेश किया. अब यदि चुनाव में परिणाम पक्ष में आता है तो इस जोड़ी को तुरुप का इक्का माना जाएगा. लेकिन यदि परिणाम पार्टी के उम्मीद के मुताबिक नहीं आने पर पार्टी के भीतर स्वीकार्यता संकट बढ़ेगा.

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