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संकट में घिरे अनिल अंबानी को राहत, सुप्रीम कोर्ट से मिली इस बात की मंजूरी; अब होगी बकाए 28483 करोड़ की वसूली

Anil Ambani: रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की दो सहायक कंपनियों BSES यमुना पावर लिमिटेड और BSES राजधानी पावर लिमिटेड को सुप्रीम कोर्ट ने 28,483 करोड़ रुपये का बिजली बकाया वसूलने की मंजूरी दी है.

Anil Ambani: लोन फ्रॉड मामले का सामना कर रहे कारोबारी अनिल अंबानी को बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की दो सहायक कंपनियों BSES यमुना पावर लिमिटेड और BSES राजधानी पावर लिमिटेड को 28,483 करोड़ रुपये का बिजली बकाया वसूलने की इजाजत दे दी है. 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद होगी बकाए की वसूली

शुक्रवार को एक रेगुलेटरी फाइलिंग में रिलायंस इंफ्रा ने कहा कि बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड और बीएसईएस राजधानी पावर पर 31 जुलाई, 2025 तक कुल 28,483 करोड़ रुपये बकाया है.

रेगुलेटरी एसेट्स की वसूली को लेकर जारी दिशा-निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद रिलायंस इंफ्रा की सब्सिडियरी कंपनियां 1 अप्रैल, 2024 से पूर्वव्यापी प्रभाव से शुरू होने वाले 4 वर्षों की अवधि में 28,483 करोड़ रुपये की नियामक परिसंपत्तियों की वसूली करेंगी.

बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड और बीएसईएस राजधानी पावर में रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर की 51 परसेंट हिस्सेदारी है, जबकि शेष 49 परसेंट हिस्सेदारी दिल्ली सरकार के पास है. ये दोनों बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लगभग 53 लाख घरों में बिजली की सप्लाई करती है. 

बढ़ता जा रहा रेगुलेटरी एसेट्स

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 27,200.37 करोड़ रुपये की वहन लागत सहित नियामक परिसंपत्तियों का भुगतान तीन वर्षों के भीतर दिल्ली की तीन निजी डिस्कॉम को किया जाए. रेगुलेटरी एसेट्स बिजली वितरण कंपनियों द्वारा वहन की जाने वाली लागतें हैं, जिन्हें आगे आने वाले समय में राज्य नियामक के द्वारा टैरिफ के रूप में उपभोक्ताओं से वसूलने योग्य माना जाता है.

दिल्ली में रेगुलेटरी एसेट्स बीते कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है. 31 मार्च, 2024 तक बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड के लिए रेगुलेटरी एसेट्स 12,993.53 करोड़ रुपये, बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के लिए 8,419.14 करोड़ रुपये और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड के लिए 5,787.70 करोड़ रुपये तक पहुंच गईं, कुल मिलाकर 27,200.37 करोड़ रुपये. 

कंपनी ने दायर की थी रिट याचिका

रिलायंस इंफ्रा ने कहा कि उसकी बिजली वितरण कंपनियों ने 2014 में सुप्रीम  में एक रिट याचिका और दीवानी अपील दायर की थी, जिसमें गैर-लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ, नियामक परिसंपत्तियों का अवैध निर्माण और नियामक परिसंपत्तियों का परिसमापन न करने का मुद्दा उठाया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने ने इन याचिकाओं पर विस्तार से सुनवाई की और राज्य सरकारों तथा राज्य विद्युत नियामक आयोगों सहित सभी पक्षों को सुनने के बादआदेश दिया कि विद्युत नियामक आयोग (ERC) मौजूदा नियामक परिसंपत्तियों के परिसमापन के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत करें, जिसमें वहन लागत से निपटने के प्रावधान शामिल होंगे. 

आदेश में कहा गया है कि ईआरसी को उन परिस्थितियों का भी सख्त और गहन ऑडिट करना होगा जिनमें वितरण कंपनियां नियामक परिसंपत्तियों की वसूली के बिना काम करती रही हैं. 

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