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मायावती और ओवैसी फैक्टर ने बदली अखिलेश की चुनावी स्क्रिप्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी जिस बदले हुए तेवर-कलेवर को अपनाकर चलती हुई दिख रही है, वह किसी वैचारिक आत्ममंथन का परिणाम कम और बदलते चुनावी गणित की उपज ज्यादा है. दरअसल प्रदेश में मायावती और ओवैसी फैक्टर की मजबूती ने स्पष्ट रूप से समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले को सीधी चुनौती है. यही कारण है कि समाजवादी पार्टी ने लंबे समय तक जिस M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण को सत्ता की चाबी माना, वह अब पहले जैसी भरोसेमंद पूंजी नहीं रह गई है.

अखिलेश यादव को कहीं न कहीं इस बात का भान है और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और बिहार जैसे पड़ोसी राज्य के चुनावी नतीजे ने इसे और पुष्ट किया है. ऐसे में, आज सपा की नई रणनीति का केंद्र इस विमर्श पर टिका है कि जब परंपरागत वोट बैंक बिखरने लगे, तो आखिर चुनाव कैसे जीता जाए? जाहिर है, बिना सवर्णों के सहयोग से ऐसा हो पाना असंभव है.

बिहार से मिला पहला बड़ा संकेत

इस बदलाव की पहली स्पष्ट झलक बिहार विधानसभा चुनाव में दिखी. अखिलेश यादव ने वहां विपक्षी गठबंधन के लिए आक्रामक प्रचार किया और 25 से अधिक सीटों पर रैलियां कीं. रणनीति यह थी कि एकजुट अल्पसंख्यक वोट सत्ता विरोधी लहर पैदा करेगा. लेकिन, नतीजा इसके उलट निकला. मुस्लिम वोटों के बड़े पैमाने पर एकजुट होने के बावजूद एनडीए ने प्रचंड जीत दर्ज की. यह परिणाम अखिलेश के लिए चेतावनी था कि केवल अल्पसंख्यक गोलबंदी भी अब सत्ता की गारंटी नहीं रही.

ओवैसी फैक्टर ने गरमाई मुस्लिम वोटों की नई राजनीति

बिहार के बाद महाराष्ट्र और अन्य राज्यों AIMIM के प्रदर्शन ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है. इन राज्यों में ओवैसी फैक्टर के प्रभाव ने यह साबित कर दिया कि मुस्लिम मतदाता अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति तलाश रहा है. उत्तर प्रदेश में भी AIMIM की मौजूदगी और उसका बढ़ता जमीनी प्रभाव सपा के लिए खतरे की घंटी है. अखिलेश जानते हैं कि अगर AIMIM यूपी में मजबूती से उतरी, तो मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा सपा से खिसकना तय है. मुस्लिम वोटों का छिटकना सपा के लिए निर्णायक हार तय कर सकता है.

मायावती की वापसी और PDA का संकट

अखिलेश की दूसरी बड़ी चुनौती मायावती की सक्रियता है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का नारा देकर सपा ने खासतौर पर 'संविधान बदलने' के नैरेटिव के सहारे दलित वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की थी. लेकिन वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हालात बदलते दिख रहे हैं. बसपा फिर से संगठन को खड़ा कर रही है और मायावती खुलकर चुनावी मैदान में उतरने के संकेत दे रही हैं. यदि बसपा दलित वोटों को फिर से अपने पाले में करने में सफल रही तो PDA का गणित स्वतः ही कमजोर पड़ जाएगा.

ओवर डिपेंडेंस अब लगने लगा है जोखिम

सपा के रुख में बदलाव का संकेत पार्टी के भीतर के घटनाक्रमों से भी मिलता है. जैसे रामपुर में उम्मीदवार चयन से लेकर आजम खान का निर्णय न मानना. इसे केवल व्यक्तिगत मतभेद कहकर नहीं टाला जा सकता. यह दरअसल उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह किसी एक चेहरे या एक समुदाय पर निर्भर नहीं है. अल्पसंख्यक राजनीति का 'ओवर-डिपेंडेंस' अब सपा को जोखिम भरा लगने लगा है.

सवर्णों की ओर बढ़ता सपा का कदम

नई चुनावी पिच पर सपा इन दिनों खुलकर खेल रही है. ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण मतदाताओं को लुभाने के प्रयास, धार्मिक स्थलों का प्रचार, सांस्कृतिक प्रतीकों पर नरम रुख इसी रणनीति का हिस्सा हैं. संदेश साफ है: सपा का भरोसा अब पिछड़ा-अल्पसंख्यक वोटों पर पहले जैसा नहीं रहा. यह बदलाव वैचारिक क्रांति नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विवशता से उपजा है जो मानती है कि M-Y समीकरण अब ‘जीत की गारंटी’ नहीं.

एक वोट बैंक पर निर्भरता का अंत 

पिछले कई विधानसभा चुनावों का ट्रैक रिकॉर्ड यही बताता है कि यूपी जैसे राज्य में किसी एक सामाजिक समूह के सहारे सत्ता पाना अब लगभग असंभव हो चुका है. भाजपा ने व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाकर यह मॉडल पहले ही स्थापित कर दिया है. अखिलेश अब उसी वास्तविकता को स्वीकारते दिख रहे हैं. उन्हें अंदेशा है कि यदि बसपा दलित वोट काटे और AIMIM मुस्लिम वोटों में सेंध लगाए, तो सपा का पारंपरिक आधार बुरी तरह कमजोर हो सकता है.

2027 की तैयारी और बदला हुआ गणित

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. ऐसे में अखिलेश यादव के पास विकल्प सीमित हैं. या तो वे पुराने समीकरणों पर भरोसा करते रहें या फिर जोखिम उठाएं और नए सामाजिक समूहों को साधने की कोशिश करें.

M-Y समीकरण पर कम हुए भरोसे के बीच सवर्णों की ओर बढ़ता झुकाव इसी दूसरे विकल्प का संकेत है. यह रणनीति सफल होगी या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन इतना तय है कि मायावती और ओवैसी के उभार ने अखिलेश को अपनी राजनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. इस संकेत को समझना अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए भी अहम है. क्योंकि यह एक ऐसा वोटर समूह रहा है जिसने एकजुट होकर हमेशा सपा को वोट दिया.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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