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Anna Hazare Birthday: अन्ना हजारे के बगैर केजरीवाल, कैसे बनते दिल्ली के सुल्तान?

Anna Hazare Birthday: वो दिल्ली जो न जाने कितनी बार उजड़ी और कितनी बार बसी, उसी दिल्ली दरबार की गद्दी पर बैठे सुल्तान के उस्ताद का आज जन्मदिन है. महाभारत युद्ध के वक़्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक ये सूत्र भी समझाया था कि तू ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जिससे तेरे गुरु का अपमान हो. हांजी, आज भी इसके बहुत गहरे मतलब हैं लेकिन सियासत में इसे समझना-समझाना बेहद मुश्किल है.

आज अन्ना हजारे का जन्मदिन है. भ्रष्टाचार को इतना बड़ा मुद्दा बनाकर मनमोहन सिंह सरकार की विदाई का रास्ता तय करने वाले और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को सत्ता का स्वाद चखवाने का रास्ता दिखाने वाले मशहूर समाजसेवी किसन बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे आज 84 बरस के हो गए.

समाज-सेवा करते हुए वे शतक लगाएं, यह तो हर कोई चाहेगा. लेकिन उनके चेहरे के दम पर सत्ता में आने वाले लोग महज 10 बरस में ही उन्हें इस तरह से अनजान बना देंगे, ये शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा. अमूमन हर दिन मीडिया की सुर्खी में रहने वाले 'छोटे गांधी' को अगर आम लोगों से इस तरह से काट दिया जाए, तो उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाये? उस सियासत को जिससे वे आज भी नफरत करते हैं या उन्हें जो उनके कांधों पर सवार होकर आज सत्ता-सुख भोग रहे हैं?

महाराष्ट्र के एक गरीब मराठा परिवार में जन्में इस शख्स को भले ही भारत सरकार ने पदमविभूषण जैसे सम्मान से नवाजा हो लेकिन सत्ता की राजनीति में आने के हर आफर को इस समाजसेवी ने हमेशा ऐसे ठुकराया, जैसे हम लोग कीचड़ की बदबू झेलने से कोसों दूर हो जाते हैं. लेकिन हां, उन्होंने अपनी जिंदगी में हुई  एक गलती को माना भी और खुले दिल से यह ऐलान भी किया कि "मुझे नहीं मालूम था कि मेरे आंदोलन के जरिये कुछ लोग राजनीतिक महत्वाकांक्षा हासिल करना चाहते हैं."

दिल्ली की राजनीति को गहराई से समझने वाले पुराने जानकार ये मानते हैं कि अगर अन्ना हजारे दिल्ली के रामलीला मैदान में आकर आंदोलन-अनशन न करते, तो न आम आदमी पार्टी का जन्म होता और न ही केजरीवाल दिल्लीवासियों का पसंदीदा चेहरा बन पाते. काफी हद तक इस बात को गलत नहीं ठहरा सकते. अन्ना सार्वजनिक रुप से अपना दर्द निकाल चुके हैं कि वे भी नहीं जानते थे कि उनके सहारे कोई सत्ता में आएगा.

लोगों को शायद याद न हो लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन करने के लिए राजी करने के वास्ते केजरीवाल ने ही 2011 में रालेगण सिद्धि जाकर उन्हें मनाया था. बताते हैं कि तब अन्ना ने उनसे पूछा था कि इसमें और कितने ईमानदार चेहरे जुड़ेंगे. तब उन्हें सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण के अलावा पूर्व आपीएस ऑफिसर किरण बेदी और पूर्व आर्मी चीफ वीके सिंह जैसी शख्शियतों के नाम बताए गए, जिसके बाद अन्ना हजारे इस आंदोलन से जुड़ने के लिए तैयार हो गए.

अन्ना हजारे के दिल्ली में 2011 में जंतर-मंतर से शुरु हुए आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकारों को याद होगा कि उसकी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई थी और तब राष्ट्रीय मीडिया में न अन्ना को और न ही केजरीवाल को बहुत ज्यादा तवज्जो मिली थी. लिहाज़ा, उसके बाद हुई ऐसी पत्रकार-वार्ताओं में किरण बेदी के चेहरे को न सिर्फ आगे रखा गया, बल्कि वे ही उस आंदोलन से जुड़े हर मुश्किल सवाल का जवाब दिया करती थीं. बताने की जरुरत नहीं कि उस आंदोलन के बाद किरण बेदी और वीके सिंह को क्या सियासी फायदा मिला. लेकिन बड़ी बात ये है कि तब भी अन्ना को संसद में बैठने की कोई भूख नहीं लगी. लेकिन जब लोगों को पता लगा कि अन्ना हजारे ने अब तक महाराष्ट्र की सरकारों  की नाक में दम ही किया है, तो 2013 में दिल्ली की जनता का रामलीला मैदान में ऐसा रेला आना शुरु हुआ, जो अभूतपूर्व था.

दरअसल, अन्ना हज़ारे देश की सेना में अपना कर्तव्य निभाने के बाद 80 के दशक में महाराष्ट्र में एक ऐसा चेहरा बनकर उभरे जिन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक मशाल जलाने का बेहद जोखिम भरा रिस्क लिया. क्योंकि तब सरकार के ख़िलाफ़ बोलने की जुर्रत करना, मानो अपनी जिंदगी आफत में लाना. कांग्रेस से लेकर शिवसेना-बीजेपी की सरकारों से टकराते रहे लेकिन न झुके, न बिके.

सेना की सेवा ख़त्म करने के बाद जब वे अपने गांव रालेगण सिद्धि पहुंचे, तो उन्हें पता लगा कि यहां तो पूरे इलाके में ही भट्टी पर कच्ची शराब बनाने का अवैध कारोबार हो रहा है.बस, वहीं से अन्ना ने इसके खिलाफ ऐसा अभियान छेड़ा कि देसी शराब का कारोबार बंद और सरकार की तरफ से उन्हें चुप रहने की कीमत लेने के प्रस्ताव शुरु. नहीं माना अन्ना ने और क्यों मानते.

आप सोचिए कि जब सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण और इनकम टैक्स की नौकरी करते हुए केजरीवाल ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि अन्ना इतना बड़ा चेहरा बन सकता हैं. क्योंकि अप्रैल 2006 में उनके गांव रालेगण सिद्धि में मेरे समेत कुछ पत्रकारों की उनसे आत्मीय मुलाकात हुई थी. तब अन्ना से मैंने सिर्फ एक सवाल किया था, "क्या आप राज्यसभा जाने चाहते हैं और ये सारा देसी शराब विरोधी आंदोलन उसी लिए है?" तब उनका एक ही जवाब था, "मुझे कोई खरीद के दिखाए, ऐसी मूरत मेरे उस ईश्वर ने तो अभी तक बनाई नहीं. जब बना देगा, तो मैं आपको जरूर बताऊंगा."

लेकिन सोचने व देखने की बात ये है कि आन्दोलन के जरिये एक बड़े चेहरे की मार्फत दिल्ली पर राज करने वाला ये अर्जुन आज अपने अन्ना को कैसे याद करता है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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