खूब कमा रहीं कम पढ़ी लिखी महिलाएं, 10 से 20 करोड़ पहुंचा फीमेल रोजगार- रिपोर्ट
भारत में महिलाओं की रोजगार भागीदारी में तेजी देखने को मिल रही है, जिसमें कम पढ़ी-लिखी महिलाओं का योगदान सबसे ज्यादा रहा. हालांकि, कम वेतन, घरेलू जिम्मेदारियां और असमानता अब भी बड़ी चुनौती हैं.

भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को लेकर पिछले कुछ सालों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. पहले के मुकाबले में अब अधिक महिलाएं कामकाज से जुड़ रही हैं, लेकिन इस बदलाव की तस्वीर उतनी सरल नहीं है.
एक नई रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की रोजगार में बढ़ती हिस्सेदारी का सबसे बड़ा योगदान उच्च शिक्षित महिलाओं के बजाय कम पढ़ी-लिखी महिलाओं का रहा है. वहीं, घर की जिम्मेदारियां, कम वेतन और रोजगार के सीमित विकल्प आज भी महिलाओं के सामने बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं.
कम शिक्षा वाली महिलाओं की भागीदारी में ज्यादा बढ़ोतरी
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की रिपोर्ट 'द पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स: वुमेन्स वर्क एंड टाइम-यूज इन इंडिया, 2017-18 टू 2025' के मुताबिक, 2025 में प्राथमिक शिक्षा से कम पढ़ी महिलाओं का वर्कर पॉपुलेशन रेशियो 45.3 प्रतिशत रहा. वहीं, हायर सेकेंडरी तक पढ़ाई करने वाली महिलाओं में यह आंकड़ा केवल 19.8 प्रतिशत था.
2017-18 से 2025 के बीच प्राथमिक शिक्षा से कम पढ़ी महिलाओं की रोजगार भागीदारी में 19.9 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई. इसके मुकाबले ग्रेजुएट महिलाओं में यह बढ़ोतरी 7.2 प्रतिशत अंक और पोस्ट ग्रेजुएट महिलाओं में सिर्फ 5.5 प्रतिशत अंक रही.
घर की जिम्मेदारियां बन रहीं रोजगार में बाधा
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में नौकरी या कामकाज से बाहर रहने वाली करीब 60 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल को इसकी मुख्य वजह बताया. पुरुषों में यह आंकड़ा लगभग एक प्रतिशत था. शादी के बाद भी महिलाओं और पुरुषों की रोजगार भागीदारी में बड़ा अंतर दिखाई दिया. 2025 में 37.3 प्रतिशत विवाहित महिलाएं काम कर रही थीं, जबकि विवाहित पुरुषों का आंकड़ा 87.6 प्रतिशत था.
कृषि क्षेत्र में बढ़ा महिलाओं का रोजगार
भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या 2017-18 के 10.4 करोड़ से बढ़कर 2025 में 20.1 करोड़ हो गई. इस बढ़ोतरी में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अहम रही. कृषि और पशुपालन से जुड़ी महिलाओं की संख्या 5.4 करोड़ से बढ़कर 10 करोड़ से ज्यादा पहुंच गई. हालांकि, इनमें बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जो पारिवारिक काम में बिना वेतन के योगदान देती हैं.
पुरुषों की तुलना में महिलाओं की कमाई काफी पीछे
रोजगार बढ़ने के बावजूद वेतन में असमानता बनी हुई है. 2025 में ग्रामीण महिलाओं की औसत मासिक कमाई 6,596 रुपये थी, जबकि पुरुषों की कमाई 14,632 रुपये रही. यानी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में काफी कम आय मिल रही है.
घरेलू काम का बोझ भी महिलाओं पर ज्यादा
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में महिलाएं रोजाना औसतन 320 मिनट घरेलू कामों में और 144 मिनट परिवार के सदस्यों की देखभाल में बिताती थीं. पुरुषों के लिए ये आंकड़े 97 और 81 मिनट थे.
रिपोर्ट का अनुमान है कि 2047 तक महिला कार्यबल में भागीदारी बढ़ाकर करीब 40 करोड़ करने से भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 14 ट्रिलियन डॉलर का योगदान मिल सकता है.
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