Xप्लेन: किचन में कभी नहीं रुकेगी गैस! कैसे 63,810 टन LPG प्लान बदलेगा आपकी रसोई?
LPG Production Target: 63,810 टन प्रतिदिन का लक्ष्य रोजाना का औसत उत्पादन नहीं है, बल्कि ये अधिकतम उत्पादन क्षमता है. यानी जब बाजार में गैस की कमी नहीं होगी, तो कंपनियां सामान्य उत्पादन करती रहेंगी.

क्या आपको वो दिन याद हैं जब LPG सिलेंडर बुक करने के बाद कई-कई दिन इंतजार करना पड़ता था. या जब अचानक से गैस की कमी की खबरें आती थीं और घर में खाना बनाना मुश्किल हो जाता था. केंद्र सरकार ने इन्हीं परेशानियों को हमेशा के लिए खत्म करने की ठान ली है. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आदेश के तहत देश की 21 रिफाइनरी और कंपनियों को मिलाकर रोजाना 63,810 टन LPG गैस बनाने का टारगेट दिया गया है. यह प्लान इतना बड़ा है कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश में हुए कुल घरेलू LPG उत्पादन (35,900 टन प्रतिदिन) से दोगुने से भी ज्यादा है. लेकिन यह सब होगा कैसे और आपके किचन तक पहुंचेगा कितना फायदा...
आखिर 63,810 टन का ये आंकड़ा क्यों जरूरी है?
यह समझने के लिए हमें भारत की LPG खपत और आयात पर नजर डालनी होगी. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में कुल 33.2 मिलियन टन LPG की खपत हुई, यानी रोजाना करीब 91,000 टन. इसमें से:
- देश में सिर्फ 13.1 मिलियन टन (35,900 टन प्रतिदिन) का उत्पादन हुआ.
- बाकी 21.3 मिलियन टन (58,400 टन प्रतिदिन) LPG विदेश से मंगवानी पड़ी.
इसका मतलब हुआ कि भारत अपनी LPG जरूरत का 64% से ज्यादा हिस्सा आयात पर निर्भर था. सबसे बड़ी बात है कि इस आयात का 90% स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के समुद्री रास्ते से होता था. यह ईरान और ओमान के बीच से गुजरता है.
होर्मुज संकट: वो घटना जिसने सरकार को जगाया
अब आते हैं असली वजह पर. जब ईरान युद्ध शुरू हुआ और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का रास्ता बाधित हुआ, तो भारत में LPG सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई. सऊदी अरब जैसे देशों से आने वाली गैस की आपूर्ति ठप हो गई. मार्च 2026 में संकट के दौरान सरकार को इमरजेंसी पाबंदियां लगानी पड़ीं:
- पेट्रोकेमिकल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली गैस को LPG बनाने में डायवर्ट किया गया.
- कमर्शियल और इंडस्ट्रियल यूजर्स को बिक्री रोकनी पड़ी.
- घरों में LPG रीफिल बुकिंग का समय बढ़ा दिया गया.
- लोगों को पाइप्ड नैचुरल गैस (PNG) पर शिफ्ट होने के लिए प्रेरित किया गया.
उस वक्त डोमेस्टिक प्रोडक्शन बढ़ाकर 55,000 टन प्रतिदिन तक किया गया था. जून के मध्य में स्थिति सामान्य होने पर ये पाबंदियां हटाई गईं.
तो अब नया फ्रेमवर्क कैसे काम करेगा?
केंद्र सरकार ने होर्मुज संकट से सबक लेते हुए पहली बार इतने बड़े पैमाने पर संस्थागत इंतजाम किए हैं. पहले सिर्फ इमरजेंसी में ही उत्पादन बढ़ाने के आदेश दिए जाते थे, लेकिन अब एक स्थायी ढांचा बना दिया गया है.
नए फ्रेमवर्क की खास बातें:
- सरकार ने पहली बार हर रिफाइनरी और कंपनी के लिए अलग-अलग उत्पादन लक्ष्य तय किए हैं. यानी अब हर कंपनी को पता है कि संकट के समय उसे कितना उत्पादन करना है.
- सरकार ने अपने पास यह अधिकार सुरक्षित रखा है कि जरूरत पड़ने पर रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने और इनपुट स्ट्रीम के दूसरे इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश दे सके.
- यह लक्ष्य हर साल 1 जनवरी और 1 जुलाई को अपडेट किया जाएगा. नई रिफाइनरियां, नए गैस फील्ड और तकनीकी सुधारों के हिसाब से नए लक्ष्य जोड़े जाएंगे.
- कंपनियों को LPG स्टोरेज, निकासी और ट्रांसपोर्टेशन (रेल/सड़क टैंकर) के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित और मेंटेन करना होगा.
- कंपनियों को नेफ्था-टू-LPG कन्वर्जन और फ्लूइड कैटेलिटिक क्रैकिंग यूनिट अपग्रेड जैसे तकनीकी सुधार करने के निर्देश दिए गए हैं.
किसको कितना टारगेट मिला?
सरकार के आदेश के मुताबिक, 21 कंपनियों को यह लक्ष्य दिया गया है:
- रिलायंस इंडस्ट्रीज: रिलायंस की गुजरात स्थित जामनगर की डोमेस्टिक-टैरिफ एरिया (DTA) रिफाइनरी को रोजाना 18,000 टन LPG तैयार करने का लक्ष्य मिला है. यह रिफाइनरी करीब 33 मिलियन टन सालाना की क्रूड प्रोसेसिंग क्षमता वाली है. गौर करने वाली बात है कि रिलायंस की 35.2 मिलियन टन की एक्सपोर्ट-ओनली रिफाइनरी को कोई टारगेट नहीं दिया गया है.
- सरकारी रिफाइनरियां: 18 सरकारी रिफाइनरियों को मिलाकर 31,470 टन प्रतिदिन LPG बनाने का लक्ष्य दिया गया है.
- नयारा एनर्जी: रूस के रोसनेफ्ट समर्थित नयारा एनर्जी की वाडीनार रिफाइनरी (गुजरात) को 4,480 टन प्रतिदिन का लक्ष्य मिला है. इस रिफाइनरी की सालाना क्षमता 20 मिलियन टन है.
- ONGC और GAIL: ONGC और GAIL जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां, जो नैचुरल गैस से LPG बनाती हैं, उन्हें मिलाकर 6,460 टन प्रतिदिन का टारगेट दिया गया है.
ये प्लान आम आदमी के लिए क्यों मायने रखता है?
इस प्लान से आम आदमो को 4 बड़े फायदे होंगे:
- गैस की किल्लत हमेशा के लिए खत्म: जब भी विदेश से आयात बाधित होगा, देश के भीतर ही इतनी गैस बनाई जा सकेगी कि घरों में सप्लाई प्रभावित न हो.
- सिलेंडर बुकिंग में नहीं होगी देरी: पहले की तरह रीफिल बुकिंग का समय नहीं बढ़ाया जाएगा.
- कीमतों पर नियंत्रण: सरकार के पास अब यह अधिकार है कि जरूरत पड़ने पर कंपनियों को उचित दाम पर सप्लाई सुनिश्चित करने के निर्देश दे सके.
- पहले से बेहतर तैयारी: पहले सिर्फ इमरजेंसी में ही उत्पादन बढ़ाने के आदेश आते थे, अब एक स्थायी व्यवस्था बना दी गई है.
क्या ये लक्ष्य रोजाना पूरा होगा?
यह समझना जरूरी है कि 63,810 टन प्रतिदिन का ये लक्ष्य रोजाना का औसत उत्पादन नहीं है, बल्कि ये अधिकतम उत्पादन क्षमता है. यानी जब बाजार में गैस की कमी नहीं होगी, तो कंपनियां सामान्य उत्पादन करती रहेंगी. लेकिन जब भी सप्लाई बाधित होगी या संकट आएगा, तो यह नियम तुरंत लागू हो जाएगा और कंपनियों को अपनी क्षमता के मुताबिक उत्पादन बढ़ाना होगा.
जैसे किसी घर में पानी की एक्स्ट्रा टंकी होती है, जो जरूरत पड़ने पर काम आती है.
तो इस फ्रेमवर्क मॉडल में आगे क्या होगा?
मंत्रालय ने आदेश में कहा है कि यह फ्रेमवर्क समय के साथ और मजबूत होता जाएगा:
- हर साल 1 जनवरी और 1 जुलाई को नए लक्ष्य जोड़े जाएंगे.
- नई रिफाइनरियों और नए गैस फील्ड्स को भी इसमें शामिल किया जाएगा.
- तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर में हुए सुधारों को ध्यान में रखा जाएगा.
केंद्र सरकार की यह पहल भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए एक ऐतिहासिक कदम है. होर्मुज संकट ने सरकार को सबक सिखाया कि 64% आयात पर निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है. अब 21 कंपनियों को मिलाकर 63,810 टन प्रतिदिन की उत्पादन क्षमता के साथ आने वाले समय में कोई भी संकट आपकी रसोई की गैस नहीं छीन सकता.























