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...तो गिर के 'शेर' के सामने अब बंगाल की 'शेरनी'!

दीदी ओ दीदी.....! ये कहकर पीएम मोदी ने ममता को पुकारा तो बंगाल में वो फिर से आ गई. इसी के साथ मोदी की इस पुकार के बाद ममता अब राष्ट्रीय फलक पर भी छा गईं. चुनाव तो बंगाल का था. नतीजे ऐतिहासिक होने थे, चाहे कोई भी जीतता. कोरोना के कहर के दौरान भी बंगाल का महासमर अपने पूरे परवान पर रहा. बीजेपी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व और गृह मंत्री अमित शाह के कुशल प्रबंधन से ममता के लिए एक बार लगा कि भगवा चक्रव्यूह को तोड़ पाना मुश्किल होगा. मगर ममता तो रणचंडी की तरह ऐसा बीजेपी की सेना पर टूटी कि बंगाल में जीत की हैट्रिक बनाकर इतिहास रच दिया.

जीत के तुरंत बाद ममता की हुंकार सुनेंगे तो आप समझ जाएंगे कि अब ये शेरनी पूरे देश में गरजकर दिल्ली कूच करने को तैयार है. ममता ने जीत के बाद पहला बयान दिया, 'बंगाल की जनता ने देश को बचा लिया.' मतलब साफ है कि बंगाल के जनादेश को राष्ट्रीय स्तर पर जुटाने के लिए अब ममता दिल्ली कूच को तैयार हैं. सात साल से हाशिये पर पड़े विपक्ष के सामने भी अब ममता के रूप में एक रोशनी की किरण दिखाई दे रही है. इसकी सुगबुगाहट भी दिखने लगी है. खुद को राष्ट्रीय दल मानने वाले और मुख्य विपक्ष समझने वाली कांग्रेस को पांच राज्यों के चुनावों में हुई दुर्गति के बाद ममता का प्रभाव स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आता.

पीएम मोदी अगर निर्विवाद रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सबसे लोकप्रिय नेता हैं तो ये भी उतना बड़ा सच है कि विपक्ष के पास अब ममता से बड़ा कोई चेहरा नहीं दिखता. ममता जैसे पहले कांग्रेस में थीं, वैसे ही राजनीति के एक अन्य दिग्गज मराठा छत्रप एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार भी कांग्रेस में थे. सात साल से मोदी के सामने निस्तेज पड़े विपक्ष को अब बंगाल की शेरनी में ही वो तेज दिख रहा है जो गुजरात के गिर से 2014 में निकले शेर यानी मोदी के सामने राष्ट्रीय फलक पर गर्जना कर चुनौती दे सके. इसके लिए जरूरी है कि विपक्ष पहले एकजुट होकर किसी को नेता स्वीकार करे.

क्योंकि भले ही बीजेपी पश्चिम बंगाल में सत्ता की लड़ाई में पिछड़ गई. भले ही 2019 लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को न दोहरा सकी हो. इसके बावजूद वह पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले तीन से 75 सीटों तक पहुंची. दो ध्रुवीय चुनाव में ममता की जीत में लेफ्ट और कांग्रेस गठबंधन का फुस्स हो जाना भी बड़ा फैक्टर रहा है. मतलब मुकाबला बहुदलीय हो तो बीजेपी को हराना नामुमकिन है. अगर बंगाल में ऐसे हालात हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर ये और मुश्किल होगा. वैसे भी बीजेपी की हार पर विपक्ष इतरा भले ले, खुशी मना ले, लेकिन उसका प्रदर्शन जमीन पर इतना खराब नहीं है.

पश्चिम बंगाल में भी उसने कुछ पाया ही है. असम में जहां उसकी सरकार थी, वहां उसने अपनी बादशाहत कायम रखी है. इसी तरह दक्षिण भारत में कर्नाटक के बाद छोटा ही सही पुडुचेरी जैसे दूसरे राज्य में भी वह सरकार बनाने जा रही है. ऐसे में विपक्ष भी समझ रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर यानी लोकसभा चुनाव होने पर मोदी अलग ही रूप में सामने होंगे. कोरोना के बाद केंद्र सरकार की छवि पर खरोंचे तो आई हैं, लेकिन राज्य सरकारें भी इससे अछूती नहीं. बंगाल के नतीजों को अगर ध्यान से देखें तो जैसे-जैसे पूरे देश में कोरोना का कहर बढ़ा, वैसे-वैसे उन चुनावी चरणों में बीजेपी का नुकसान ज्यादा हुआ.

इसीलिए ममता ने भी तुरंत कोरोना के टीके पूरे देश में मुफ्त लगाए जाने की विपक्ष की मुहिम को चुनाव जीतने के साथ ही धार दे दी है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पीएम को फ्री कोरोना टीका लगाने के लिए विपक्ष के अन्य नेताओं का समर्थन लेकर चिट्ठी लिख ही चुकी हैं. विपक्ष इसी मुद्दे पर हर प्रदेश से एकजुट हो रहा है. ये सच्चाई भी है कि कोरोना के बाद केंद्र सरकार के कामकाज पर सात सालों में पहली बार इतने सवाल उठे हैं. ऐसे में ममता इस मुद्दे को लेकर भी आगे बढ़ गई हैं और विपक्ष के परचम को थामने के लिए तैयार हैं. इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर जो भी नाम मोदी के सामने उठे, चाहे वह नीतीश कुमार हों या फिर अरविंद केजरीवाल... कोई भी टिक न सका. ममता ने जिस तरह और ताकत के साथ अपना लोहा मनवाया है, उसने विपक्षी आशाओं को पंख जरूर लगा दिए हैं.

वैसे ममता की राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में जाने के कयास सिर्फ नतीजों से नहीं लगाए जा रहे. उनकी दिल्ली की महत्वाकांक्षा 2019 लोकसभा चुनाव से पहले भी हिलोरें मार चुकी है. उस समय उन्होंने कोलकाता में बीजेपी या मोदी विरोधी सियासत का नाभिक बनने के प्रयास में विपक्ष की सर्वदलीय रैली की थी. जनवरी 2019 में हुई इस रैली से कांग्रेस ने बड़ी ही चतुराई से दूरी बनाकर ये स्पष्ट कर दिया था कि वो राष्ट्रीय स्तर पर किसी स्थानीय क्षत्रप को मोदी के सामने जमीन नहीं देगी. उसकी चिंता थी कि अगर ममता या कोई और नेता विपक्ष का चेहरा बना तो उसकी थाती जाती रहेगी.

हालांकि, अब 2019 के बाद से पानी और बह चुका है. कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जाने को तैयार है. राहुल गांधी पहले अपने खानदानी संसदीय क्षेत्र अमेठी से हारे. बहन प्रियंका खूब यूपी घूमीं, लेकिन कुछ कर न सकीं. केरल के वायनाड से सांसद हुए राहुल गांधी उस राज्य में भी फेल हो गए. जाहिर है कि अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल और शरद पवार या उद्धव ठाकरे जैसे दिग्गज यदि ममता के साथ खड़े होते हैं तो कांग्रेस के लिए इस मुहिम से अब अलग कर पाना संभव नहीं होगा क्योंकि सवाल अब उसके लिए अस्तित्व बचाने का है. ऐसे में मोदी के सामने विपक्ष का शून्य भरने के लिए सिर्फ तृणमूल सुप्रीमो ममता ही दिख रही हैं.

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