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पुरुषों को लेकर चश्मा बदलने की जरूरत, घरेलू हिंसा के वो भी हो सकते हैं पीड़ित

आईटी प्रोफेशनल मानव शर्मा की आत्महत्या ने एक बार फिर पुरुषों को लेकर कानून और संवेदनशीलता की  चर्चा छेड़ दी है. मानव शर्मा ने आत्महत्या करते समय एक वीडियो बनाया जिसमें उसने अपनी पत्नी को दोषी बताया. फिर कुछ समय बाद मानव की पत्नी निकिता का भी एक वीडियो सामने आया जिसमें उसने अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बताया और मानव को अत्यधिक शराब पीने और उसके बाद उसके साथ मार-पीट की बात कही. निकिता ने यह जरूर स्वीकारा कि विवाह से पहले उसका प्रेम- संबंध था जो खत्म हो चुका था. बावजूद इसके मानव को ऐसा नहीं लगता था. निकिता पर आगरा में केस दर्ज हो चुका है मगर गिरफ़्तारी अब तक नहीं हुई है.

मामले की हो सख्ती से जांच

मानव की बहन आकांक्षा ने चौकाने वाले खुलासे किए कि मानव को मुंबई में रहने के दौरान इसी जनवरी में किसी प्रिया नाम की लड़की का कॉल आया था जिसने बताया कि उसकी पत्नी निकिता और  उसकी बहनें शादीशुदा मर्दों को फंसाने का धंधा करती हैं जिसके बाद उसका भाई तनाव में आ गया था. निकिता ने विवाह के पूर्व प्रेम संबंध को जरूर स्वीकारा मगर बात इतनी बढ़ गयी कि तलाक लेने तक पहुंची. मुंबई से आगरा आने के बाद मानव ने पत्नी को उसके मायके छोड़ा जहां तथा कथित तौर पर उसे धमकाया गया कि तलाक लेना इतना आसान नहीं होगा!


पुरुषों को लेकर चश्मा बदलने की जरूरत, घरेलू हिंसा के वो भी हो सकते हैं पीड़ित

मानव के आत्महत्या के रात की एक चैट भी सामने आई है जो उसकी पत्नी और बहन के बीच में है जिसमें निकिता कह रही कि मानव काफी ड्रिंक करके बैठा है और कुर्सी के पास उसे दुपट्टा नज़र आ रहा जिससे वो आशंकित हो रही. मगर मानव की बहन किसी भी आशंका से इनकार करती है और निकिता को सो जाने की सलाह देती है. मगर निकिता की आशंका सच हो जाती और मानव आत्महत्या कर लेता है और अपने साथ कई सवाल छोड़ देता है. क्या पति- पत्नी संबंध में अविश्वास इतनी गहरी होती है कि किसी अनजाने के कॉल से जिसमें पति या पत्नी के चरित्र पर उंगली उठाई गयी हो, उसे ही सच मान अपना जीवन तक समाप्त कर लिया जाता है?

आत्महत्या करने में पुरुष हैं आगे

2021 के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक  देश भर में 1.64 लाख लोगों ने आत्म हत्या की. इसमें विवाहितों की बात करें तो 81 हजार विवाहित पुरुष और 28 हजार विवाहित महिलायें थी. पुरुषों में आत्महत्या की संख्या ज्यादा होने का एक कारण किसानों की आत्महत्या भी है जो अधिकांश पुरुष ही होते हैं. 33.2% पुरुषों ने आत्महत्या पारिवारिक समस्याओं के कारण की और 4.8% ने वैवाहिक समस्याओं के कारण आत्महत्या की.

यही आंकड़ा अगर हम 2022 का देखें तो समझ आता है कि कुल 1.70 लाख आत्महत्याओं में 21.7% आत्महत्याओं की वजह पारिवारिक मन मुटाव रही हैं. इसी साल 3.2% पुरुषों ने वैवाहिक समस्या से आत्महत्या की.

पुरुषों पर भी बात करने की जरूरत

पुरुष समाज के बारे में बात करने की जरूरत बिल्कुल है. आत्महत्या चाहे कोई करे, किसी भी कारण से करे इसका महिमामंडन करना या कारणों को ग्लोरीफाई या जस्टीफ़ाई करना बंद कीजिए. एक बड़ा दुर्भाग्य यह भी है कि ‘आत्महत्या के लिए उकसाना’ हमारे देश में कड़े कानूनों से अछूता है. इसमें जमानत मिल जाना बहुत सरल है. विरले ही कोई केस है जहां आत्महत्या का कारण बनने वालों को सज़ा मिली हो, कठोर सज़ा की बात तो बहुत दूर की है. यह तो हुई कानूनी बात! मगर आत्महत्या में भी अगर हम विशेष रूप से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या का कारण समझें तो यह बहु आयामी है. ‘सामाजिक पूर्वाग्रह’ और पुरुषों के लिए कुछ ‘अविचल मानदंड’ इसके बहुत बड़े कारण हैं.

पत्नी कतिपय कारणों से सवाल जवाब भी करे तो  ‘अरे मर्द है तो अपनी बीवी नहीं संभाल सकता’! पत्नी के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर हो तो पुरुष की मर्दानगी को ललकार देना! और सामाजिक तौर पर मर्दानगी की परिभाषा को भी सिर्फ  ‘सेक्सुअल कैपबिलटी’ के चश्मे से देखा जाता है! और कटु सत्य यह भी कि यह चश्मा  पुरुष ने स्वयं पहना है! पुरुष की कमाई अगर कम हो तो नाकारा  नालायक! पुरुष रो दे तो ‘अरे ये तो औरत की तरह रोता है!’ अगर किसी महिला सहकर्मी से बात भी कर ले तो पत्नी की प्रतिक्रिया तो बाद में अन्य पुरुष सहकर्मी ही गलत तरीके से फब्तियां कसने लगते हैं जिसे मज़ाक का जामा पहन दिया जाता है.

हम परिवार के टूटते विश्वास और सख्त होते संवेदनशीलता को समझना तो दूर की बात स्वीकार भी नहीं कर पा रहें. जब समस्या स्वीकारेंगे ही नहीं तो समाधान की तरफ कैसे बढ़ेंगे? अतुल सुभाष और मानव शर्मा जैसे आमहत्या पर हम सीधे दहेज निषेध कानून को आड़े हाथों ले लेते हैं और इसे हटाने की मांग करते हैं. मगर क्या दहेज कानून वास्तव में ‘पुरुष विरोधी’ मात्र है? यहाँ दो बातें समझने योग्य हैं. पहली तो यह कि झूठे दहेज केसों की संख्या अभी भी बहुत कम है और झूठ केस साबित हो जाने पर लड़की के ऊपर बहुत से धाराओं के अंतर्गत केस होते हैं और कई मामलों में पुरुष पक्ष को न्याय भी मिले हैं. इसके अलावा झूठे एफआईआर के बदले आप भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं.

समस्या पहले स्वीकारें तो, तब हो समाधान!

Ncrb के डेटा के अनुसार रोज भारत में आज भी दहेज से 18 महिलाओं की मौत होती हैं और यह भी इसी समाज का स्याह सच है. मानसिक उत्पीड़न, भावनात्मक चोट, शारीरिक पीड़ा, जीवन का संघर्ष और स्त्रियों द्वारा आत्महत्या अभी इसमें शामिल नहीं है. दहेज विरोधी कानून स्त्रियों को भी जेल का रास्ता दिखाता है. इस कानून को पुरुष विरोधी कहना गलत होगा. ऐसे बहुत से कानून हैं जिनका दुरपयोग किया जाता है जो अपने आप में अक्षम्य अपराध है.

परिवार और समाज को थोड़ा अपना कलेजा भी बड़ा करके सोचना होगा. जबरदस्ती रिश्तों को चलाने के लिए किसी को मजबूर मत कीजिए. सहन शक्ति को भी इतना क्षीण मत कीजिए कि जरा सी बहस या किसी बात के ना माने जाने पर उसे अपने ईगो से जोड़कर देखा जाने लगे. पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे के अस्तित्व, मान-सम्मान, निर्णय, सोच और भावनाओं की कद्र करनी चाहिए. परिवार को भी जहां लगे कि मामला अब सुलझ के परे है तो उचित निर्णय ले. अगर विलगाव ही सर्वोपयुक्त उपाय है तो इसी को चुनें. ‘समय के साथ’ या ‘बच्चा होने के बाद’ सब हर बार ठीक नहीं हो जाता और यह समझना ही होगा. जो कानून और समाज  अब तक स्त्रियों के प्रति हिंसा के मामले देखते आ रहा था उसे अब पुरुषों के प्रति भी किसी भी प्रकार के हिंसात्मक मामलों की बढ़ोतरी देखनी समाज के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. आत्महत्या मानसिक तनाव और डिप्रेशन के ही कारण होता है. किसी भी समस्या का समाधान आत्महत्या कत्तई नहीं हो सकती. अवसाद के लक्षणों और आत्महत्या के प्रयासों को परिवार काभी नजर अंदाज ना करे. मानव के आत्महत्या के तीन प्रयासों को अगर परिवार गंभीरता से लेता और उचित इलाज कराता और तलाक के लिए पारिवारिक तौर पर एकमत होता तो शायद मानव आज जिंदा होता.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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