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Black Monday: क्या हुआ था 1987 में जो ट्रंप के टैरिफ की मार के 38 साल बाद फिर से आया याद

80 के दशक में उस समय स्टॉक मार्केट में शेयर की कीमत बढ़ने लगी थी. इसकी वजह से निवेशकों को ये महसूस हुआ था कि कीमतें वास्तविक मूल्य से कहीं ज्यादा है.

Trump Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से टैरिफ के ऐलान ने पूरी दुनिया में आर्थिक तौर पर तहलका मचा कर रख दिया है. ग्लोबल ट्रेड वॉर के चलते अब पूरी दुनिया में आर्थिक संकट के बादल मंडराने लगे हैं. अमेरिका से लेकर चीन, हांगकांग से लेकर ताइवान और भारत तक के शेयर बाजारों में इस वक्त हड़कंप मचा हुआ है. एक्सपर्ट्स की तरफ से आगाह किया गया कि ब्लैक मंडे फिर से आ सकता है. मंडे के दिन भारतीय बाजार में सिर्फ 5 मिनट के अंदर ही 19 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए. जबकि पूरे ग्लोबल मार्केट का भी कुछ यही हाल रहा. यानी, ये कह सकते हैं कि काफी हद तक एक्सपर्ट्स की आशंका सच साबित हुई है.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि ब्लैक मंडे क्या है, क्यों इस वक्त ट्रेंड कर रहा है और कैसे एक ही झटके में करीब 11 हजार बैंक बंद हो गए थे, जिसे डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ की मार ने एक बार फिर से उस त्रासदी को याद दिला दिया है.

क्या हुआ था ब्लैक मंडे वाले दिन?

19 अक्टूबर 1987 में शेयर बाजार के उस भूचाल को ब्लैक मंडे कहा गया जब अमेरिकी शेयर बाजार में सोमवार को सबसे बड़ी तबाही मची थी. इसका असर पूरी दुनिया में दिखा था, जिसे आज भी शेयर बाजार नहीं भूल पाया है.

अमेरिका के डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज में 19 अक्टूबर 1987 को 22.6 फीसदी की गिरावट आयी, जो एक दिन में सबसे ज्यादा गिरावट थी. इससे अमेरिकी बाजार में कोहराम के बाद डाउ जोन्स 508 अंक गिरकर 1738.74 पर बंद हुआ था. इस बड़ी घटना के बाद हांगकांग से लेक ऑस्ट्रेलिया और यूरोप तक वैश्विक बाजारों में रिकॉर्ड बिकवाली हुई थी. निवेशकों में भारी डर पैदा हो गया और उन्होंने अपने स्टॉक बेच दिए. निवेशकों के इस रवैये के चलते बाजार में भारी अस्थिरता बढ़ गई थी. 

आर्थिक कोहराम

1987 को आए ब्लैक मंडे के पीछे एक नहीं कई फैक्टर थे. उस वक्त कम्पयूटर आधारित ट्रेडिंग का चलन बढ़ रहा था. इससे निवेशक पोर्टफोलियो इंश्योरेंस की नीति अपना रहे थे. बाजार गिरने पर ऑटोमेटिक बिकवाली आर्डर दिए जाते थे, जिससे गिरावट तेज हो गई थी.

80 के दशक में उस समय स्टॉक मार्केट में शेयर की कीमत बढ़ने लगी थी. इसकी वजह से निवेशकों को ये महसूस हुआ था कि कीमतें वास्तविक मूल्य से कहीं ज्यादा है. निवेशक मार्जिन पर स्टॉक खरीद रहे थे और जब स्टॉक की कीमतें गिरने लगी तो ब्रोकरेज की तरफ से मार्जिन कॉल की गई. इसके चलते इन्वेस्टर्स को मजबूरी में बिकवाली करनी पड़ी थी.

ये भी पढ़ें: यूं ही नहीं अमेरिका-चीन से लेकर भारत तक धड़ाम हुआ शेयर बाजार, इसके लिए ये 3 बड़े फैक्टर जिम्मेदार

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