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Presidential Election: वो राष्ट्रपति चुनाव, जिसने कांग्रेस को ही तोड़ दिया!

Presidential Election: एनडीए (NDA) की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मूर्मू (Droupadi Murmu) की उम्मीदवारी ऐसी है कि विपक्ष की भी तमाम पार्टियां बीजेपी (BJP) और एनडीए के साथ आकर द्रौपदी मू्र्मू की उम्मीदवारी का समर्थन कर रही हैं. जैसे नवीन पटनायक (Naveen Patnaik) की बीजू जनता दल (Biju Janata Dal), जगन मोहन रेड्डी (Jagan Mohan Reddy) की वाईएसआर कांग्रेस (YSR Congress) और मायावती (Mayawati) की बसपा (BSP). लेकिन इस देश में एक राष्ट्रपति ऐसे भी हुए हैं, जिनके चुनाव के दौरान उन्हें उम्मीदवार बनाने वाली पार्टी तो टूटी ही, खुद प्रधानमंत्री को भी पार्टी से बाहर निकाल दिया गया. दरअसल हम बात कर रहे हैं देश के चौथे राष्ट्रपति वीवी गिरी (President VV Giri) की, जिनके राष्ट्रपति बनने से कांग्रेस टूट गई थी और इंदिरा (Indira Gandhi) को प्रधानमंत्री रहते हुए पार्टी से निकलना पड़ा था.

वह तारीख थी 3 मई, 1969. लगातार दूसरी बार देश के राष्ट्रपति रहे जाकिर हुसैन का अचानक निधन हो गया. तब वो देश के इकलौते ऐसे राष्ट्रपति थे, जिनका पद पर रहते हुए निधन हुआ था. खाली जगह को भरने के लिए फिर से राष्ट्रपति चुनाव होना था. तब वीवी गिरी देश के उपराष्ट्रपति थे. उन्हें देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया. ये कांग्रेस के इतिहास का वो दौर था, जब कांग्रेस में ओल्ड गार्ड वर्सेस यंग गार्ड की लड़ाई चल रही थी. ओल्ड गार्ड का नेतृत्व कर रहे थे के कामराज, जिनके साथ थे बंगाल के अतुल्य घोष, महाराष्ट्र के एस.के. पाटिल, कर्नाटक के निजलिंगप्पा और बिहार की तारकेश्वरी सिन्हा. इस ओल्ड गार्ड को सिंडिकेट कहा जाता था. वहीं यंग गार्ड का नेतृत्व था इंदिरा के हाथ में जो प्रधानमंत्री थीं और बतौर लोहिया, शुरुआत में तो वो गूंगी गुड़िया थीं, जिन्हें सिंडिकेट चला रहा था. लेकिन इंदिरा को इस सिंडिकेट से खतरा था. उनकी टीम में थे चंद्रशेखर, कृष्णकांत, अर्जुन अरोड़ा, मोहन धारिया, रामधन और लक्ष्मीकांत थम्मा जैसे युवा नेता.

खुलकर सामने आई सिंडिकेट और इंदिरा की लड़ाई

सिंडिकेट और इंदिरा खेमे की लड़ाई अब लगभग खुलकर सामने आ गई थी. फिर भी राष्ट्रपति का चुनाव तो करना ही था. ऐसे में 10 जुलाई, 1969 को बेंगलुरु में कांग्रेस संसदीय समिति की एक बैठक बुलाई गई. यह तय करने के लिए राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा. सिंडिकेट नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार बनाना चाहता था, वहीं इंदिरा चाहती थीं कि जगजीवन राम को अगला राष्ट्रपति बनाया जाए. लेकिन संसदीय बोर्ड में इंदिरा का फैसला पास नहीं हो पाया. सिंडिकेट जीत गया और नीलम संजीव रेड्डी कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार बने. इसकी कसक इंदिरा गांधी को थी, क्योंकि संसदीय समिति की इस बैठक से पहले कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज ने खुद इंदिरा गांधी को राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया था, जिसे इंदिरा ने मना कर दिया था.

वीवी गिरी बने निर्दलीय उम्मीदवार

इस बीच कांग्रेस संसदीय समिति की बैठक के ठीक 10 दिन बाद 20 जुलाई, 1969 को इंदिरा गांधी ने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और बतौर कार्यवाहक राष्ट्रपति वीवी गिरी ने इसपर हस्ताक्षर कर दिए. ये उनका कार्यवाहक राष्ट्रपति के तौर पर अंतिम फैसला था. इसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा देने की वजह ये थी कि उन्होंने निर्दलीय ही राष्ट्रपति चुनाव के लिए पर्चा भर दिया. वहीं कांग्रेस संसदीय समिति ने अपना आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को बनाया था. एक तीसरा भी उम्मीदवार इस चुनावी मैदान में था, जिसका नाम सीडी देशमुख था. जिनका पूरा नाम चिंतामण द्वारकानाथ देशमुख था, जिन्हें जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया था.



Presidential Election: वो राष्ट्रपति चुनाव, जिसने कांग्रेस को ही तोड़ दिया!

इंदिरा के सपोर्ट से बने राष्ट्रपति

यहां पर इंदिरा गांधी ने बड़ा खेल कर दिया. प्रत्यक्ष तौर पर तो इंदिरा ने नीलम संजीव रेड्डी का विरोध नहीं किया, लेकिन ये साफ था कि इंदिरा के कहने पर ही वीवी गिरी ने इस्तीफा दिया है और निर्दलीय ही चुनावी मैदान में उतरे हैं. वोटिंग से एक दिन पहले इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के सांसदों से कहा कि वो अपनी अंतरात्मा की आवाज पर राष्ट्रपति चुनाव में वोट करें. इंदिरा का इशारा सांसदों के लिए आदेश की तरह था. राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा आया तो कांग्रेस के आधिकारिक कैंडिडेट नीलम संजीव रेड्डी चुनाव हार गए थे. निर्दलीय पर्चा भरने वाले वीवी गिरी राष्ट्रपति चुनाव जीत गए थे, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना थी.

इंदिरा ने भुगता खामियाजा

लेकिन इसका अंजाम इंडिरा गांधी को भुगतना पड़ा. ओल्ड गार्ड ने तय किया कि कांग्रेस में सिंडिकेट और इंदिरा दोनों का एक साथ रहना मुनासिब नहीं है. नतीजा हुआ कि कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया. इसके बाद इंदिरा ने एक मीटिंग बुलाई. प्रधानमंत्री वो थी हीं. सिंडिकेट ने इसका विरोध किया. लेकिन इंदिरा ने ओल्ड गार्ड्स के विरोध को दरकिनार कर एक नई पार्टी का ऐलान कर दिया. इसका नाम रखा गया कांग्रेस (रेक्वेजिशन). जिसका अध्यक्ष जगजीवन राम का बनाया गया. कांग्रेस के कुल 705 सांसदों में से 446 सांसद इंदिरा के साथ थे. बाद में इंदिरा वाली कांग्रेस को ही कांग्रेस रूलिंग और इमरजेंसी के बाद कांग्रेस इंदिरा के नाम से भी जाना गया. अब की जो कांग्रेस है, वो वहीं कांग्रेस है, जिसे इंदिरा ने बनाया था. 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा की कांग्रेस आर को 352 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस ओ को महज 16 सीटें. और इस तरह से इंदिरा गांधी की कांग्रेस को असली कांग्रेस की वैधता हासिल हो गई.

24 जून, 1980 को हुआ निधन

फिलहाल वीवी गिरी (President VV Giri) की बात की जाए तो उनके बारे में एक और दिलचस्प बात जाननी ज़रूरी है. वीवी गिरी के पिता वकील थे, ऐसे में वीवी गिरी भी वकालत पढ़ने के लिए आयरलैंड (Ireland) चले गए. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ डबलिन (University College of Dublin) में एडमिशन लेने के बाद वीवी गिरी ने वहां पढ़ाई कम और राजनीति ज्यादा शुरू कर दी. यह बात 1913 की है. वहीं 1916 आते-आते आयरलैंड में अंग्रेजों के खिलाफ बड़ी बगावत हो गई. इसमें वीवी गिरी भी शामिल थे और फिर उन्हें आयरलैंड ने देश छोड़ने का आदेश दे दिया. वो वकालत की पढ़ाई अधूरी छोड़कर भारत लौट आए लेकिन राजनीति के काम को पूरा किया. वह मज़दूर आंदोलनों से होते हुए केंद्र की कैबिनेट तक पहुंचे और फिर बराय मेहरबानी इंदिरा गांधी देश के राष्ट्रपति भी बने. लेकिन 24 जून, 1980 को जब उनका निधन हुआ तो देश ठीक से उनका शोक भी नहीं मना सका, क्योंकि उससे एक ही दिन पहले संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत हो गई थी और पूरा देश संजय की मौत का मातम मना रहा था.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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