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क्या है देश के सबसे पहले IPS का नाम, जानें उन्हें कितनी मिली थी पहली सैलरी?

क्या आप जानते है देश के पहले आईपीएस अधिकारी कौन थे? अगर नहीं तो आज हम आपको देश के पहले आईपीएस और उनकी सैलरी बताने जा रहे हैं.

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  • सी.वी. नरसिम्हन बने भारतीय पुलिस सेवा के पहले अधिकारी.
  • उन्होंने मद्रास और ऑक्सफोर्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त की.
  • नरसिम्हन सीबीआई निदेशक व संयुक्त राष्ट्र में भी रहे.
  • ईमानदार सेवा के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित हुए.

आज जब देश में IPS अफसरों की बहादुरी और कामकाज की चर्चा होती है, तो बहुत कम लोग जानते हैं कि इस सेवा की शुरुआत किसने की थी. आजादी के बाद बनी भारतीय पुलिस सेवा के पहले अधिकारी माने जाते हैं चक्रवर्ती विजयराघवन नरसिम्हन. वे 1948 बैच से जुड़े और नई व्यवस्था को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई. उस समय उनकी पहली सैलरी करीब 400 रुपये महीना थी, जो आज भले छोटी लगे, लेकिन उस दौर में सम्मानजनक मानी जाती थी.

सी. वी. नरसिम्हन का जन्म 21 मई 1915 को मद्रास, यानी आज के चेन्नई में हुआ. बचपन से ही वे पढ़ाई में तेज थे. उनकी शुरुआती पढ़ाई तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में हुई. इसके बाद उन्होंने मद्रास और फिर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की. उस समय विदेश जाकर पढ़ाई करना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. उनकी शिक्षा ने उनके सोचने का नजरिया व्यापक बना दिया था.

उन्होंने 1937 में इंडियन सिविल सर्विस, यानी ICS ज्वाइन की, जो उस समय की सबसे प्रतिष्ठित सेवा मानी जाती थी. मद्रास प्रेसिडेंसी में उन्होंने कई अहम प्रशासनिक पदों पर काम किया. उनकी ईमानदारी और काम करने के तरीके की चर्चा हर जगह होने लगी. आजादी के बाद जब भारतीय पुलिस सेवा, यानी IPS की शुरुआत हुई, तब 1948 में वे इसके पहले अधिकारी बने. यह अपने आप में एक ऐतिहासिक पल था.

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कितने रुपये मिलते थे?

आज के समय में IPS अधिकारियों की सैलरी लाखों में होती है, लेकिन उस दौर में हालात अलग थे. जब नरसिम्हन ने सेवा शुरू की, तब उनकी पहली सैलरी करीब 400 रुपये प्रतिमाह थी. उस समय के हिसाब से यह रकम ठीक मानी जाती थी, लेकिन जिम्मेदारियों के मुकाबले बहुत कम थी. फिर भी उन्होंने अपनी सेवा को नौकरी नहीं, बल्कि कर्तव्य समझकर निभाया.

कई जिम्मेदारी वाले पद पर रहे काबिज

नरसिम्हन का काम सिर्फ पुलिस विभाग तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने देश के कई बड़े पदों पर जिम्मेदारी निभाई. वे सीबीआई के निदेशक रहे, नेशनल पुलिस कमीशन में सदस्य सचिव की भूमिका निभाई और तमिलनाडु पुलिस में भी कई अहम पदों पर रहे. इतना ही नहीं, वे संयुक्त राष्ट्र में एशिया और सुदूर पूर्व के लिए कार्यकारी सचिव भी बने. इससे साफ है कि उनकी पहचान सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी थी.

उन्हें शिक्षा से खास लगाव था. वे विवेकानंद एजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष रहे और P.S. Charities के चेयरमैन भी बने. इन संस्थाओं के जरिए उन्होंने चेन्नई के आसपास करीब 24 स्कूलों के संचालन में योगदान दिया. हजारों बच्चों की पढ़ाई में उनका बड़ा हाथ रहा.

मिले कई सम्मान

उनकी ईमानदार सेवा के लिए उन्हें कई सम्मान मिले. 1962 में पुलिस मेडल, 1971 में प्रेसिडेंट मेडल और साल 2001 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से उन्हें सम्मानित किया गया. ये सम्मान उनके लंबे और समर्पित जीवन का प्रमाण हैं.

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रजनी उपाध्याय बीते करीब छह वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली रजनी ने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और यही रुचि उन्हें मीडिया की दुनिया तक ले आई.

अपने छह साल के पत्रकारिता सफर में रजनी ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया. उन्होंने न्यूज, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे प्रमुख वर्टिकल्स में अपनी पहचान बनाई. हर विषय में गहराई से उतरना और तथ्यों के साथ-साथ भावनाओं को भी समझना, उनकी पत्रकारिता की खासियत रही है. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज की धड़कन को शब्दों में ढालने की एक कला है.

रजनी का मानना है कि एक अच्छी स्टोरी सिर्फ हेडलाइन नहीं बनाती, बल्कि पाठकों के दिलों को छूती है. वर्तमान में वे एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां वे एजुकेशन और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर्स को कवर कर रही हैं.

दोनों ही क्षेत्र समाज की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रजनी इन्हें बेहद संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालती हैं. खाली समय में रजनी को संगीत सुनना और किताबें पढ़ना पसंद है. ये न केवल उन्हें मानसिक सुकून देते हैं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं.

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