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उत्तराखंड का UCC है संविधान के अनुकूल, लिव-इन पर सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ही बात

उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड पेश हो गया है. बीते मंगलवार यानी 6 फरवरी को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सदन में इसे टेबल कर दिया, कुछ ही दिनों में यह कानून बन जाएगा. इस बिल का हालांकि विरोध भी हो रहा है, कुछ तबकों से समर्थन भी मिल रहा है. इसमें सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि यदि आप लिव-इन में रह रहे है तो आपको रिपोर्ट करनी होगी, नहीं तो आप पर कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है. इसको लेकर काफी शोरगुल हो रहा है. इसके साथ ही समाज के एक बड़े वर्ग मुसलमानों की तरफ से भी इसका विरोध किया जा रहा है, क्योंकि यह उनकी शरीयत के मुताबिक नहीं है. मुस्लिम नेताओं ने बयान दिया है कि वे इसका कानूनी तौर पर विरोध करेंगे. 

महत्वाकांक्षी और जरूरी कानून

यूनिफॉर्म सिविल कोड एक बहुत ही महत्वकांक्षी कानून है. चूंकि भारत एक ऐसा देश है जहां हर देश, हर जाति, हर धर्म के लोग रहते है. हर देश, हर जाति, हर धर्म के लोगों का एक अपना सार्वजनिक कोड होता है. मुस्लिम के शादी-विवाह के लिए एक अपना पर्सनल कोड है, हिन्दुओं का अलग कोड है. कई ऐसे धर्म और जाति हैं जिनके अपने पर्सनल कोड है, जिन्हें पर्सनल लॉ के रूप में जाना जाता है. तो, इन सभी को कोडिफाई करने की जरूरत तो है ही. जहां तक लिव-इन रिलेशन की बात है तो लिव-इन रिलेशनशिप में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ये अनुमति दी थी कि आप बिना शादी-विवाह के साथ रह सकते हैं. लेकिन यह केवल एक परमिशन है साथ रहने का, उनका कोई अधिकार नहीं है. इसके ऊपर कोई अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता है. यदि ऐसे रिश्ते में किसी पर अत्याचार किया जा रहा है तो वो घरेलू हिंसा कानून की परिधि में आता है. ऐसे देखा जाए तो लिव-इन रिलेशनशिप शारीरिक तौर पर साथ रहने का एक अधिकार है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं है. इसमें कोई शक नहीं है कि लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट भारत की सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ है. सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इसकी इजाजत दे दी है लेकिन ये भारत की परंपरा और धार्मिक दृष्टिकोण के विरुद्ध है. 

यूसीसी को समझना चाहिए

यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ है 'कॉमन सेट ऑफ लॉ ऑफ ऑल पीपल'. भारत एक यूनियन ऑफ स्टेट है, हर स्टेट का अपना अलग-अलग लॉ होता है, हर स्टेट अपने अनुसार उसकी व्याख्या कर सकता है. चूंकि ये स्टेट लिस्ट में आता है तो हर स्टेट को ये अधिकार है कि एक कानून बनाया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने यह दिया है कि आप लिव-इन रिलेशन में रह सकते है लेकिन ये स्टेट का काम है कि वो किस तरीके से उसे लागू करता है. उत्तराखंड की सरकार ने ये नहीं कहा है कि आप लिव-इन नहीं कर सकते, या नहीं रह सकते हैं साथ में, लेकिन बस एक धारा लगा दिया है कि आपको रिपोर्ट करना होगा. ये राज्य सरकार के दायरे में आता है. राज्य सरकार इसके लिए फ्री है कि वो कोई भी टर्म या कंडीशन लगा सकती है. लॉ एंड ऑर्डर के जितने भी मुद्दे है वो राज्य के क्षेत्र अधिकार में आते है, उस हिसाब से ये गैरकानूनी नहीं कानूनी है. जो कानून बनाता है वो कानून तभी बनता है जब कोर्ट उसे अनुमति देता है. कोई भी कानून हो उसका विरोध होगा, कुछ लोग पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में. किसी व्यक्ति का यह कहना कि एसटी को क्यों छोड़ा गया, हमें क्यों नहीं रखा गया, इस तरह की शिकायतें रहेगी. अनुसूचित जाति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत कुछ छूट दी गयी है. उसका विस्तृत अध्ययन करना चाहिए. 

कोई भी कानून सबको नहीं करता खुश 

कानून में ऐसे बहुत से प्रावधान बनाये जाते है जिसके अनुसार कुछ लोगों को फायदा दिया जाता है तो निश्चित रुप से कुछ लोग उसका नुकसान भी होगा. कानून कभी भी बराबर नहीं हो सकता है. रिजर्वेशन की पॉलिसी भी बराबर नहीं है, लेकिन संवैधानिक है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उसे संविधान के अनुसार माना है. कानून का अर्थ है कि कानून यह जानता है कि हमारी जनता के लिए क्या सही है और क्या गलत है. रही बात एसटी को छूट देने की तो उसके लिए बिल को पढ़ना पड़ेगा कि किन परिस्थितियों में राज्य सरकार ने एसटी समुदाय को इसमें क्या छोड़ा है. वैसे भी, अभी तो उत्तराखंड में यूसीसी तो अभी बिल ही है अभी कानून नहीं है, अभी बहुत से प्रावधान को इसमें जोड़ा जा सकता है. भारत प्रजातंत्र है और प्रजातंत्र में विरोध करने का अधिकार है. जब तक ये कानून न बन जाए तब तक किसी भी चीज को स्थायी नहीं मानना चाहिए, इसमें सुधार भी किया जा सकता है. यदि एसटी समुदाय को इसमें मान्यता और फ्रीडम दिया गया है तो इसका कुछ न कुछ आधार होगा. यह भी हो सकता है कि वो पिछड़े हुए वर्ग हैं, वंचित हैं, समाज के मुख्य धारा में नहीं है कई कारण हो सकते है. ये बिल बहुत ही आरंभिक विषय है और आरंभिक विषय में विरोध हो सकता है.

यूनिफॉर्म सिविल कोड जरूरी

सभी धर्म के लिए अलग नियम-कानून है, और भारत में जितने भी धर्म समुदाय है वो पर्सनल लॉ के आधार पर है. समय के साथ इनको कोडिफाइड किया गया है, जैसे हिंदुओं के लिए हिंदू मैरेज एक्ट, हिंदू सक्सेशन एक्ट है, ईसाइयों के लिए क्रिश्चचियन मैरेज एक्ट, पारसियों के लिए मैरेज एंड डाइवोर्स एक्ट, इंडियन डाइवोर्स एक्ट है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ  कोडिफाइड नहीं है, वो उनके मजहब के आधार पर है. उनका शरीयत के अनुसार होता है. हालांकि, संविधान का अनुच्छेद 44 जो नीति-निर्देशक तत्व है, वह कहता है कि सभी राज्य भारत की पूरी सीमा में समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रयास करेंगे. अनुच्छेद 37 में ही यह भी कहा गया है कि यह किसी भी कोर्ट द्वारा अधिशासित नहीं किया जा सकता, तो यह राज्य का कर्तव्य है. आर्टिकल 44 कहता है कि हरेक राज्य यह प्रयास करेगा कि यूसीसी को लाया जाए. हालांकि, आर्टिकल 44 यह भी कहता है कि इसे कोर्ट द्वारा अधिशासित नहीं कर सकते, लेकिन यह देश के आधारभूत प्रशासनिक मूल्यों में है. यूसीसी पूरी तरह सही और जरूरी कानून है और यह संविधान के मुताबिक है, उसकी मूल भावना को लागू करने के आलोक में किया गया है. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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