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राहुल के रायबरेली से नामांकन पर गरमाई सियासत, लेकिन बृजभूषण पर दांव पड़ सकता है महंगा

लोकसभा के दो चरणों के मतदान ख़त्म हो गए हैं. हालांकि, कतिपय विश्लेषकों का मानना था कि जमीन पर गर्मी है, पर चुनावी माहौल में वो गर्मी नहीं दिख रही है. तीसरा चरण आते-आते ये लग रहा है कि वो गर्मी लोकसभा चुनाव में आ गयी है. अब इंडिया गठवंधन के दो दिग्गज अखिलेश यादव कन्नौज से और राहुल गांधी रायबरेली से चुनावी मैदान में उतर गए हैं. देश के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में इसके साथ ही चुनावी हलचल बढ़ गयी है. अब उत्तर प्रदेश में सियासी सरगर्मियों के तेज होने के साथ ही नेताओं के बाग्बाण भी छूटने की उम्मीद है, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में 'शहजादे के डर कर भाग जाने' के जिक्र से कर दी है. 

राहुल की अमेठी नहीं, रायबरेली

राहुल अमेठी से लड़ेंगे या रायबरेली से ये गुरुवार तक बहुत बड़ा सवाल था. ऐसी भी संभावना थी कि रायबरेली और अमेठी से राहुल और प्रियंका दोनों मैदान में उतरेंगे, पर पहले से ही एक बातचीत में मैं कह चुका था कि कांग्रेस राहुल को रायबरेली से लाएगी और आखिर यही हुआ. अमेठी की तुलना में रायबरेली सीट से गांधी परिवार का ऐतिहासिक संबंध रहा है. इस सीट से फिरोज़ गांधी से लेकर इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी चुनावी मैदान में उतरें हैं. अब राहुल गांधी भी इस लिस्ट में शामिल हो गए हैं. साथ ही रायबरैली में राहुल गांधी, इंदिरा गांधी की विरासत को लेकर जनता से कनेक्ट करेंगे.

वहीं अमेठी की बात करें तो इस सीट पर पहली बार राजीव गांधी ने चुनाव लड़ा था. लेकिन एक समय ऐसा आया जब गांधी परिवार ने अपने करीबी कप्तान सतीश शर्मा को अमेठी से चुनाव लड़ाया था. ऐसे में गांधी परिवार ने न कभी रायबरेली छोड़ी, न रायबरेली ने गाँधी परिवार को छोड़ा, रायबरेली से गांधी परिवार को भरोसा है, इसीलिए रायबरेली को चुना गया है.  

स्मृति ईरानी की चुनौती और आरोप

अमेठी से अगर राहुल गांधी चुनाव लड़ते तो आरोप-प्रत्यारोप का शिखर और ऊंचा होता. हालांकि, अब बीजेपी और स्मृति ईरानी का पहले से चल रहा नैरेटिव- कि हार के डर से राहुल अमेठी से भाग गए- और भी तेज होगा. कांग्रेस ने अमेठी से किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया है. ये नाम बहुचर्चित भले न हो, पर राहुल गांधी के अमेठी का रुख करने से पिछले चुनाव तक किशोरी लाल शर्मा ने ही अमेठी में स्थानीय प्रबंधक का रोल निभाया है.

अमेठी से चुनाव भले ही राहुल गांधी नहीं लड़ रहे हों, लेकिन चुनाव के दौरान देश भर में प्रचार करने में व्यस्तता के कारण किशोरी लाल शर्मा ही अमेठी में कांग्रेस के संचालक थे, जिससे किशोरी लाल शर्मा का अमेठी से जमीनी जुड़ाव है. अमेठी में किशोरी लाल राहुल गांधी का खड़ाऊं रखकर चुनाव लड़ेंगे, दूसरी तरफ राहुल गांधी अमेठी में विरासत को आगे बढ़ाएंगे. 

उत्तर प्रदेश में बढ़ेगी गर्मी

जब अखिलेश यादव कन्नौज पहुंचे थे तो पत्रकारों ने उनसे सवाल किया था कि क्या राहुल गांधी भी उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ेंगे? इस पर अखिलेश ने कहा था, ''अब महफ़िल तो यूपी में ही सजेगी''. और अब जब चुनाव के दो चरण ख़त्म हो गये हैं साथ ही कई राज्यों में चुनाव समाप्त हो गयें हैं.  ऐसे में इस डेवलपमेंट के बाद उत्तर प्रदेश रणभूमि बन गया है, क्यूंकि इंडिया गठबंधन के दो मजबूत साझेदार उत्तरप्रदेश से चुनाव मैदान में है.  कन्नौज का चुनाव चौथे चरण में होगा वहीं रायबरैली में चुनाव पांचवे चरण में होगा. इस से चौथे-पांचवे चरण में गर्मी बनी रहेगी. साथ ही हमें कन्नौज और रायबरैली में इंडिया गठबंधन की बड़ी चुनावी रैली देखने को मिलेगी. कन्नौज की रैली से फर्रुखाबाद समेत कानपुर देहात, उन्नाव तक माहौल बनाने की कोशिश होगी. रायबरेली की रैली से बीजेपी के मजबूत क्षेत्र अवध में पैठ बनाने की कोशिश इंडिया गठबंधन करेगा. 

बृजभूषण सिंह को ही टिकट समझिए

हमें समझना होगा कि कैसरगंज से बृजभूषण शरण सिंह कह रहे थे कि उनका टिकट कौन काटेगा, और ऐसा हुआ भी. तकनीकी रूप से उन्हें टिकट भले न मिला हो पर मिला उन्हीं को है. उनके बेटे को बीजेपी ने कैसरगंज से उम्मीदवार बनाया है.  यानी बीजेपी बृजभूषण सिंह के दबाब में थी क्यूंकि बीजेपी को पता था कि अगर उनकी टिकट काटी जाती है और उनके किसी परिवार के व्यक्ति या उनकी मर्जी से नहीं दिया जाता, तो उस इलाके की 4 से 5 सीट खतरे में आ सकती हैं. सांप भी मर जाये, लाठी भी न टूटे की तर्ज़ पर बीजेपी ने उनके बेटे करण भूषण को टिकट तो दे दिया, लेकिन इससे  बृजभूषण के खिलाफ जो गुस्सा है वो काम नहीं होगा. बृजभूषण के ऊपर आरोप लगाने वालीं पहलवान साक्षी मालिक ने इस पूरे मसले पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया भी दी है, जिस से बीजेपी के लिए  हरियाणा और पंजाब के इलाकों में असर पड़ सकता है.  ऐसे में लगता है कि बृजभूषण पर लगे आरोपों का प्रेत बीजेपी को इतनी आसानी से नहीं छोड़ेगा. 

राजपूत ,बीजेपी और बृजभूषण

गुजरात के कच्छ इलाके में राजपूत समाज बीजेपी से बुरी तरह से भड़का है, लगातार बैठकें और कसमें खाने का दौर चल रहा है. गुजरात के आनंद में लाखों राजपूतों ने भाजपा को हराने की कसम खायी है. साथ ही जनरल वीके सिंह का गाजियाबाद से टिकट काटे जाने पर भी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं आयी है. ऐसे में अगर बृजभूषण को उनकी मर्ज़ी के बिना टिकट दिया जाता तो उत्तरप्रदेश के अंदरूनी हिस्सों तक यह आग पहुंचनी तय थी. अवध क्षेत्र के ही एक कद्दावर नेता रघु राज प्रताप सिंह बिलकुल खामोश हैं, जबकि अमूमन वो बहुत वोकल हैं.

शुरुआत में योगी आदित्यनाथ से उनकी करीबी छुपी नहीं थी. उन्होंने अपनी पार्टी को एनडीए का हिस्सा बनाया, लेकिन अब वो खामोश हैं. वो भी यही देखना चाहते थे. दूसरी तरफ जौनपुर में चुनाव से पहले  हुई धनंजय सिंह की गिरफ्तारी ने राजपूतों में बीजेपी के खिलाफ एक  भावना जगाई थी ऐसे में अगर बृजभूषण के किसी सगे-संबंधी को बीजेपी टिकट नहीं देती तो यह आग और बढ़ जाती.

उत्तरप्रदेश की आग बीजेपी ने नियंत्रित की लेकिन इस नियंत्रण से भड़की आग हरियाणा पहुंच गयी है. उसको बीजेपी कैसे नियंत्रित करेगी, क्यूंकि हरियाणा में भले ही बीजेपी की 10 साल से सरकार हो, लेकिन हरियाणा में बीजेपी माहौल नहीं बदल पायी है. हरियाणा के लिए बीजेपी के पास कोई नैरेटिव नहीं हैं. ऐसे में कैसरगंज दुरुस्त करने के चक्कर में, उत्तरप्रदेश के राजपूत को मनाने के चक्कर में, हरियाणा में बीजेपी ने एक बड़ा रिस्क लिया है. अब देखना होगा कि बीजेपी इस चुनौती से कैसे निपटेगी.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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