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चेतावनी 25000 की SIP को 10 जगह बांटना समझदारी नहीं, बैकफायर कर सकती है ये ट्रिक

SIP Planning: म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय बहुत ज्यादा SIP और फंड जोड़ना हमेशा फायदेमंद नहीं होता. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा फंड रखने से निवेश बिखर सकता है.

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  • कई निवेशक बिना समझे अत्यधिक म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं.
  • ज्यादा फंड पोर्टफोलियो गुणवत्ता घटाते, अपेक्षित रिटर्न सीमित करते.
  • यह पोर्टफोलियो प्रबंधन को मुश्किल बनाता है.
  • अनावश्यक दोहराव बढ़ता, वास्तविक लाभ नहीं होता.

SIP Planning: कई निवेशक एक समझदारी भरे प्लान के साथ म्यूचुअल फंड में निवेश शुरू करते हैं. वह एक SIP शुरू करते हैं, फिर टैक्स बचाने के लिए एक और SIP लेते हैं, फिर स्मॉल-कैप फंड्स के बारे में पढ़कर एक और SIP जोड़ते हैं और टेक्नोलॉजी या मिड-कैप पर फोकस करने वाला एक और फंड ले लेते हैं क्योंकि ऑनलाइन उनके रिटर्न  दिलकश लगते हैं. 

कुछ साल बाद, उन्हें अचानक एहसास होता है कि वे हर महीने आठ, दस या कभी-कभी पंद्रह म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं, बिना यह पूरी तरह समझे कि क्यों और हैरानी की बात यह है कि अक्सर उनमें से कई फंड्स में एक ही तरह के स्टॉक्स होते हैं. यहीं पर ज़रूरत से ज़्यादा डाइवर्सिफ़िकेशन एक बड़ी समस्या बन जाती है.

दरअसल, जो लोग SIP के ज़रिए हर महीने करीब 25,000 हजार रूपयों का निवेश कर रहे हैं, उनके लिए फाइनेंशियल प्लानर्स का कहना है कि मकसद सिर्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा रकम जमा करना नहीं होना चाहिए. मकसद ऐसा पोर्टफोलियो बनाना होना चाहिए जिसमें जोखिम कम करने के लिए पूरा डाइवर्सिफ़िकेशन (विविधता) हो, और साथ ही वह फोकस्ड और संभालने में आसान भी हो. क्योंकि एक हद के बाद, और ज़्यादा स्कीम जोड़ने से रिटर्न में ज़रूरी नहीं कि सुधार हो या रिस्क में कोई खास कमी आए. कभी-कभी इससे बस कन्फ्यूज़न ही पैदा होता है.

बहुत ज़्यादा फंड पोर्टफोलियो की क्वालिटी को करता है कमज़ोर

आमतौर पर बहुत ज़्यादा डाइवर्सिफ़िकेशन (अलग-अलग जगहों पर निवेश) की एक दिलचस्प समस्या यह है कि इससे अच्छा प्रदर्शन करने वाले निवेश का असर कम हो सकता है. अगर कोई निवेशक 25,000 हजार को 10 या 12 फ़ंड में बांटता है, तो हर फ़ंड में निवेश की गई रकम बहुत कम हो जाती है. भले ही कोई एक स्कीम बहुत अच्छा प्रदर्शन करे, लेकिन कुल पोर्टफ़ोलियो में उसका योगदान सीमित रह सकता है क्योंकि पैसा कई जगहों पर बंटा हुआ होता है. साथ ही, परफॉर्मेंस की समीक्षा करना भी बहुत मुश्किल हो जाता है.

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दूसरी बात यह कि कई निवेशक आखिरकार यह देखना छोड़ देते हैं कि क्या अलग-अलग फंड अभी भी उनके लक्ष्यों के मुताबिक हैं, क्योंकि पोर्टफोलियो को ठीक से मैनेज करना बहुत मुश्किल हो जाता है. अजीब बात है कि इससे अक्सर बाद में इमोशनल होकर निवेश करने की स्थिति बन जाती है. लोग एक योजनाबद्ध  तरिके बनाए रखने के बजाय, शॉर्ट-टर्म परफॉर्मेंस के आधार पर SIP शुरू या बंद करने लगते हैं.

डाइवर्सिफ़िकेशन और ओवर-डाइवर्सिफ़िकेशन अलग-अलग 

यह समझना बेहद जरूरी है कि डाइवर्सिफ़िकेशन (विविधीकरण) ज़रूरी है क्योंकि इससे किसी एक सेक्टर, स्टॉक कैटेगरी या इन्वेस्टमेंट स्टाइल पर भरोसे लायक कम होती है. लेकिन ओवर-डाइवर्सिफ़िकेशन तब होता है जब और ज़्यादा इन्वेस्टमेंट करने से रिस्क मैनेजमेंट में कोई खास फ़ायदा नहीं होता और बस ओवरलैप (दोहराव) की स्थिति बन जाती है. मिसाल के तौर पर यह बारिश में कई छाते साथ रखने जैसा है. एक समय के बाद, ज़्यादा छाते असल सुरक्षा नहीं देते. म्यूचुअल फंड में निवेश भी कुछ ऐसा ही है. एक हद के बाद, ज़्यादा स्कीम होने से पोर्टफोलियो अपने-आप सुरक्षित या बेहतर नहीं हो जाता.

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