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मोदी सरकार के कार्यकाल के सबसे निचले स्तर पर पहुंची आर्थिक विकास दर

बीते कारोबारी साल यानी 2016-17 के दौरान विकास दर 7.1 फीसदी रही थी. अब इसमें कमी की मुख्य रुप से दो वजह है, एक खेती बाड़ी और दूसरा मैन्युफैक्चरिंग. दोनों की ही विकास दर बीते साल के मुकाबले कम रहने के आसार हैं.

नई दिल्लीः ऐन बजट के पहले मोदी सरकार के लिए बुरी खबर आयी है. 31 मार्च को खत्म होने वाले चालू कारोबारी साल 2017-18 के दौरान विकास दर 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है. यह चार सालों का सबसे निचला स्तर है, यानी मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान सबसे कम विकास दर.

बीते कारोबारी साल यानी 2016-17 के दौरान विकास दर 7.1 फीसदी रही थी. अब इसमें कमी की मुख्य रुप से दो वजह है, एक खेती बाड़ी और दूसरा मैन्युफैक्चरिंग. दोनों की ही विकास दर बीते साल के मुकाबले कम रहने के आसार हैं. हालांकि सांख्यिकी सचिव टी सी ए अनंत की मानें तो विकास में कमी का बुरा दौर खत्म होता दिख रहा है. कुछ यही वजह रही है कि पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान रिकॉर्ड गिरावट के बाद दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में हालात सुधरे और अब चालू कारोबारी साल के बाकी बची दो तिमाहियों (अक्टूबर-दिसंबर और जनवरी-मार्च) में आर्थिक विकास दर सात फीसदी रहने का अनुमान है.

खेती बाड़ी अनंत का ये भी कहना है कि खेती बारी की विकास दर भले ही कम हुई है, लेकिन अनंत मानते हैं कि कुल पैदावार में सुधार दिख रहा है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 के दौरान 252.02 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था जो अगले साल बढ़कर 251.57 मिलियन टन और फिर 2016-17 में 275.68 मिलियन टन पर पहुंचा. अब 2017-18 में उत्पादन 280 मिलियन टन के पार पहुंचने का अनुमान है.

दूसरी ओर जानकारों की राय कुछ अलग है. उनका कहना है कि खरीफ (मुख्य रुप से धान यानी चावल) फसलों की पैदावर कम रही, वही रबी की बुवाई बीते साल से कम रही. यही नहीं मानसून की बाद की कमजोर बारिश और जलाशयों में घटते जल स्तर की वजह से फसलों पर कुछ असर पड़ा. लिहाजा पूरे साल के आंकड़ों में बहुत तेजी की गुंजायश नहीं दिखती. कुल मिलाकर कारोबारी साल 2017-18 के दौरान खेती बारी की विकास दर 2.1 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि 2016-17 में ये दर 4.9 फीसदी थी.

मैन्युफैक्चरिंग दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग की जहां तक बात करें तो वहां पर गिरावट ज्यादा ही तेज दिख रही है. 2016-17 के 7.9 के मुकाबले इस कारोबारी साल में मैन्युफैक्चरिंग की विकास दर 4.6 फीसदी रहने का अनुमान है. वैसे ध्यान देने की बात ये है कि कारोबारी साल के पहले छह महीने (अप्रैल-सितंबर) के दौरान मैन्युफैक्चरिंग में ज्यादा गिरावट हुई जबकि दूसरी छमाही (अक्टूबर-मार्च) के दौरान स्थिति बेहतर होती दिख रही है. पहली छमाही में वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी का असर देखने को मिला, लेकिन जैसे-जैसे नयी कर व्यवस्था स्थिर होगी, उसका स्वरूप जीएसट पर देखने को मिलेगा. कुछ यही वजह है कि दिसंबर के महीने में परचेजिंग मैनेजर इंडेक्स यानी पीएमआई में खासी तेजी दर्ज की गयी है.

मैन्युफैक्चरिंग की स्थिति रोजगार के मौकों में कमी की बात की ओर भी इशारा कर रही है. ये बात आम है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अगर एक व्यक्ति को सीधे-सीधे रोजगार मिलता है तो कम से कम चार व्यक्ति को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है. चूंकि पहले छह महीने में औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार सुस्त रही तो उसका असर रोजगार के नए मौकों के तैयार होने में भी दिखा, लेकिन अब इस स्थिति में कुछ सुधार होता दिख रहा है.

सर्विसेज फिलहाल, सेवा क्षेत्र में स्थिति बेहतर होती दिख रही है. बीते कारोबारी साल के दौरान सेवा क्षेत्र की विकास दर 7.7 फीसदी थी जबकि इस कारोबारी साल में ये 8.3 फीसदी रहने का अनुमान है. सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा क्षेत्र है और इसकी हिस्सेदारी 57 फीसदी से भी ज्यादा है.

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